बुधवार, जून 26, 2013

वो पल..



मेरी अब तक की सारी ज़िंदगी इंतज़ार में ही बीती है..। इंतज़ार कुछ और ही हो जाने का..। हमेशा ऐसा लगा है बस वो कुछ और हो जाने से दहलीज़ भर का फासला है..। मन कहता रहा, बस एक कदम और... स्कूल का सारा वक्त बिताया अपने कालेज संस्करण के इंतज़ार में..। कालेज पहुंचा तो वो यूनिवर्सिटी का इंटलेक्चवेल हमेशा नज़रों के आगे नाचता रहा..। ज़्यादा सयाना, मज़बूत और व्यवस्थित..। ज़िंदगी के करीब दो दशक सिर्फ इंतज़ार मे बीते हैं..। उस एक लम्हे के इंतज़ार में..जिसके बाद जिंदगी असल में शुरु होगी..। और इसी इंतज़ार की परिणति मैं हूं..। रोज़ दर रोज़ ज़िंदगी फिसल रही है और मैं इसके आगाज़ का इंतज़ार कर रहा हूं..। किसी एक लम्हे, किसी एक शख्स का इंतज़ार..या फिर वो कोई एक जादुई घटना..जिसके बाद मेरी ज़िंदगी सही मायनों में डग भरना शुरु करेगी..। "The Big Moment" वाली फिल्मों का कायल रहा हूं..। ऐसे मैच, नाटक..आम इंसानों की ज़िंदगी में भी ऐेसे लम्हे..। कहानियां जिनमें वो एक पल समय के विभाजन का बिंदू बन जाए..। जिसके इकबाल के आगे अतीत और भविष्य के सब सच सूरत बदलने पर मजबूर हो जाएं..। अक्सर फिल्मों या किताबों में मिलने वाला ऐेसा एक लम्हा जो सबकुछ बदल देगा..जो इस प्रतीक्षा का क्लाइमेक्स होगा..सदा से मेरी चाहत रहा है..। ऐसी फिल्मों, ऐसे खेल के मुकाबलों पर चमत्कृत होता हूं..क्योंकि खुद भी उसी चमत्कारी क्षण के इंतज़ार में हूं..। ज़िंदगी ने जब छुआ रोमांच, उत्सव, आश्चर्य के लम्हों में छुआ..। लेकिन मैं तो सिर्फ दफ्तर जाता हूं और लौटकर घर आता हूं..। फिल्मों या असल जीवन के नायक के भव्य सच की रोशनी में कितनी साधारण दिनचर्या..। JOHN LENNON का कहा कही पढ़ा, “Life is what happens when you’re busy making other plans.”..। But for me, life is what was happening while I was busy waiting for my big moment.। मै उस पल के लिए हमेशा तैयार खड़ा रहा..। हमेशा माना कि वही लम्हा ऐसी नाव बन जाएगा जो जीवन सागर के पार लगा दे..।
लेकिन अफसोस वो 'जादुई पल' महज़ एक शहरी मिथक है..। एक मायने में कुछ लोगो को मिलता है; REALITY SHOWS के विजेता, कंडक्टर से सिनेमा स्टार बन जाने वाले लोग..। मगर इंडियन आयडल या कोई स्टार भी जो ज़िंदगी जी रहा है..वो सिर्फ उस एक लम्हे से नहीं बनी है..। ज़िंदगी तो खरबों खरबों पलों का जोड़ है..। छोटे-छोटे पल और उनमें लिए जाने वाले फैसले..। वक्त की निश्छल नदी के तल पर चमकते अनगिनत कंकर..! बहुत वक्त और कोशिश चाहिए उन्हें पिरोने के लिए..। फिल्मों का पर्दा कितना भव्य है..और इन कंकरों का सच कितना सादा..। अब लगता है कि यही तो नहीं है वो पल? मेरे इंतज़ार का हासिल, वो रोमांच, ऐसा अनुभव जो बैकग्राउंड में यश चोपड़ा की फिल्म के गीत के लायक हो..। , घर, गलियों बिस्तरों, डिनर टेबलों, सपनों, प्रार्थनाओं, और कशमकशों में बीतता पल..। कहीं ये तो नहीं है वो पल..?

गुरुवार, अप्रैल 11, 2013

ज़ाकिर नाइक की नज़र में ओशो-एक आलोचना

खुद को ओशो का 'अनुयायी' कहना सही नहीं होगा..। मगर ये सच है कि उनकी समझ और शख्सियत दोनों का कायल रहा हूं..। दुनिया के लगभग किसी भी विषय पर उनकी अंतर्दृष्टि, उनकी वक्तृता अनुपम है..। सभी जर्जर, सामाजिक और राजनीतिक ढांचों को लेकर उनके विद्रोह ने करोड़ों को बदला है..। हाल ही में इंटरनेट पर ज़ाकिर नाइक नाम के इस्लामिक प्रचारक को सुना..। वे खुद को धर्मों के तुलनात्मक अध्ययन का विशेषज्ञ बताते हैं..। वेद श्लोक, कुरान की आयतें, बाइबिल के वचनों की बौछार वो अपने भाषणों में करते हैं..। श्री श्री रविशंकर के साथ उनकी चर्चा सुनी..। नाम गोष्ठी का दिया गया था..लेकिन ज़ाकिर नाइक की रटी आयतों और श्लोकों के साथ ये आखिर में एक बहस ही साबित हुई..। जैसा कि वो करते हैं ज़ाकिर नाइक ने 'मूर्तिपूजक', 'कई देवताओं को मानने वाले' धर्मों को जमकर कोसा..। हिंदु और इस्लाम धर्मों पर तुलनात्मक अध्ययन की किताब निकालने पर रविशंकर की सरेआम खिंचाई भी की..। किताब में रविशंकर ने दावा किया था कि इस्लाम के कई रिवाज़ हिंदू संस्कृति से निकले हैं..। शायद श्री श्री को इस बौद्धिक गोरिल्ला हमले का इल्म ना रहा होगा..। उनके श्रीमुख से सफाई निकली भी तो ये कि किताब को जल्दबाज़ी में छपवाया गया था..। उन्होंने प्रण किया कि अब ये किताब नहीं छपेगी..। रविशंकर जी को उनकी पैनी बुद्धि के लिए कभी नहीं जाना जाता..। उनकी अपील अपनी शख्सियत के करिश्मे और शायद उनकी 'पीआर मशीनरी में ज़्यादा है..। मैंने उनका ऐसा लेख भी पढ़ा है जिसमें उन्होंने मार्क्सवाद को भगवदगीता के साथ जोड़ा है..। लेकिन मार्क्स के द्वंद्वात्मक भौतिकवाद (‘Dialectical Materialism’ ) का पूरे आलेख में ज़िक्र तक नहीं था..। बहरहाल इस गोष्ठी का मूड़ भांपने में रविशंकर जी पूरी तरह नाकाम रहे..। सुनने वालों में ज़्यादातर एक ही धर्म के लोग थे..और वो भी पहले से तैयार प्रश्नों के साथ..। श्री श्री की मृदुता और ज़ाकिर नाइक को जवाब दे पाने में असमर्थता ने गुरुदेव की जमकर किरकिरी कराई..।
ज़ाकिर नाइक आज हिंदुस्तान ही नहीं दुनिया में तेज़ी से मशहूर हो रहे इस्लामिक प्रचारकों में से एक गिने जाते हैं..। अंग्रेज़ी और हिंदी दोनों में उनका खुला हाथ है..। संक्षेप में कमअक्ल और धर्मांध लोगों को सम्मोहित करने की क्षमता उनमें साफ है..। सभी अनुयायियों की तरह उनके मानने वाले भी ज़्यादातर लकीर का फकीर ही हैं..। सोच की मौलिकता और समालोचना की कमी को ज़ाकिर कुरान, बाइबिल और वेद ग्रंथों के वचन तोते की तरह रटकर पूरी करते हैं..। अध्याय, पन्ना नंबर, श्लोक संख्या, लाइन का नंबर तक उन्हें ज़ुबानी याद होता है..। भेड़चाल मानसिकता वाले झुंड इसे विद्वता की निशानी के तौर पर देखते हैं..। जब भी ज़ाकिर नाइक अपना भाषण खत्म करते हैं..श्रोता अक्सर उन्हें standing ovation देते हैं..।
लेकिन मेरी दिलचस्पी रविशंकर-ज़ाकिर नाइक की इस बहस में तब हुई जब ज़ाकिर नाइक ने ओशो को सुरा, इख्लास समेत दूसरे इस्लामिक शास्त्रों की कसौटी पर रखकर पूरी तरह खारिज किया..। कुरान के मुताबिक ईश्वर अजन्मा है, अंतहीन है, पूरी कायनात में कुछ ऐसा नहीं जो उसके जैसा हो..। आमतौर पर कट्टर मुल्ला इसी की रोशनी में रखकर इस्लाम को सर्वोपरि और इकलौता स्वीकार्य धर्म साबित करने की कोशिश करते हैं..। इस पूरी बहस में ओशो की बात कह सके, ऐसा कोई नहीं था..। लिहाज़ा मामला एकतरफ़ा ही रहा..। श्री श्री भी ओशो के नाम पर अपराध बोध में ही दिखे..। उन्होंने श्रोताओ से अपील कर डाली कि उनके जैसे धर्मगुरूओं के बारे में ओशो को देखकर राय ना बनाई जाए..। मैं किसी धर्म का जानकार होने का दावा तो नहीं करता..लेकिन मेरी राय में ज़ाकिर नाइक जैसे शख्स को ओशो जैसे विद्रोही संतों पर उत्तर ना देना पूरी मानवता पर घात होते देखने जैसा है..। इसीलिए ये लिख रहा हूं..।
ज़ाकिर नाइक ने ओशो का ज़िक्र हिंदू धर्म की गुरू परंपरा को झुठलाने के संदर्भ में किया..। उनके चिंतन को समझाने वाली एक भी बात रखे बगैर..ज़ाकिर नाइक ने फैसला भी सुना दिया..। लेकिन ओशो ने ईश्वर की जो अवधारणा दी वो धन, विद्या, विनाश, पालन वगैरह में विशेषज्ञ कोई super human being नहीं है, वो अल्लाह भी नहीं है..। ओशो का बोध बुद्ध के शून्यवाद या वेदांत के अद्वैतवाद के ही निकट नज़र आता है..। लेकिन कई बार वो नास्तिकवाद में वामपंथियों को छूते नज़र आते हैं..। उनकी नज़र कुछ हद तक 17वीं सदी में पश्चिम के सबसे बड़े तर्कवादी SPINOZA से मिलती है..। ओशो विज्ञान के साथ पूरब की समझ को जोड़ते हैं..। उन के के चिंतन में 'इल्हामी' जैसी कोई किताब या ग्रंथ नहीं है..जिसे सीधे ऊपर से ट्रांसमिट करके भेजा गया हो ((कुरान, बाइबिल और वेद ऐसा दावा करते हैं)..। ज़ाकिर नायक खुद को तुलनामत्मक धर्मों के अध्ययन का 'स्टूडेंट' बताते हैं..लेकिन बाकी धर्मों की तरह ओशो के बारे में भी वही मानते हैं जो वो मानना चाहते हैं..। ये सही है कि ओशो का नज़रिया हिंदू, बौद्ध, जैन, सूफियों के नज़दीक है..लेकिन उन्होंने जन्म या कर्म से हर पहचान का खंडन ही किया..। उन्होंने साफ ऐलान किया कि वो हिंदू, मुस्लिम, भारतीय आदि आदि सभी पहचानों को खारिज करते हैं..। इसलिए सबसे पहले तो हिंदू-मुस्लिम की किसी बहस में ओशो को लाना ही अतार्किक है..। ज़ाकिर नायक दावा करते हैं ओशो ने खुद को भगवान कहलाया..। इससे ना सिर्फ ओशो बल्कि पूरब के धर्मों में ईश्वर के स्थान के बारे में भी उनका अज्ञान ही झलकता है..। ज़ाकिर हुसैन के मुताबिक बाकी अब्राहिमी धर्मों की तरह इस्लाम भी अनुयायियों से 'ईश्वर प्रदत्त' किताब के एक-एक अक्षर को बिना सवाल उठाए मानकर चलने की मांग करता है..। ईस्लाम जिस ईश्वर को देखता है वो इस ब्रह्मांड का हिस्सा है ही नहीं, वो सातवें आसमान पर रहता है..। बल्कि वो इस कायनात को रचने वाली अलग ईयता है..। ये पालनहार पुराने ज़माने के सम्राट की तरह एक किताब में लिखे 'CODE OF CONDUCT' के मुताबिक फैसला सुनाता है..वो भी दुनिया के दरबार के आखिरी दिन..। आपको जन्नत नसीब होगी या जहन्नुम ये इस बात पर निर्भर है कि आप इस CODE OF CONDUCT पर कितना चलते हैं..। इस्लाम में अल्लाह का कोई आकार नहीं है,उसकी उपमा भी नहीं दी जा सकती..। लेकिन उसके लिए 'अल्लाह हू अकबर' जैसे उपमानों का इस्तेमाल होता है..। ज़ाकिर नाइक ये नहीं समझ सकते कि मूर्ति लफ्ज़ों की गढ़ी जाए या पत्थर की..कुफ्र तो हो ही गया..!
मूर्ति ना सही ऐसे चिन्हों की इस्लाम में भी कमी नहीं..जिन्हें पवित्र माना गया है..और उनपर मज़ाक में भी उंगली उठाने वालों को ज़्य़ादातर मुस्लिम समाजों ने बख्शा नहीं है..। इस्लाम में बुतपरस्ती हराम है..लेकिन प्रार्थना की भाषा सिर्फ अरबी हो सकती है..। आज तक किसी देश की मातृभाषा में नमाज़ का चलन नहीं पड़ा..। माना ईश्वर एक पत्थर में नहीं हो सकता.. लेकिन क्या वो किसी राष्ट्र विशेष का पासपोर्ट धारी है..? अगर नहीं तो दुनिया भर के मुस्लिम सिर्फ मक्का की ओर मुंह फेरकर ही नमाज़ क्यों पढ़ सकते हैं..? ओशो थिरकते कदमों में, गीतों की तान में, खिलते फूलों में ईश्वर को देखते हैं..। इसलिए ज़ाकिर नाइक परिभाषाओं में कैद अपने सर्वशक्तिमान की रोशनी में ओशो को सही-सही देखें भी तो कैसे?
क्रमश:

गुरुवार, नवंबर 22, 2012

punishment or revenge?

assuming that i'm on the facebook page of a friend who is infinitely un4givin 2

me n having spared a lot of time to spend in 4gettin myself, let me indulge in a

lit bit more of 'baudhik ayashi'; loved all sort of aiyashis in ny case...


सज़ा ए मौत का ये पूरा सिद्धांत मुझे रूसी उपन्यासकार टर्जिनेव के एक कथानक की याद दिलाता है..। जहां दो बदमाश दोस्तों के हाथ एक अनमोल खज़ाना लगता

है। दौलत इतनी थी कि दोनों में से एक के लिए इसे बांटना मुमकिन नहीं था..। उसने तरकीब रचकर खुद को मरा हुआ साबित करवाया..और ऐसे सारे सुबूत छोड़े

जिससे उसका दोस्त कातिल साबित हो..। लालच ने एक दोस्त से दूसरे दोस्त को खत्म करवाया, लेकिन कानूनी तरीके से..। लेकिन कातिल साबित हुआ दोस्त

फांसी से पहले ही जेल तोड़कर भाग गया और 12 साल बाद एक मशहूर नेता की लाश को घसीटता हुआ अदालत के सामने पेश हुआ..। उसने अदालत से कहा;

मैंने उस आदमी को मारा है जिसके कत्ल के लिए आपने मुझे 12 साल पहले सज़ा ए मौत दी..। अगर आपका पहला फैसला सही था तो आप मुझे उसी कत्ल की

दोबारा सज़ा नहीं दे सकते..और अगर पहला ही फैसला ग़लत था तो क्या गारंटी है कि अब जो आप सुनाएंगे वो भी सही होगा..? कहानी हमारे विषय के लिए

कुझ अहम सवाल छोड़ जाती है..। उस आदमी ने कहा- अगर मुझे फांसी हो जाती तो अब क्या होता..? आपको पता चलता कि जिसके कत्ल के लिए आपने फांसी

चढ़ाया वो मरा ही नहीं था..तो क्या आप मुझे मेरी ज़िंदगी लौटा सकते थे..? आप मुझे जो जीवन दे नहीं सकते उसे छीनने का क्या हक है? कहानी के मुताबिक

उस जज को अंत में पेशा छोड़ना पड़ता है..। लेकिन इंसान कब ये नहीं करता रहा है..? कहना कुछ और करना उसके ठीक उलट..। बात सभ्यता की होती

है..संस्कृति की होती है..। मगर आंख के बदले आंख, सिर के बदले सिर..ये तो बर्बर समाजों में होता रहा है..। बहुत साधारण नियम है- अगर किसी ने दूसरी की

ज़िंदगी छीनी है तो उसे भी ज़िंदा रहने का कोई हक नहीं है..। लेकिन एक ही कृत्य से दूसरे को कैसे मिटाया जा सकता है..? ये साधारण बुद्धि के नियमों के विरुद्ध

है..। अगर कसाब से पहले 166 लोग मारे गए थे..तो 21 नवंबर के बाद 26/11 167 मौतों के लिए इतिहास में दर्ज होगा..। अगर जान लेने का कृत्य अपराध

है..तो फिर इसे कोई शख्स या संगठन करे या फिर समाज इससे कोई फर्क नहीं पड़ता..। सज़ा ए मौत उस नज़र में समाज की ओर से एक ऐसे इंसान पर किया

गया अपराध है, जो बेचारा यूं ही लाचार है..। मैं इसे सज़ा नहीं कह सकता..। इसे अपराध ही कहना होगा..। और ये अपराध क्यों होता है..? ये समझना कठिन

नहीं..। समाज बदला लेता है एक ऐसे शख्स से जो उसके बनाए नियम नहीं मानता..। ये कोई नहीं सोचता अगर कोई कातिल है तो वो बेहद गहरे में बीमार है..।

अधिकाधिक उसे नर्सिंग होम की ज़रुरत है..। जहां उसका मानसिक, भावनात्मक और शायद आध्यात्मिक इलाज हो..। हां ये बात सही है किसी की जान जाती है..।

लेकिन क्या कोई कह सकता है किसी दूसरे की जान लेकर उसे लौटाया जा सकता है..। अगर ये मुमकिन है तो मैं फांसी का हिमायती हूं..। तब कातिल को जीने

का कोई हक नहीं है..और क़त्ल हुए शख्स को ज़िंदगी वापस मिलनी ही चाहिए..। ऐसा होता नहीं है..। जो चला गया वो वापस नहीं आता लेकिन आप खून से खून

को धोने की कोशिश करते हैं..। इतिहास में हमेशा यही कोशिश होती रही है..। बमुश्किल 300 साल पहले तक पागलों का इलाज उनके बदन से खून चूसकर किया

जाता था..। ऐसा माना जाता था कि उनके खून में ऊर्जा ज़रुरत से ज़्यादा है और उसे निकालने की ज़रुरत है..। अल्बर्ट कामू के नोबेल पुरस्कार जीतने वाले उपन्यास 'अजनबी' की कहानी भी मौजूं है..। एक व्यक्ति कत्ल के आरोप में पकड़ा जाता है..। बल्कि पकड़ा जाना कहना भी गलत होगा..। क्योंकि वो बचने की कोई कोशिश करता ही नहीं है..। वो समंदर किनारे बैठे एक अजनबी शख्स का कातिल होता है..। मामला अजीब था..क्योंकि इस कत्ल का कोई मकसद नहीं था..। अदालत ने आरोपी से पूछा- 'ये समझ से परे है तुमने कत्ल क्यों किया..?' आरोपी का जवाब था कि ये 'क्यों' का प्रश्न ही नहीं है..। ज़्यादातर लोग जो करते हैं उसकी वजह खोजते हैं..। लेकिन मैं साधारण इंसान हूं..। मैंने खून किया क्योंकि उस वक्त करना चाहता था..और ये एक रोमांचक अनुभव था..। जब मैंने एक उस शख्स की पीठ में खंजर भोंका..जिसने मेरा कुछ बिगाड़ा भी नहीं था..मैं नहीं जानता क्यों लेकिन मेरे लिए सबसे गहरा पल था..। अब बताइये क्या ऐसा शख्स कातिल है या फिर पागलपन का ऐसा केस जिसे ज़िंदगी में उत्सव मनाने के लिए कोई मौका ही नहीं मिला..? शायद उस चरित्र को प्रेम की ही भूख रही होगी..। क्योंकि अगर सिगमंड फ्रायड से पूछेंगे तो वो यही कहेगा कि चाकू पुरुष जनानांग की निशानी है..और उसे घोंपना सिर्फ दूसरे के भीतर प्रवेश करने का तरीका है..एक बीमार कोशिश..। और दुनिया का हर पुरुष स्त्री के शरीर में प्रवेश क्यों चाहता है..? इसलिए क्योंकि उसका जन्म स्त्री के शरीर से होता है..और अवचेतन की स्मृति में कोख से बढ़कर और कोई सूकून नहीं होता..। हर शख्स कोई कोख खोज रहा है..। कातिल भी, लेकिन रुग्ण तरीके से..। लेकिन रुग्णता का जिम्मेदार समाज है..। अगर कत्ल होता है तो समाज को सजा मिलनी चाहिए..। पूरे देश को मिलकर दंड भरना चाहिए..। आपके समाज में ऐसा हुआ क्यों..? आपके नागरिक इतने विध्वंसक क्योंकर हो गए..? क्योंकि कुदरत तो सबको सृजन का बीज बनाकर भेजती है..। इस समाज में होश संभालते संभालते ही आप भ्रमित हो चुके होते हैं..। मौत की सज़ा ही क्यों, दुनिया की कोई भी सज़ा कभी प्रीतिकर नहीं हो सकती..। हर रोज़ अपराधियों की तादाद बढ़ती जाती है..। हर रोज़ आप नई जेलें बनाते हैं..। अजीब है, होना तो इससे उलट चाहिए था..। इतनी सारी अदालतें, इतने सारे कानून, पुलिस..इन सब के साथ तो अपराध को कम होना चाहिए था..। शायद आपको पता ना हो..महज़ डेढ़ सौ साल पहले तक ब्रिटेन में चोरी के लिए सरेआम मृत्युदंड आम बात थी..। ये भी 'सबक' सिखाने का रिवाज था- चोरी की तो सरेआम सूली पर टांगे जाओगे..! लेकिन क्या हुआ..? कोई सौ साल पहले ही इसे खत्म करना पड़ा..। वहां की संसद के जेहन में दो बातें लाई गईं..। पहली तो ये मौत का नज़ारा देखने आने वालों की तादाद बेकाबू हो रही थी..। अगर समाज में किसी बदसूरती की प्यास है तो ये कोई अच्छा लक्षण तो है नहीं.. और ये लक्षण आज भी मौजूद हैं..। स्टेडियम में 13 प्रोफेशनल खिलाड़ी खेल रहे होते हैं..लेकिन वो 1 लाख सीटों पर बैठे क्या करते हैं..? एक प्रकार से वो भी खेल के प्रतिभागी हैं..। खिलाड़ियों के लिए तो अक्सर उनका बिज़नेस ही होता है और लाखों मूर्ख...और ये ग्रेट ब्रिटेन के मूर्ख क्या करते थे..? वो मौत के खेल में इतना डूब जाते थे कि जेबकतरों की तादाद बढ़ने लगी..! संसद से पूछा गया ये क्या माजरा है..? लोग चोरी ना करने का 'सबक' सीखने जा रहे हैं और वहीं उनकी जेब काटने वाले घूम रहे हैं..! सज़ा के ज़रिए सीखने के लिए इंसानों का जेहन नहीं बना है..। मैंने देखा है कैदियों के लिए जेल अजीज़ घर बन जाता है..। क्योंकि वहां उसे अपना 'समाज' मिलता है..। बाहर वो बेगाना था..ये उसकी अपनी दुनिया है..जेलों के भीतर कैद लोगों का मनोभाव ये नहीं होता कि गुनाह सलाखों के पीछे पहुंचाता है..। ये ज़्यादातर पकड़े जाने का ही रंज होता है..ये सही करने का सवाल नहीं है..ग़लत को सही तरीके से करने का हुनर है..और जेल इस हुनर की सबसे आला यूनिवर्सिटी होती है..। सज़ा से कोई नहीं सीखता..। बल्कि कानून तोड़ने के डर से आप सज़ायाफ्ता को बावस्ता करवा देते हैं..। वो जानते हैं पुलिस की मार मिलेगी..। अगर एक इंसान झेल सकता है तो मैं क्यों नहीं..और यूं भी 100 चोरों में से औसतन 2 फीसदी ही पकड़ में आते हैं..और अगर आप 2 फीसदी रिस्क भी ना ले पाएं तो फिर कैसी मर्दानगी..? ये कैसा समाज है जहां कुछ लोगों को सींखचों के भीतर अपनापन तलाशना पड़े..? एक ओर अनवरत इंसानों को पैदा किया जा रहा है..। दूसरी ओर संसाधन चंद लोगों की मुट्ठी में हैं..। हालात पैदा किए जा रहे हैं जहां लोगों के पास अपराध के सिवा कोई चारा ही ना हो..। लेकिन मुझे नहीं लगता अपराध में को कम करने में किसी की भी गंभीर दिलचस्पी है..। वकील, जज, न्याविद्, सरकारें कहां जाएंगी..? ये बड़ी बेरोज़गारी समस्या हो जाएगी..। आप खुद को नैतिक, पाक-साफ मान सकें इसलिए समाज को अपराधी भी चाहिएं..। संत खुद को संत महसूस करे, इसके लिए अपराधी होना भी लाज़िमी है..। अपराधी नहीं होंगे तो फिर संत भी कौन कहलाएगा..? अगर सिर्फ सज़ाओं से जुर्म रुकता तो हमें राम, जीज़स, बुद्ध को याद रखने की क्या ज़रुरत होती..? सभी अच्छे, सच्चे होते तो ये सभी भीड़ का हिस्सा ही होते..। बल्कि जनमानस मूढ़ रहे ये दुनिया के सभी संबुद्धों की साझी साज़िश लगती है..और मैं इसके खिलाफ़ हूं..। लिहाज़ा मानता हूं कि फांसी सिर्फ इस बात का सबूत है कि हमारा सही मायनों में सभ्य होना बाकी है..। दुनिया में अपराधी कौन है..? सिर्फ लोग हैं..तरह-तरह के लोग..। उनमें से कुछ को सबकी साझी करुणा चाहिए..।

गुरुवार, नवंबर 15, 2012

वो जो शायर था




a friend shared these words of Gulzar on facebook;

वो जो शायर था चुप सा रहता था
बहकी-बहकी सी बातें करता था
आँखें कानों पे रख के सुनता था
गूंगी ख़ामोशियों की आवाज़ें
जमा करता था चाँद के साए

गीली-गीली सी नूर की बूंदें
ओक़ में भर के खड़खड़ाता था
रूखे-रूखे से रात के पत्ते
वक़्त के इस घनेरे जंगल में
कच्चे-पक्के से लम्हे चुनता था
हाँ वही वो अजीब सा शायर
रात को उठ के कोहनियों के बल
चाँद की ठोडी चूमा करता था
चाँद से गिर के मर गया है वो
लोग कहते हैं ख़ुदकुशी की है

गुरुवार, सितंबर 27, 2012

भगत सिंह- आज भी अजनबी

मैं भगतसिंह के बारे में कुछ भी कहने के लिए अधिकृत व्यक्ति नहीं हूं. लेकिन एक साधारण आदमी होने के नाते मैं ही अधिकृत व्यक्ति हूं, क्योंकि भगतसिंह के बारे में अगर हम साधारण लोग गम्भीरतापूर्वक बात नहीं करेंगे तो और कौन करेगा. मैं किसी भावुकता या तार्किक जंजाल की वजह से भगतसिंह के व्यक्तित्व को समझने की कोशिश कभी नहीं करता. इतिहास और भूगोल, सामाजिक परिस्थितियों और तमाम बड़ी उन ताकतों की, जिनकी वजह से भगतसिंह का हम मूल्यांकन करते हैं, अनदेखी करके भगतसिंह को देखना मुनासिब नहीं होगा. पहली बात यह कि कि दुनिया के इतिहास में 24 वर्ष की उम्र भी जिसको नसीब नहीं हो, भगतसिंह से बड़ा बुद्धिजीवी कोई हुआ है? भगतसिंह का यह चेहरा जिसमें उनके हाथ में एक किताब हो-चाहे कार्ल मार्क्स की दास कैपिटल, तुर्गनेव या गोर्की या चार्ल्स डिकेन्स का कोई उपन्यास, अप्टान सिन्क्लेयर या टैगोर की कोई किताब-ऐसा उनका चित्र नौजवान पीढ़ी के सामने प्रचारित करने का कोई भी कर्म हिन्दुस्तान में सरकारी और गैर सरकारी संस्थानों सहित भगतसिंह के प्रशंसक-परिवार ने भी लेकिन नहीं किया. भगतसिंह की यही असली पहचान है. भगतसिंह की उम्र का कोई पढ़ा लिखा व्यक्ति क्या भारतीय राजनीति का धूमकेतु बन पाया? महात्मा गांधी भी नहीं, विवेकानन्द भी नहीं. औरों की तो बात ही छोड़ दें. पूरी दुनिया में भगतसिंह से कम उम्र में किताबें पढ़कर अपने मौलिक विचारों का प्रवर्तन करने की कोशिश किसी ने नहीं की. लेकिन भगतसिंह का यही चेहरा सबसे अप्रचारित है. इस उज्जवल चेहरे की तरफ वे लोग भी ध्यान नहीं देते जो सरस्वती के गोत्र के हैं. वे तक भगतसिंह को सबसे बड़ा बुद्धिजीवी कहने में हिचकते हैं. दूसरी शिकायत मुझे खासकर हिन्दी के लेखकों से है. 17 वर्ष की उम्र में भगतसिंह को एक राष्ट्रीय प्रतियोगिता में 'पंजाब में भाषा और लिपि की समस्या' विषय पर 'मतवाला' नाम के कलकत्ता से छपने वाली पत्रिका के लेख पर 50 रुपए का प्रथम पुरस्कार मिला था. भगतसिंह ने 1924 में लिखा था कि पंजाबी भाषा की लिपि गुरुमुखी नहीं देवनागरी होनी चाहिए. यह आज तक हिन्दी के किसी भी लेखक-सम्मेलन ने ऐसा कोई प्रस्ताव पारित नहीं किया है. आज तक हिन्दी के किसी भी बड़े लेखकीय सम्मेलन में भगतसिंह के इस बड़े इरादे को लेकर कोई धन्यवाद प्रस्ताव पारित नहीं किया गया है. उनकी इस स्मृति में भाषायी समरसता का कोई पुरस्कार स्थापित नहीं किया गया. इसके बाद भी हम भगतसिंह का शहादत दिवस मनाते हैं. भगतसिंह की जय बोलते हैं. हम उनके रास्ते पर चलना नहीं चाहते. मैं तो लोहिया के शब्दों में कहूंगा कि रवीन्द्रनाथ टेगौर से भी मुझे शिकायत है कि आपको नोबेल पुरस्कार भले मिल गया हो. लेकिन 'गीतांजलि' तो आपने बांग्ला भाषा और लिपि में ही लिखी. एक कवि को अपनी मातृभाषा में रचना करने का अधिकार है लेकिन भारत के पाठकों को, भारत के नागरिकों को, मुझ जैसे नाचीज व्यक्ति को इतिहास के इस पड़ाव पर खड़े होकर यह भी कहने का अधिकार है कि आप हमारे सबसे बड़े बौद्धिक नेता हैं. लेकिन भारत की देवनागरी लिपि में लिखने में आपको क्या दिक्कत होती. मैं लोहिया के शब्दों में महात्मा गांधी से भी शिकायत करूंगा कि 'हिन्द स्वराज' नाम की आपने अमर कृति 1909 में लिखी वह अपनी मातृभाषा गुजराती में लिखी. लेकिन उसे आप देवनागरी लिपि में भी लिख सकते थे. जो काम गांधी और टैगोर नहीं कर सके. जो काम हिन्दी के लेखक ठीक से करते नहीं हैं. उस पर साहसपूर्वक बात तक नहीं करते हैं. सन् 2009 में भी बात नहीं करते हैं. भगतसिंह जैसे 17 साल के तरुण ने हिन्दुस्तान के इतिहास को रोशनी दी है. उनके ज्ञान-पक्ष की तरफ हम पूरी तौर से अज्ञान बने हैं. फिर भी भगतसिंह की जय बोलने में हमारा कोई मुकाबला नहीं है. तीसरी बात यह है कि भगतसिंह जिज्ञासु विचारक थे, क्लासिकल विचारक नहीं. 23 साल की उम्र का एक नौजवान स्थापनाएं करके चला जाये-ऐसी संभावना भी नहीं हो सकती. भगतसिंह तो विकासशील थे. बन रहे थे. उभर रहे थे. अपने अंतत: तक नहीं पहुंचे थे. हिन्दुस्तान के इतिहास में भगतसिंह एक बहुत बड़ी घटना थे. भगतसिंह को इतिहास और भूगोल के खांचे से निकलकर अगर हम मूल्यांकन करें और भगतसिंह को इतिहास और भूगोल के संदर्भ में रखकर अगर हम विवेचित करें, तो दो अलग अलग निर्णय निकलते हैं. मान लें भगतसिंह 1980 में पैदा हुए होते और 20 वर्ष में बीसवीं सदी चली जाती. उसके बाद 2003 में उनकी हत्या कर दी गई होती. उन्हें शहादत मिल गई होती. तो भगतसिंह का कैसा मूल्यांकन होता. भगतसिंह 1907 में पैदा हुए और 1931 में हमारे बीच से चले गये. ऐसे भगतसिंह का मूल्यांकन कैसा होना चाहिए. भगतसिंह एक ऐसे परिवार में पैदा हुए थे जो राष्ट्रवादी और देशभक्त परिवार था. वे किसी वणिक या तानाशाह के परिवार में पैदा नहीं हुए थे. मनुष्य के विकास में उसके परिवार, मां बाप की परवरिश, चाचा और औरों की भूमिका होती है. भगतसिंह के चाचा अजीत सिंह एक विचारक थे, लेखक थे, देशभक्त नागरिक थे. उनके पिता खुद एक बड़े देशभक्त नागरिक थे. उनका भगतसिंह के जीवन पर असर पड़ा. लाला छबीलदास जैसे पुस्तकालय के प्रभारी से मिली किताबें भगतसिंह ने दीमक की तरह चाटीं. वे कहते हैं कि भगतसिंह किताबों को पढ़ता नहीं था. वह तो निगलता था. 1914 से 1919 के बीच पहला विश्वयुद्ध हुआ. उसका भी भगतंसिंह पर गहरा असर हुआ. भगतसिंह के पिता और चाचा कांग्रेसी थे. भगतसिंह जब राष्ट्रीय राजनीति में धूमकेतु बनकर, ध्रुवतारा बनकर, एक नियामक बनकर उभरने की भूमिका में आए, तब 1928 का वर्ष आया. 1928 हिन्दुस्तान की राजनीति के मोड़ का बहुत महत्वपूर्ण वर्ष है. 1928 में इतनी घटनाएं और अंग्रेजों के खिलाफ इतने आंदोलन हुए जो उसके पहले नहीं हुए थे. जवाहरलाल नेहरू ने अपनी आत्मकथा में लिखा भी है कि 1928 का वर्ष भारी उथलपुथल का, भारी राजनीतिक हलचल का वर्ष था. 1930 में कांग्रेस का रावी अधिवेशन हुआ. 1928 से 1930 के बीच ही कांग्रेस की हालत बदल गई. जो कांग्रेस केवल पिटीशन करती थी, अंग्रेज से यहां से जाने की बातें करती थी. उसको मजबूर होकर लगभग अर्धहिंसक आंदोलनों में भी अपने आपको कभी कभी झोंकना पड़ा. यह भगतसिंह का कांग्रेस की नैतिक ताकत पर मर्दाना प्रभाव था. हिन्दुस्तान की राजनीति में कांग्रेस में पहली बार युवा नेतृत्व अगर कहीं उभर कर आया है तो सुभाष बाबू और जवाहरलाल नेहरू के नाम. कांग्रेस में 1930 में जवाहरलाल नेहरू लोकप्रिय नेता बनकर 39 वर्ष की उम्र में राष्ट्र्रीय अध्यक्ष बने. उनके हाथों तिरंगा झंडा फहराया गया और उन्होंने कहा कि पूर्ण स्वतंत्रता ही हमारा लक्ष्य है. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का यह चरित्र मुख्यत: भगतसिंह की वजह से बदला. भगतसिंह इसके समानांतर एक बड़ा आंदोलन चला रहे थे. लोग गांधीजी को अहिंसा का पुतला कहते हैं और भगतसिंह को हिंसक कह देते हैं. भगतसिंह हिंसक नहीं थे. जो आदमी खुद किताबें पढ़ता था, उसको समझने के लिए अफवाहें गढ़ने की जरूरत नहीं है. उसको समझने के लिए अतिशयोक्ति, अन्योक्ति, ब्याज स्तुति और ब्याज निंदा की जरूरत नहीं है. भगतंसिंह ने 'मैं नास्तिक क्यों हूं' लेख लिखा है. भगतंसिंह ने नौजवान सभा का घोषणा पत्र लिखा जो कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो के समानांतर है. भगतसिंह ने अपनी जेल डायरी लिखी है, जो आधी अधूरी हमारे पास आई है. भगतसिंह ने हिन्दुस्तान रिपब्लिकन आर्मी एसोसिएशन का घोषणा पत्र, उसका संविधान बनाया. पहली बार भगतसिंह ने कुछ ऐसे बुनियादी मौलिक प्रयोग हिन्दुस्तान की राजनीतिक प्रयोगशाला में किए हैं जिसकी जानकारी तक लोगों को नहीं है. भगतंसिंह के मित्र कॉमरेड सोहन सिंह जोश उन्हें कम्युनिस्ट पार्टी में ले जाना चाहते थे, लेकिन भगतंसिंह ने मना कर दिया. जो आदमी कट्टर मार्क्सवादी था, जो रूस के तमाम विद्वानों की पुस्तकों को चाटता था. फांसी के फंदे पर चढ़ने का फरमान पहुंचने के बाद जब जल्लाद उनके पास आया तब बिना सिर उठाए भगतसिंह ने उससे कहा 'ठहरो भाई, मैं लेनिन की जीवनी पढ़ रहा हूं. एक क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से मिल रहा है. थोड़ा रुको.' आप कल्पना करेंगे कि जिस आदमी को कुछ हफ्ता पहले, कुछ दिनों पहले, यह मालूम पड़े कि उसको फांसी होने वाली है. उसके बाद भी रोज किताबें पढ़ रहा है. भगतसिंह मृत्युंजय था. हिन्दुस्तान के इतिहास में इने गिने ही मृत्युंजय हुए हैं. भगतसिंह भारत का पहला नागरिक, विचारक और नेता है जिसने कहा था कि हिन्दुस्तान में केवल किसान और मजदूर के दम पर नहीं, जब तक नौजवान उसमें शामिल नहीं होंगे, तब तक कोई क्रांति नहीं हो सकती. भगतसिंह ने कुछ मौलिक प्रयोग किए थे. इंकलाब जिंदाबाद मूलत: भगतसिंह का नारा नहीं था. वह कम्युनिस्टों का नारा था. लेकिन भगतसिंह ने इसके साथ एक नारा जोड़ा था 'साम्राज्यवाद मुर्दाबाद.' भगतसिंह ने तीसरा एक नारा जोड़ा था 'दुनिया के मजदूरों एक हो.' ये तीन नारे भगतसिंह ने हमको दिए थे. कम्युनिस्ट पार्टी या कम्युनिस्टों का अंतर्राष्ट्र्रीय क्रांति का नारा भगतसिंह की जबान में चढ़ने के बाद अमर हो गया. 'साम्राज्यवाद मुर्दाबाद' का नारा आज भी कुलबुला रहा है हमारे दिलों के अंदर, हमारे मन के अंदर, हमारे सोच में. क्या सोच कर भगतसिंह ने 'साम्राज्यवाद मुर्दाबाद' का नारा दिया होगा. तब तक गांधी जी ने यह नारा नहीं दिया था. क्या सोच कर भगतसिंह ने कहा दुनिया के मजदूरों एक हो. हम उस देश में रहते हैं, जहां अंग्रेजों के बनाए काले कानून आज भी हमारी आत्मा पर शिकंजा कसे हुए हैं और हमको उनकी जानकारी तक नहीं है. हम इस बात में गौरव समझते हैं कि हमने पटवारी को पचास रुपए घूस खाते हुए पकड़वा दिया और हम समाज के बेहद ईमानदार आदमी हैं. हमें बड़ी खुशी होती है, जब लायंस क्लब के अध्यक्ष बनकर हम कोई प्याऊ या मूत्रशाला खोलते हैं और अपनी फोटो छपवाते हैं. हमें बेहद खुशी होती है अपने पड़ोसी को बताते हुए कि हमारा बेटा आईटीआई में फर्स्ट आया है और अमेरिका जाकर वहां की नौकरी कर रहा है और सेवानिवृत्त होने के बाद उसके बच्चों के कपड़े धोने हम भी जाएंगे. इन सब बातों से देश को बहुत गौरव का अनुभव होता है. लेकिन मूलत: भगतसिंह ने कहा क्या था. भगतसिंह भारत का पहला नागरिक, विचारक और नेता है जिसने कहा था कि हिन्दुस्तान में केवल किसान और मजदूर के दम पर नहीं, जब तक नौजवान उसमें शामिल नहीं होंगे, तब तक कोई क्रांति नहीं हो सकती. कोई पार्टी नौजवानों को राजनीति में सीधे आने का आव्हान नहीं करती. यह अलबत्ता बात अच्छी हुई कि राजीव गांधी के कार्यकाल में 18 वर्ष के नौजवान को वोट डालने का अधिकार तो मिला. वरना नौजवान को तो हम बौद्धिक दृष्टि से हिन्दुस्तान की राजनीति में बांझ समझते हैं. हम उस देश में रहते हैं, जहां की सुप्रीम कोर्ट कहती है कि जयललिता जी को इस बात का अधिकार है कि वे हजारों सरकारी कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दें. और सरकारी कर्मचारियों का कोई मौलिक अधिकार नहीं है कि अपने सेवा शर्तों की लड़ाई के लिए धरना भी दे सकें. प्रदर्शन कर सकें. हड़ताल कर सकें. हम उस देश में रहते हैं, जहां नगरपालिकाएं पीने का पानी जनता को मुहैया कराएं, यह उनका मौलिक कर्तव्य नहीं है. अगर नगरपालिका पीने का पानी मुहैया नहीं कराती है तो भी हम टैक्स देने से नहीं बच सकते. इस देश का सुप्रीम कोर्ट और हमारा कानून कहता है कि आपको नगरपालिका पीने का पानी भले मत दे. आप प्यासे भले मर जाएं लेकिन टैक्स आपको देना पड़ेगा क्योंकि उनके और नागरिक के कर्तव्य में कोई पारस्परिक रिश्ता नहीं है. ये जो जंगल का कानून है 1894 का है. हम नदियों का पानी उपयोग कर सकें इसका कानून उन्नीसवीं शताब्दी का है. भारतीय दंड विधान लॉर्ड मैकाले ने 1860 में बनाया था. पूरे देश का कार्य व्यापार सारी दुनिया से हो रहा है वह कांट्रेक्ट एक्ट 1872 में बना था. हमारे जितने बड़े कानून हैं, वे सब उन्नीसवीं सदी की औलाद हैं. बीसवीं सदी तो इस लिहाज से बांझ है. अंग्रेजों की दृष्टि से बनाए गए हर कानून में सरकार को पूरी ताकत दी गई है कि जनता के आंदोलन को कुचलने में सरकार चाहे जो कुछ करे, वह वैध माना जाएगा. आजादी के साठ वर्ष बाद भी इन कानूनों को बदलने के लिए कोई भी सांसद हिम्मत नहीं करता. आवाज तक नहीं उठाता. भगतसिंह संविधान सभा में तो थे नहीं. भगतसिंह ने आजादी तो देखी नहीं. वे कहते थे कि हमको समाजवाद एक जीवित लक्ष्य के रूप में चाहिए जिसमें नौजवान की जरूरी हिस्सेदारी होगी. अस्सी बरस के बूढ़े नेता देश में चुनाव लड़ना चाहते हैं. 75 या 70 बरस के नेता को युवा कह दिया जाता है. 60 वर्ष के तो युवा होते ही होते हैं. हम 25 वर्षों के नौजवानों को संसद में नहीं भेजना चाहते. महात्मा गांधी भी कहते थे इस देश में 60 वर्ष से ऊपर के व्यक्ति को किसी पार्टी को टिकट नहीं देना चाहिए. हम पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा आवारा पशुओं, वेश्याओं और साधुओं के देश हैं. सबसे ज्यादा बेकार, भिखारी, कुष्ठ रोगी, एड्स के रोगी, अपराधी तत्व, नक्सलवादी, भ्रष्ट नेता, चूहे, पिस्सू, वकील हमारे यहां हैं. शायद चीन को छोड़कर लेकिन अब हमारी आबादी भी उससे ज्यादा होने वाली हैं. क्या यही भगतसिंह का देश है. यही भगतसिंह ने चाहा था? असेम्बली में भगतसिंह ने जानबूझकर कच्चा बम फेंका. अंग्रेज को मारने के लिए नहीं. ऐसी जगह बम फेंका कि कोई न मरे. केवल धुआं हो. हल्ला हो. आवाज हो. दुनिया का ध्यान आकर्षित हो. टी डिस्प्यूट बिल और पब्लिक सेफ्टी बिल के खिलाफ भगतसिंह ने जनजागरण किया. कहां है श्रमिक आंदोलन आज? भारत में कैसी लोकशाही बची है? श्रमिक आंदोलनों को कुचल दिया गया है. इस देश में कोई श्रमिक आंदोलन होता ही नहीं है. होने की संभावना भी नहीं है. इस देश की खलनायकी में यहां की विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका तीनों का बराबर का अधिकार है. यह भगतसिंह का सपना नहीं था. यह भगतसिंह का रास्ता नहीं है. एक बिंदु की तरफ अक्सर ध्यान खींचा जाता है अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए कि महात्मा गांधी और भगतसिंह को एक दूसरे का दुश्मन बता दिया जाए. भगतसिंह को गांधी जी का धीरे धीरे चलने वाला रास्ता पसंद नहीं था. लेकिन भगतसिंह हिंसा के रास्ते पर नहीं थे. उन्होंने जो बयान दिया है उस मुकदमे में जिसमें उनको फांसी की सजा मिली है, उतना बेहतर बयान आज तक किसी भी राजनीतिक कैदी ने वैधानिक इतिहास में नहीं दिया. जेल के अंदर छोटी से छोटी चीज भी भगतसिंह के दायरे के बाहर नहीं थी. जेल के अंदर जब कैदियों को ठीक भोजन नहीं मिलता था और सुविधाएं जो मिलनी चाहिए थीं, नहीं मिलती थीं, तो भगतसिंह ने आमरण अनशन किया. उनको तो मिल गया. लेकिन क्या आज हिन्दुस्तान की जेलों में हालत ठीक है? भगतसिंह को संगीत और नाटक का भी शौक था. भगतसिंह के जीवन में ये सब चीजें गायब नहीं थीं. भगतसिंह कोई सूखे आदमी नहीं थे. भगतसिंह को समाज के प्रत्येक इलाके में दिलचस्पी थी. तरह तरह के विचारों से सामना करना उनको आता था. वे एक कुशल पत्रकार थे. आज हमारे अखबार कहां हैं? अमेरिकी पद्धति और सोच के अखबार. जिन्हें पढ़ने में दो मिनट लगता है. आप टीवी क़े चैनल खोलिए. एक तरह की खबर आएगी और सबमें एक ही समय ब्रेक हो जाता है. प्रताप, किरती, महारथी और मतवाला वगैरह तमाम पत्रिकाओं में हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू, पंजाबी में भगतसिंह लिखते थे. उनसे ज्यादा तो किसी ने लिखा ही नहीं उस उम्र में. गणेशशंकर विद्यार्थी की उन पर बहुत मेहरबानी थी. भगतसिंह कुश्ती बहुत अच्छी लड़ते थे. एक बार भगतसिंह और चंद्रशेखर आजाद में दोस्ती वाला झगड़ा हो गया तो भगतसिंह ने चंद्रशेखर आजाद को कुश्ती में चित्त भी कर दिया था. एक बहुरंगी, बहुआयामी जीवन इस नौजवान आदमी ने जिया था. वे मरे हुए या बूढ़े आदमी नहीं थे. खाने पीने का शौक भी भगतसिंह को था. कम से कम दुनिया के 35 ऐसे बड़े लेखक थे जिनको भगतसिंह ने ठीक से पढ़ रखा था. बेहद सचेत दिमाग के 23 साल के नौजवान के प्रति मेरा सिर श्रद्धा से इसलिए भी झुकता है कि समाजवाद के रास्ते पर हिन्दुस्तान के जो और लोग उनके साथ सोच रहे थे, भगतसिंह ने उनके समानांतर एक लकीर खींची लेकिन प्रयोजन से भटककर उनसे विवाद उत्पन्न नहीं किया जिससे अंगरेजी सल्तनत को फायदा हो. मुझे लगता है कि हिन्दुस्तान की राजनीति में कुछ लोगों को मिलकर काम करना चाहिए था. मुझे आज तक समझ में नहीं आया कि महात्मा गांधी और विवेकानंद मिलकर हिन्दुस्तान की राजनीतिक दिशा पर बात क्यों नहीं कर पाये. गांधीजी उनसे मिलने बेलूर मठ गए थे लेकिन विवेकानंद की बीमारी की वजह से सिस्टर निवेदिता ने उनसे मिलने नहीं दिया था. समझ में नहीं आता कि भगतसिंह जैसा विद्वान विचारक विवेकानंद के समाजवाद पर कुछ बोला क्यों नहीं, जबकि विवेकानंद के छोटे भाई भूपेन्द्रनाथ दत्त को भगतसिंह ने भाषण देने बुलाया था. यह नहीं कहा जा सकता कि विवेकानंद के विचारों से भगतसिंह परिचित नहीं थे. उनके चेहरे से बहुत से कंटूर उभरते हैं, जिसको देखने की ताब हममें होनी चाहिए. भगतसिंह समाजवाद और धर्म को अलग अलग समझते थे. विवेकानंद समाजवाद और धर्म को सम्पृक्त करते थे. विवेकानंद समझते थे कि हिन्दुस्तान की धार्मिक जनता को धर्म के आधार पर समाजवाद की घुट्टी अगर पिलायी जाए तो शायद ठीक से समझ में बात आएगी. गांधीजी भी लगभग इसी रास्ते पर चलने की कोशिश करते थे. लेकिन भगतसिंह हिन्दुस्तान का पहला रेशनल थिंकर, पहला विचारशील व्यक्ति था जो धर्म के दायरे से बाहर था. श्रीमती दुर्गादेवी वोहरा को लेकर जब भगतसिंह को अंग्रेज जल्लादों से बचने के लिए अपने केश काटकर प्रथम श्रेणी के डब्बे में कलकत्ता तक की यात्रा करनी पड़ी तो लोगों ने आलोचना की. उन्होंने कहा कि सिख होकर अपने केश कटा लिए आपने? हमारे यहां तो पांच चीजें रखनी पड़ती हैं हर सिख को. उसमें केश भी होता है. यह आपने क्या किया. कैसे सिख हैं आप! जो सज्जन सवाल पूछ रहे थे वे शायद धार्मिक व्यक्ति थे. भगतसिंह ने एक धार्मिक व्यक्ति की तरह जवाब दिया कि मेरे भाई तुम ठीक कहते हो. मैं सिख हूं. गुरु गोविंद सिंह ने कहा है कि अपने धर्म की रक्षा करने के लिए अपने शरीर का अंग अंग कटवा दो. मैंने केश कटवा दिए. अब मौका मिलेगा तो अपनी गरदन कटवा दूंगा. यह तार्किक विचारशीलता भगतसिंह की है. उस नए हिन्दुस्तान में वे 1931 के पहले कह रहे थे जिसमें हिन्दुस्तान के गरीब आदमी, इंकलाब और आर्थिक बराबरी के लिए, समाजवाद को पाने के लिए, देश और चरित्र को बनाने के लिए, दुनिया में हिन्दुस्तान का झंडा बुलंद करने के लिए धर्म जैसी चीज की हमको जरूरत नहीं होनी चाहिए. आज हम उसी में फंसे हुए हैं. क्या सबूत है कि अयोध्या में राम हुए थे? क्या सबूत है कि मंदिर बन जाने पर रामचंद्र जी वहां आकर विराजेंगे. क्या जरूरत है किसी मस्जिद को तोड़ दिया जाए. क्या जरूरत है कि देश के छोटे छोटे मंदिरों को तोड़ दिया जाए. क्या जरूरत है कि होली दीवाली के त्यौहार पर और कोई बम फेंक दे. इन सारे सवालों का जवाब हम 2009 में ढूंढ़ नहीं पा रहे हैं. भगतसिंह ने शहादत दे दी, फकत इतना कहना भगतसिंह के कद को छोटा करना है. जितनी उम्र में भगतसिंह कुर्बान हो गए, इससे कम उम्र में मदनलाल धींगरा और शायद करतार सिंह सराभा चले गए थे. भगतसिंह ने तो स्वयं मृत्यु का वरण किया. यदि वे पंजाब की असेंबली में बम नहीं फेंकते तो क्या होता. कांग्रेस के इतिहास को भगतसिंह का ऋणी होना पड़ेगा. लाला लाजपत राय, बिपिनचंद्र पाल और बालगंगाधर तिलक ने कांग्रेस की अगुआई की थी. भगतसिंह लाला लाजपत राय के समर्थक और अनुयायी शुरू में थे. उनका परिवार आर्य समाजी था. भूगोल और इतिहास से काटकर भगतसिंह के कद को एक बियाबान में नहीं देखा जा सकता. जब लाला लाजपत राय की जलियान वाला बाग की घटना के दौरान लाठियों से कुचले जाने की वजह से मृत्यु हो गई तो भगतसिंह ने केवल उस बात का बदला लेने के लिए एक सांकेतिक हिंसा की और सांडर्स की हत्या हुई. भगतसिंह चाहते तो और जी सकते थे. यहां वहां आजादी की अलख जगा सकते थे. बहुत से क्रांतिकारी भगतसिंह के साथी जिए ही. लेकिन भगतसिंह ने सोचा कि यही वक्त है जब इतिहास की सलवटों पर शहादत की इस्तरी चलाई जा सकती है. जिसमें वक्त के तेवर पढ़ने का माधा हो, ताकत हो वही इतिहास पुरुष होता है. भगतसिंह ने गांधी के समर्थन में भी लिखा है. उनके रास्ते निस्संदेह अलग अलग थे. उनकी समझ अलग अलग थी. जब गांधीजी केन्द्र में थे. कांग्रेस के अंदर एक बार भूचाल आया. भगतसिंह ने सारी दुनिया का ध्यान अंग्रेज हुक्मरानों के अन्याय की ओर खींचा और जानबूझकर असेंबली बम कांड रचा. भगतसिंह इतिहास की समझ के एक बहुत बड़े नियंता थे. हम उस भगतसिंह की बात ज्यादा क्यों नहीं करते? भगतसिंह का एक बहुत प्यारा चित्र है जिसमें वे चारपाई पर बैठे हुए हैं. उस चेहरे में हिन्दुस्तान नजर आता है. ऐसा लगता है कि हिन्दुस्तान बैठा हुआ है. भगतसिंह पर जितनी शोधपरक किताबें लिखी जानी चाहिए थी, उतनी अच्छी किताबें अब भी नहीं लिखी गई हैं. कुछ लोग भगतसिंह के जन्मदिन और शहादत के पर्व को हाल तक मनाते थे. अब उनके हाथ में साम्प्रदायिकता के दूसरे झंडे आ गए हैं. उनको भगतसिंह काम का नजर नहीं आता. किसी भी राजनीतिक पार्टी के घोषणा पत्र को पढ़िए. उनके भी जो समाजवाद का डंका पीट रहे हैं. तो लगेगा कि सब ढकोसला है. हममें से कोई काबिल नहीं है जो भगतसिंह का वंशज कहलाने का अधिकारी हो. भगतसिंह की याद करने का अधिकारी हो. हम उस रास्ते को भूल चुके हैं. अमेरिका के साम्राज्यवाद के सामने हम गुलामी कर रहे हैं. हम पश्चिम के सामने बिक रहे हैं. बिछ रहे हैं. इसके बाद भी हम कहते हैं हिन्दुस्तान को बड़ा देश बनाएंगे. गांधी और भगतसिंह में एक गहरी राजनीतिक समझ थी. भगतसिंह ने गांधी के समर्थन में भी लिखा है. उनके रास्ते निस्संदेह अलग अलग थे. उनकी समझ अलग अलग थी. जब गांधीजी केन्द्र में थे. कांग्रेस के अंदर एक बार भूचाल आया. गांधीजी के भगतसिंह सम्बन्धी विचार को नकारने की स्थिति आई. उस समय 1500 में लगभग आधे वोट भगतसिंह के समर्थन में आए. भगतसिंह को समर्थन देना या नहीं देना इस पर कांग्रेस विभाजित हो गई. इसी वजह से युवा जवाहरलाल नेहरू को 1930 में रावी कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया. कांग्रेस के जिस दूसरे नौजवान नेता ने भगतसिंह का वकील बनकर मुकदमा लड़ने की पेशकश की और गांधी का विरोध किया, वह सुभाष बोस 1938 में हरिपुरा और फिर 1939 में त्रिपुरी की कांग्रेस में गांधी के उम्मीदवार को हराकर कांग्रेस का अध्यक्ष बना. इन सबमें भगतसिंह का पुण्य, याद और कशिश है. नौजवानों को आगे करने की जो जुगत भगतसिंह ने बनाई थी, जो राह बताई थी, उस रास्ते पर भारत का इतिहास नहीं चला. मैं नहीं समझता कि नौजवान केवल ताली बजाने के लायक हैं. मैं नहीं समझता कि हिन्दुस्तान के नौजवानों को राजनीति से अलग रखना चाहिए. मैं नहीं समझता कि हिन्दुस्तान के 18 वर्ष के नौजवान जो वोट देने का अधिकार रखते हैं उनको राजनीति की समझ नहीं है. जब अस्सी नब्बे वर्ष के लोग सत्ता की कुर्सी का मोह नहीं छोड़ सकते तो नौजवान को हिन्दुस्तान की राजनीति से अलग करना मुनासिब नहीं है. लेकिन राजनीति का मतलब कुर्सी नहीं है. भगतसिंह ने कहा था जब तक हिन्दुस्तान के नौजवान हिन्दुस्तान के किसान के पास नहीं जाएंगे, गांव नहीं जाएंगे. उनके साथ पसीना बहाकर काम नहीं करेंगे तब तक हिन्दुस्तान की आजादी का कोई मुकम्मिल अर्थ नहीं होगा. मैं हताश तो नहीं हूं लेकिन निराश लोगों में से हूं. मैं मानता हूं कि हिन्दुस्तान को पूरी आजादी नहीं मिली है. जब तक ये अंगरेजों के बनाए काले कानून हमारे सर पर हैं, संविधान की आड़ में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट से लेकर हमारे मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री फतवे जारी करते हैं कि संविधान की रक्षा होनी है. किस संविधान की रक्षा होनी चाहिए? संविधान में अमेरिका, आस्ट्रेलिया, केनेडा, स्विट्जरलैंड, जर्मनी, जापान और कई और देशों की अनुगूंजें शामिल हैं. इसमें याज्ञवल्क्य, मैत्रेयी, चार्वाक, कौटिल्य और मनु के अनुकूल विचारों के अंश नहीं हैं. गांधी नहीं हैं. भगतसिंह नहीं हैं. लोहिया नहीं हैं. इसमें केवल भारत नहीं है. हम एक अंतर्राष्ट्रीय साजिश का शिकार हैं. हमको यही बताया जाता है कि डॉ अंबेडकर ने हिन्दुस्तान के संविधान की रचना की. भारत के स्वतंत्रता संग्राम सैनिकों ने हिन्दुस्तान के संविधान की रचना की. संविधान की पोथी को बनाने वाली असेम्बली का इतिहास पढ़ें. सेवानिवृत्त आईसीएस अधिकारी, दीवान साहब और राय बहादुर और कई पश्चिमाभिमुख बुद्धिजीवियों ने मूल पाठ बनाया. देशभक्तों ने उस पर बहस की. उस पर दस्तखत करके उसको पेश कर दिया. संविधान की पोथी का अपमान नहीं होना चाहिए लेकिन जब हम रामायण, गीता, कुरान शरीफ, बाइबिल और गुरु ग्रंथ साहब पर बहस कर सकते हैं कि इनके सच्चे अर्थ क्या होने चाहिए. तो हमको हिन्दुस्तान की उस पोथी की जिसकी वजह से सारा देश चल रहा है, आयतों को पढ़ने, समझने और उसके मर्म को बहस के केन्द्र में डालने का भी अधिकार मिलना चाहिए. यही भगतसिंह का रास्ता है. भगतसिंह ने कभी नहीं कहा कि किसी की बात को तर्क के बिना मानो. जब मैं भगतसिंह से तर्क करता हूं. बहस करता हूं. तब मैं पाता हूं कि भगतसिंह के तर्क में भावुकता है और भगतसिंह की भावना में तर्क है. भगतसिंह हिन्दुस्तान का पहला नेता था, पूरी क्रांतिकारी सेना में भगतसिंह अकेला था, जिसने दिल्ली के सम्मेलन में कहा कि हमें सामूहिक नेतृत्व के जरिए पार्टी को चलाने का शऊर सीखना चाहिए. वह तमीज सीखनी चाहिए ताकि हममें से कोई अगर चला जाए तो पार्टी मत बिखरे. भगतसिंह ने सबसे पहले देश में कहा था कि व्यक्ति से पार्टी बड़ी होती है. पार्टी से सिद्धांत बड़ा होता है. हम यह सब भूल गए. हमको केवल तमंचे वाला भगतसिंह याद है. अगर कोई थानेदार अत्याचार करता है तो हमको लगता है भगतसिंह की तरह हम उसे गोली मार दें. हम उसको अजय देवगन समझते हैं या धर्मेन्द्र का बेटा. भगतसिंह किताबों में कैद है. उसको किताबों से बाहर लाएं. भगतसिंह विचारों के तहखाने में कैद है. उसको बहस के केन्द्र में लाएं. इसका रास्ता भी भगतसिंह ने ही बताया था. भगतसिंह ने कहा था कि ये बड़े बड़े अखबार तो बिके हुए हैं. इनके चक्कर में क्यों पड़ते हो. भगतसिंह और उनके साथी छोटे छोटे ट्रैक्ट 16 और 24 पृष्ठों की पत्रिकाएं छाप कर आपस में बांटते थे. हम यही कर लें तो इतनी ही भगतसिंह की सेवा बहुत है. विचारों की सान पर अगर कोई चीज चढ़ेगी वही तलवार बनेगी. यह भगतसिंह ने हमको सिखाया था. कुछ बुनियादी बातें ऐसी हैं जिनकी तरफ हमको ध्यान देना होगा. हमारे देश में से तार्किकता, बहस, लोकतांत्रिक आजादी, जनप्रतिरोध, सरकारों के खिलाफ अराजक होकर खड़े हो जाने का अधिकार छिन रहा है. हमारे देश में मूर्ख राजा हैं. वे सत्ता पर लगातार बैठ रहे हैं. जिन्हें ठीक से हस्ताक्षर नहीं करना आता वो देश के राजनीतिक चेक पर दस्तखत कर रहे हैं. हमारे यहां एक आई एम सॉरी सर्विस आ गई है. आईएएस क़ी नौकरशाही. उसमें अब भ्रष्ट अधिकारी इतने ज्यादा हैं कि अच्छे अधिकारी ढूंढ़ना मुश्किल है. हमारे देश में निकम्मे साधुओं की जमात है. वे निकम्मे हैं लेकिन मलाई खाते हैं. इस देश के मेहनतकश मजदूर के लिए अगर कुछ रुपयों के बढ़ने की बात होती है, सब उनसे लड़ने बैठ जाते हैं. हमारे देश में असंगठित मजदूरों का बहुत बड़ा दायरा है. हम उनको संगठित करने की कोशिश नहीं करते. हमारे देश में पहले से ही सुरक्षित लोगों के अधिकारों की सुरक्षा के कानून बने हुए हैं. लेकिन भारत की संसद ने आज तक नहीं सोचा कि भारत के किसानों के भी अधिकार होने चाहिए. भारतीय किसान अधिनियम जैसा कोई अधिनियम नहीं है. किसान की फसल का कितना पैसा उसको मिले वह कुछ भी तय नहीं है. एक किसान अगर सौ रुपये के बराबर का उत्पाद करता है तो बाजार में उपभोक्ता को वह वस्तु हजार रुपये में मिलती है. आठ सौ नौ सौ रुपये बिचवाली, बिकवाली और दलाली में खाए जाते हैं. उस पर भी सरकार का संरक्षण होता है और सरकार खुद दलाली भी करती है. ऐसे किसानों की रक्षा के लिए भगतसिंह खड़े हुए थे. भगतसिंह ने कभी नहीं कहा कि देश के उद्योगपतियो एक हो जाओ. भगतसिंह ने कभी नहीं कहा कि अपनी बीवी के जनमदिन पर हवाई जहाज तोहफे में भेंट करो और उसको देश का गौरव बताओ. भगतसिंह ने कभी नहीं कहा कि वकीलो एक हो जाओ क्योंकि वकील होने के नाते मुझे पता है कि वकीलों को एक रखना और मेंढकों को तराजू पर रखकर तौलना बराबर की बात है. भगतसिंह ने कभी नहीं कहा कि देश के डॉक्टरों को एक करो. उनको मालूम था कि अधिकतर डॉक्टर केवल मरीज के जिस्म और उसके प्राणों से खेलते हैं. उनका सारा ध्येय इस बात का होता है कि उनको फीस ज्यादा से ज्यादा कैसे मिले. अपवाद जरूर हैं. लेकिन अपवाद नियम को ही सिद्ध करते हैं. इसलिए भगतसिंह ने कहा था दुनिया के मजदूरो एक हो. इसलिए भगतसिंह ने कहा था कि किसान मजदूर और नौजवान की एकता होनी चाहिए. भगतसिंह पर राष्ट्रवाद का नशा छाया हुआ था. लेकिन उनका रास्ता मार्क्स के रास्ते से निकल कर आता था. एक अजीब तरह का राजनीतिक प्रयोग भारत की राजनीति में होने वाला था. लेकिन भगतसिंह काल कवलित हो गए. असमय चले गए. भगतसिंह संभावनाओं के जननायक थे. वे हमारे अधिकारिक, औपचारिक नेता बन नहीं पाए. इसलिए सब लोग भगतसिंह से डरते हैं-अंगरेज और भारतीय हुक्मरान दोनों. उनके विचारों को क्रियान्वित करने में सरकारी कानूनों की घिग्गी बंध जाती है. संविधान पोषित राज्य व्यवस्थाओं में यदि कानून ही अजन्मे रहेंगे तो लोकतंत्र की प्रतिबद्धताओं का क्या होगा? भगतसिंह ने इतने अनछुए सवालों का र्स्पश किया है कि उन पर अब भी शोध होना बाकी है. भगतसिंह के विचार केवल प्रशंसा के योग्य नहीं हैं, उन पर क्रियान्वयन कैसे हो-इसके लिए बौद्धिक और जन आन्दोलनों की जरूरत है. - कनक तिवारी का लेख जो ravivar.com में छपा

शुक्रवार, मई 11, 2012

मैं क्या लिखता हूं..

--------------------सदाअत हसन मंटो का आलेख----------------------- मैं क्यों लिखता हूँ? यह एक ऐसा सवाल है कि मैं क्यों खाता हूँ... मैं क्यों पीता हूँ... लेकिन इस दृष्टि से मुख़तलिफ है कि खाने और पीने पर मुझे रुपए खर्च करने पड़ते हैं और जब लिखता हूँ तो मुझे नकदी की सूरत में कुछ खर्च करना नहीं पड़ता. पर जब गहराई में जाता हूँ तो पता चलता है कि यह बात ग़लत है इसलिए कि मैं रुपए के बलबूते पर ही लिखता हूँ. अगर मुझे खाना-पीना न मिले तो ज़ाहिर है कि मेरे अंग इस हालत में नहीं होंगे कि मैं कलम हाथ में पकड़ सकूँ. हो सकता है, फ़ाकाकशी की हालत में दिमाग चलता रहे, मगर हाथ का चलना तो ज़रूरी है. हाथ न चले तो ज़बान ही चलनी चाहिए. यह कितनी बड़ी ट्रेजडी है कि इंसान खाए-पिए बग़ैर कुछ भी नहीं कर सकता. लोग कला को इतना ऊँचा रूतबा देते हैं कि इसके झंडे सातवें असमान से मिला देते हैं. मगर क्या यह हक़ीक़त नहीं कि हर श्रेष्ठ और महान चीज़ एक सूखी रोटी की मोहताज है? मैं लिखता हूँ इसलिए कि मुझे कुछ कहना होता है. मैं लिखता हूँ इसलिए कि मैं कुछ कमा सकूँ ताकि मैं कुछ कहने के काबिल हो सकूँ. रोटी और कला का संबंध प्रगट रूप से अजीब-सा मालूम होता है, लेकिन क्या किया जाए कि ख़ुदाबंद ताला को यही मंज़ूर है. वह ख़ुद को हर चीज़ से निरपेक्ष कहता है-यह गलत है. वह निरपेक्ष हरगिज नहीं है. इसको इबादत चाहिए. और इबादत बड़ी ही नर्म और नाज़ुक रोटी है बल्कि यूँ कहिए, चुपड़ी हुई रोटी है जिससे वह अपना पेट भरता है. मेरे पड़ोस में अगर कोई औरत हर रोज़ खाविंद से मार खाती है और फिर उसके जूते साफ़ करती है तो मेरे दिल में उसके लिए ज़र्रा बराबर हमदर्दी पैदा नहीं होती. लेकिन जब मेरे पड़ोस में कोई औरत अपने खाविंद से लड़कर और खुदकशी की धमकी देकर सिनेमा देखने चली जाती है और मैं खाविंद को दो घंटे सख़्त परेशानी की हालत में देखता हूँ तो मुझे दोनों से एक अजीब व ग़रीब क़िस्म की हमदर्दी पैदा हो जाती है. किसी लड़के को लड़की से इश्क हो जाए तो मैं उसे ज़ुकाम के बराबर अहमियत नहीं देता, मगर वह लड़का मेरी तवज्जो को अपनी तरफ ज़रूर खींचेगा जो जाहिर करे कि उस पर सैकड़ो लड़कियाँ जान देती हैं लेकिन असल में वह मुहब्बत का इतना ही भूखा है कि जितना बंगाल का भूख से पीड़ित वाशिंदा. इस बज़ाहिर कामयाब आशिक की रंगीन बातों में जो ट्रेजडी सिसकियाँ भरती होगी, उसको मैं अपने दिल के कानों से सुनूंगा और दूसरों को सुनाऊंगा. चक्की पीसने वाली औरत जो दिन भर काम करती है और रात को इत्मिनान से सो जाती है, मेरे अफ़सानों की हीरोइन नहीं हो सकती. मेरी हीरोइन चकले की एक टखयाई रंडी हो सकती है. जो रात को जागती है और दिन को सोते में कभी-कभी यह डरावना ख्वाब देखकर उठ बैठती है कि बुढ़ापा उसके दरवाज़े पर दस्तक देने आ रहा है. उसके भारी-भारी पपोटे, जिनमें वर्षों की उचटी हुई नींद जम गई है, मेरे अफ़सानों का मौजूँ (विषय) बन सकते हैं. उसकी गलाजत, उसकी बीमारियाँ, उसका चिड़चिड़ापन, उसकी गालियाँ-ये सब मुझे भाती हैं-मैं उसके मुताल्लिक लिखता हूँ और घरेलू औरतों की शस्ताकलामियों, उनकी सेहत और उनकी नफ़ासत पसंदी को नज़रअंदाज कर जाता हूँ. सआदत हसन मंटो लिखता है इसलिए कि यह खुदा जितना बड़ा अफसाना साज और शायर नहीं, यह उसकी आजिजी जो उससे लिखवाती है. मैं जानता हूँ कि मेरी शख्सियत बहुत बड़ी है और उर्दू साहित्य में मेरा बड़ा नाम है. अगर यह ख़ुशफ़हमी न हो तो ज़िदगी और भी मुश्किल बन जाए. पर मेरे लिए यह एक तल्ख़ हक़ीकत है कि अपने मुल्क में, जिसे पाकिस्तान कहते हैं, मैं अपना सही स्थान ढूंढ नहीं पाया हूँ. यही वजह है कि मेरी रूह बेचैन रहती है. मैं कभी पागलखाने में और कभी अस्पताल में रहता हूँ. मुझसे पूछा जाता है कि मैं शराब से अपना पीछा क्यों नहीं छुड़ा लेता? मैं अपनी जिंदगी का तीन-चौथाई हिस्सा बदपरहेजियों की भेट चढ़ा चुका हूँ. अब तो यह हालत है- मैं कभी पागलखाने में और कभी अस्पताल में रहता हूँ. मैं समझता हूँ कि जिंदगी अगर परहेज़ से गुजारी जाए तो एक क़ैद है. अगर वह बदपरहेजियों से गुज़ारी जाए तो भी एक क़ैद है. किसी न किसी तरह हमें इस जुराब के धागे का एक सिरा पकड़कर उधेड़ते जाना है और बस.

शनिवार, अक्तूबर 08, 2011

It's a must read, folks...



This is a text of the Commencement address delivered by Steve Jobs, CEO of Apple Computer and of Pixar Animation Studios, on June 12, 2005.


I am honored to be with you today at your commencement from one of the finest universities in the world. I never graduated from college. Truth be told, this is the closest I've ever gotten to a college graduation. Today I want to tell you three stories from my life. That's it. No big deal. Just three stories.

The first story is about connecting the dots.

I dropped out of Reed College after the first 6 months, but then stayed around as a drop-in for another 18 months or so before I really quit. So why did I drop out?

It started before I was born. My biological mother was a young, unwed college graduate student, and she decided to put me up for adoption. She felt very strongly that I should be adopted by college graduates, so everything was all set for me to be adopted at birth by a lawyer and his wife. Except that when I popped out they decided at the last minute that they really wanted a girl. So my parents, who were on a waiting list, got a call in the middle of the night asking: "We have an unexpected baby boy; do you want him?" They said: "Of course." My biological mother later found out that my mother had never graduated from college and that my father had never graduated from high school. She refused to sign the final adoption papers. She only relented a few months later when my parents promised that I would someday go to college.

And 17 years later I did go to college. But I naively chose a college that was almost as expensive as Stanford, and all of my working-class parents' savings were being spent on my college tuition. After six months, I couldn't see the value in it. I had no idea what I wanted to do with my life and no idea how college was going to help me figure it out. And here I was spending all of the money my parents had saved their entire life. So I decided to drop out and trust that it would all work out OK. It was pretty scary at the time, but looking back it was one of the best decisions I ever made. The minute I dropped out I could stop taking the required classes that didn't interest me, and begin dropping in on the ones that looked interesting.

It wasn't all romantic. I didn't have a dorm room, so I slept on the floor in friends' rooms, I returned coke bottles for the 5¢ deposits to buy food with, and I would walk the 7 miles across town every Sunday night to get one good meal a week at the Hare Krishna temple. I loved it. And much of what I stumbled into by following my curiosity and intuition turned out to be priceless later on. Let me give you one example:

Reed College at that time offered perhaps the best calligraphy instruction in the country. Throughout the campus every poster, every label on every drawer, was beautifully hand calligraphed. Because I had dropped out and didn't have to take the normal classes, I decided to take a calligraphy class to learn how to do this. I learned about serif and san serif typefaces, about varying the amount of space between different letter combinations, about what makes great typography great. It was beautiful, historical, artistically subtle in a way that science can't capture, and I found it fascinating.

None of this had even a hope of any practical application in my life. But ten years later, when we were designing the first Macintosh computer, it all came back to me. And we designed it all into the Mac. It was the first computer with beautiful typography. If I had never dropped in on that single course in college, the Mac would have never had multiple typefaces or proportionally spaced fonts. And since Windows just copied the Mac, it's likely that no personal computer would have them. If I had never dropped out, I would have never dropped in on this calligraphy class, and personal computers might not have the wonderful typography that they do. Of course it was impossible to connect the dots looking forward when I was in college. But it was very, very clear looking backwards ten years later.

Again, you can't connect the dots looking forward; you can only connect them looking backwards. So you have to trust that the dots will somehow connect in your future. You have to trust in something — your gut, destiny, life, karma, whatever. This approach has never let me down, and it has made all the difference in my life.

My second story is about love and loss.

I was lucky — I found what I loved to do early in life. Woz and I started Apple in my parents garage when I was 20. We worked hard, and in 10 years Apple had grown from just the two of us in a garage into a $2 billion company with over 4000 employees. We had just released our finest creation — the Macintosh — a year earlier, and I had just turned 30. And then I got fired. How can you get fired from a company you started? Well, as Apple grew we hired someone who I thought was very talented to run the company with me, and for the first year or so things went well. But then our visions of the future began to diverge and eventually we had a falling out. When we did, our Board of Directors sided with him. So at 30 I was out. And very publicly out. What had been the focus of my entire adult life was gone, and it was devastating.

I really didn't know what to do for a few months. I felt that I had let the previous generation of entrepreneurs down - that I had dropped the baton as it was being passed to me. I met with David Packard and Bob Noyce and tried to apologize for screwing up so badly. I was a very public failure, and I even thought about running away from the valley. But something slowly began to dawn on me — I still loved what I did. The turn of events at Apple had not changed that one bit. I had been rejected, but I was still in love. And so I decided to start over.

I didn't see it then, but it turned out that getting fired from Apple was the best thing that could have ever happened to me. The heaviness of being successful was replaced by the lightness of being a beginner again, less sure about everything. It freed me to enter one of the most creative periods of my life.

During the next five years, I started a company named NeXT, another company named Pixar, and fell in love with an amazing woman who would become my wife. Pixar went on to create the worlds first computer animated feature film, Toy Story, and is now the most successful animation studio in the world. In a remarkable turn of events, Apple bought NeXT, I returned to Apple, and the technology we developed at NeXT is at the heart of Apple's current renaissance. And Laurene and I have a wonderful family together.

I'm pretty sure none of this would have happened if I hadn't been fired from Apple. It was awful tasting medicine, but I guess the patient needed it. Sometimes life hits you in the head with a brick. Don't lose faith. I'm convinced that the only thing that kept me going was that I loved what I did. You've got to find what you love. And that is as true for your work as it is for your lovers. Your work is going to fill a large part of your life, and the only way to be truly satisfied is to do what you believe is great work. And the only way to do great work is to love what you do. If you haven't found it yet, keep looking. Don't settle. As with all matters of the heart, you'll know when you find it. And, like any great relationship, it just gets better and better as the years roll on. So keep looking until you find it. Don't settle.

My third story is about death.

When I was 17, I read a quote that went something like: "If you live each day as if it was your last, someday you'll most certainly be right." It made an impression on me, and since then, for the past 33 years, I have looked in the mirror every morning and asked myself: "If today were the last day of my life, would I want to do what I am about to do today?" And whenever the answer has been "No" for too many days in a row, I know I need to change something.

Remembering that I'll be dead soon is the most important tool I've ever encountered to help me make the big choices in life. Because almost everything — all external expectations, all pride, all fear of embarrassment or failure - these things just fall away in the face of death, leaving only what is truly important. Remembering that you are going to die is the best way I know to avoid the trap of thinking you have something to lose. You are already naked. There is no reason not to follow your heart.

About a year ago I was diagnosed with cancer. I had a scan at 7:30 in the morning, and it clearly showed a tumor on my pancreas. I didn't even know what a pancreas was. The doctors told me this was almost certainly a type of cancer that is incurable, and that I should expect to live no longer than three to six months. My doctor advised me to go home and get my affairs in order, which is doctor's code for prepare to die. It means to try to tell your kids everything you thought you'd have the next 10 years to tell them in just a few months. It means to make sure everything is buttoned up so that it will be as easy as possible for your family. It means to say your goodbyes.

I lived with that diagnosis all day. Later that evening I had a biopsy, where they stuck an endoscope down my throat, through my stomach and into my intestines, put a needle into my pancreas and got a few cells from the tumor. I was sedated, but my wife, who was there, told me that when they viewed the cells under a microscope the doctors started crying because it turned out to be a very rare form of pancreatic cancer that is curable with surgery. I had the surgery and I'm fine now.

This was the closest I've been to facing death, and I hope it's the closest I get for a few more decades. Having lived through it, I can now say this to you with a bit more certainty than when death was a useful but purely intellectual concept:

No one wants to die. Even people who want to go to heaven don't want to die to get there. And yet death is the destination we all share. No one has ever escaped it. And that is as it should be, because Death is very likely the single best invention of Life. It is Life's change agent. It clears out the old to make way for the new. Right now the new is you, but someday not too long from now, you will gradually become the old and be cleared away. Sorry to be so dramatic, but it is quite true.

Your time is limited, so don't waste it living someone else's life. Don't be trapped by dogma — which is living with the results of other people's thinking. Don't let the noise of others' opinions drown out your own inner voice. And most important, have the courage to follow your heart and intuition. They somehow already know what you truly want to become. Everything else is secondary.

When I was young, there was an amazing publication called The Whole Earth Catalog, which was one of the bibles of my generation. It was created by a fellow named Stewart Brand not far from here in Menlo Park, and he brought it to life with his poetic touch. This was in the late 1960's, before personal computers and desktop publishing, so it was all made with typewriters, scissors, and polaroid cameras. It was sort of like Google in paperback form, 35 years before Google came along: it was idealistic, and overflowing with neat tools and great notions.

Stewart and his team put out several issues of The Whole Earth Catalog, and then when it had run its course, they put out a final issue. It was the mid-1970s, and I was your age. On the back cover of their final issue was a photograph of an early morning country road, the kind you might find yourself hitchhiking on if you were so adventurous. Beneath it were the words: "Stay Hungry. Stay Foolish." It was their farewell message as they signed off. Stay Hungry. Stay Foolish. And I have always wished that for myself. And now, as you graduate to begin anew, I wish that for you.

Stay Hungry. Stay Foolish.

Thank you all very much.

गुरुवार, सितंबर 01, 2011

चक्रव्यूह और मैं..

कौन था मैं और कैसा था, ये मुझे याद ही ना रहेगा;
चक्रव्यूह में घुसने के बाद
मेरे और चक्रव्यूह के बीच,
सिर्फ एक जानलेवा निकटता थी,
इसका मुझे पता ही नहीं चलेगा..
चक्रव्यूह से निकलने के बाद,
मैं मुक्त हो जाऊं भले ही,
फिर भी चक्रव्यूह की रचना में फर्क ही ना पड़ेगा.
मरूं या मारूं, मारा जाऊं या जान से मार दूं,
इसका फैसला कभी ना हो पाएगा.
सोया हुआ आदमी जब नींद से उठकर चलना शुरु करेगा,
तब सपनों का संसार उसे,
दोबारा दिख ही ना पाएगा.
उस रोशनी में जो निर्णय की रोशनी है, सब कुछ समान होगा क्या?
एक पलड़े में नपुंसकता, एक पलड़े में पौरुष,
और ठीक तराज़ू के कांटे पर अर्धसत्य...

बुधवार, अगस्त 17, 2011

जनतंत्र के सूर्योदय में




रक्तपात –
कहीं नहीं होगा
सिर्फ़, एक पत्ती टूटेगी!
एक कन्धा झुक जायेगा!
फड़कती भुजाओं और सिसकती हुई आँखों को
एक साथ लाल फीतों में लपेटकर
वे रख देंगे
काले दराज़ों के निश्चल एकान्त में
जहाँ रात में
संविधान की धाराएँ
नाराज़ आदमी की परछाईं को
देश के नक्शे में
बदल देती है

पूरे आकाश को
दो हिस्सों में काटती हुई
एक गूँगी परछाईं गुज़रेगी
दीवारों पर खड़खड़ाते रहेंगे
हवाई हमलों से सुरक्षा के इश्तहार
यातायात को
रास्ता देती हुई जलती रहेंगी
चौरस्तों की बस्तियाँ

सड़क के पिछले हिस्से में
छाया रहेगा
पीला अन्धकार
शहर की समूची
पशुता के खिलाफ़
गलियों में नंगी घूमती हुई
पागल औरत के 'गाभिन पेट' की तरह
सड़क के पिछले हिस्से में
छाया रहेगा पीला अन्धकार
और तुम
महसूसते रहोगे कि ज़रूरतों के
हर मोर्चे पर
तुम्हारा शक
एक की नींद और
दूसरे की नफ़रत से
लड़ रहा है
अपराधियों के झुण्ड में शरीक होकर
अपनी आवाज़ का चेहरा टटोलने के लिए
कविता में
अब कोई शब्द छोटा नहीं पड़ रहा है :
लेकिन तुम चुप रहोगे;
तुम चुप रहोगे और लज्जा के
उस गूंगेपन-से सहोगे –
यह जानकर कि तुम्हारी मातृभाषा
उस महरी की तरह है, जो
महाजन के साथ रात-भर
सोने के लिए
एक साड़ी पर राज़ी है
सिर कटे मुर्गे की तरह फड़कते हुए
जनतन्त्र में
सुबह –
सिर्फ़ चमकते हुए रंगों की चालबाज़ी है
और यह जानकर भी, तुम चुप रहोगे
या शायद, वापसी के लिए पहल करनेवाले –


आदमी की तलाश में

एक बार फिर
तुम लौट जाना चाहोगे मुर्दा इतिहास में
मगर तभी –
य़ादों पर पर्दा डालती हुई सबेरे की
फिरंगी हवा बहने लगेगी

अख़बारों की धूल और
वनस्पतियों के हरे मुहावरे
तुम्हें तसल्ली देंगे
और जलते हुए जनतन्त्र के सूर्योदय में
शरीक़ होने के लिए
तुम, चुपचाप, अपनी दिनचर्या का
पिछला दरवाज़ा खोलकर
बाहर आ जाओगे
जहाँ घास की नोक पर
थरथराती हुई ओस की एक बूंद
झड़ पड़ने के लिए
तुम्हारी सहमति का इन्तज़ार
कर रही है।

-धूमिल<

गुरुवार, जुलाई 28, 2011

एक ख्वाब जो मैंने देखा..


मैं उस मरु-विस्तार में अकेला भटक रहा था..।
तभी अचानक मैंने रोशनी को महसूस किया..। मेरे पीछे कदमों की आहट हुई..। कोई मेरा पीछा कर रहा था..।

मैं मुड़ा और एक छोटी सी बुढ़िया को देखा जो लाठी के सहारे झुकी हुई थी..। वो बदरंग चीथड़ों से लिपटी थी..। उन पैबंदों के बीच से सिर्फ उसका चेहरा झांक रहा था; झुर्रियों से भरे पीले गाल, तीखी नाक, दांतों के बगैर अंदर पिचके हुए होंठ..।

मैं उसके पास गया..वो थम गई..।

'तुम कौन हो? क्या चाहती हो? क्या तुम्हे कुछ चाहिए?'

बुढ़िया ने कोई जवाब नहीं दिया..। मैं उसपर झुका..। मैंने देखा उसकी पुतलियां पारदर्शी झिल्ली से ढकी थीं..जैसे कुछ पंछियों में होती है..।
लेकिन उसकी आंखों में ये झिल्ली बिल्कुल स्थिर थी..। इससे मैंने अंदाज़ा लगाया वो अंधी है..।

'तुम्हें कुछ चाहिए?' मैंने अपना सवाल दोहराया..।'मेरा पीछा क्यों कर रही हो? बुढ़िया जवाब में सिर्फ सिकुड़कर रह गई..।'

मैं एक बार फिर मुड़ा और अपनी राह हो लिया..।

और फिर मेरे पीछे वही रोशनी..वही पीछा करते नपे-तुले कदम..।

'ये बुढ़िया..!'मैंने सोचा,'आखिर मुझसे क्यों चिपकी है..?' लेकिन फिर ख्याल आया,'देख नहीं सकती है,अंधी है..मेरे कदमों की आवाज़ सुनकर महफूज़ जगह ठिकाने तक पहुंचना चाह रही होगी..। हां, हां, यही होगा..।'

लेकिन अजीब बैचेनी से मन भरने लगा..। मुझे वहम होने लगा कि वो बुढ़िया सिर्फ मेरा पीछा नहीं कर रही थी बल्कि मुझे भी अपनी मर्ज़ी के मुताबिक चला रही थी.. मैं जानता था फिर भी उसके वश में था..।
मैं फिर भी चलता रहा..लेकिन...तभी..मेरे सामने उसी सड़क पर..कुछ गहरा और अंधेरे से भरा हुआ..सड़क पर गड्ढा था या फिर कोई कब्र..! हां, ये मुझे कब्र की ओर ही धकेल रही है..!'

मैं फौरन पलटा लेकिन वो औरत फिर सामने थी...ओह! तो ये देख भी सकती है..। वो मुझे बड़ी-बड़ी,क्रूर, विद्वेषपूर्ण आंखों से घूर रही थी..एक शिकार पर शिकारी की निगाह...मैं उसके चेहरे पर झुका..एक बार फिर वही झिल्ली..फिर वही पथराया अंधकार..

'अच्छा!'मैंने सोचा,'ये बुढ़िया नियति है..। वो नियति जिससे कोई नहीं बच सकता..।'

'कोई नहीं बच सकता..! कोई नहीं..!! क्या पागलपन है....आखिर कोशिश तो करनी चाहिए..। ' और मैं दूसरी तरफ़ मुड़ गया..।

अब मैं आहिस्ता-आहिस्ता कदम रख रहा था..लेकिन मेरे पीछे की पदचाप भी उतनी ही हल्की थी, करीब, और करीब....और मेरे आगे फिर वही गहरा, गड्ढा..।

मैं फिर दूसरी दिशा की ओर मुड़ा....और फिर वही आहट, फिर वही अंधेरे से लबरेज़ गड्ढा..।

मैं बौराए घोड़े की तरह जिस भी ओर दौड़ा..नतीजा यही था..यही..!
'ज़रा रुको!'मैंने सोचा, 'मैं उसे छकाऊंगा!अब मैं हिलूंगा ही नहीं!' मैं तपती ज़मीन पर बैठ गया..।

बुढ़िया अब भी मुझसे दो कदम पीछे थी..। कोई आवाज़ नहीं थी..लेकिन उसकी मौजूदगी को महसूस किया जा सकता था..।
तभी मैंने देखा दूर क्षितिज से लिपटा स्लेटी अंधकार हवा में तैरकर मुझे घेरे जा रहा है..
हे ईश्वर! मेरी नज़रें पीछे घूमीं...बुढ़िया सीधे मेरी ओर देख रही थी, उसके पोपले होंठों पर बेरहम मुस्कान फैली थी..।

कोई मुक्ति नहीं..! कहीं कोई मुक्ति नहीं..!

शनिवार, जून 11, 2011

धरती का हाउसफुल

कभी-कभी हैरानी होती है कुछ सालों बाद इस सदी के पहले दशक को हम कैसे याद करेंगे- जब गरीब के निवाले की कीमत..उसकी जान से भी ज़्यादा थी..मिडल क्लास आसमान छूते ऊर्जा दामों के तले पिस रहा था, पृथ्वी आबादी के बोझ से डगमगाने लगी थी..। टीवी की तस्वीरों में तूफानों से उजड़े शहर दिखना आम बात थी, भूकंप,बाढ़ पिछले रिकॉर्ड तोड़ रहे थे..। पूरी की पूरी सभ्यताएं पलायन कर रहीं थीं और इस सबके असर से दुनिया भर की सरकारों के सिंहासन डोल रहे थे- उस वक्त ये सवाल भी मन में उठेगा: हम क्या सोच रहे थे..? हम क्यों नहीं जागे जबकि सुबूत साफ़ थे कि हम विकास, पर्यावरण, प्राकृतिक संसाधन और जनसंख्या..इन सभी में कुदरत की लक्ष्मण रेखा लांघ रहे थे..।

हम मसले से भाग रहे थे..। शायद इकलौता यही उत्तर हमें उस वक्त सूझ सकता है..। जब हालात इतने गंभीर हों कि दुनिया के बारे में हर सोच, हर नज़रिए को बदलने की ज़रुरत हो तो नकार इंसान की फितरत है..। लेकिन शायद जितना लंबा इंतज़ार होगा..उतना ही बड़ा कदम उठाना हमारी मजबूरी होगी..।

इंसानी लालच को पूरा करते-करते.. अब इस धरती का आंचल छोटा पड़ने लगा है..। ग्लोबल फुटप्रिंट नेटवर्क नाम का एक वैज्ञानिक समूह इसी बात की गणना करता है कि मौजूदा विकास दर बनाए रखने के लिए हमें पृथ्वी जैसे कितने ग्रहों की ज़रुरत पड़ेगी..। जीएफएन की फाइलों में 2011 तक ये आंकड़ा 1.5 तक पहुंच चुका है..। जो हकीकत इस स्थिति को संगीन बनाती है वो यही है कि हमारे पास दूसरी कोई पृथ्वी नहीं है..। ये साइंस फिक्शन नहीं है..। ये हमारे विकास के तरीके और कुदरत के तरीके के बीच का टकराव है..। हिंदुस्तान के शहरों में अभी टैंकर लोगों की प्यास बुझा रहे हैं..। बहुत बार दोहराया जा चुका है कि अगला विश्व युद्ध वॉटर वॉर ही होगा..। जिस देश की एक पीढ़ी अपने संसाधनों से डेढ़ गुना ज़्यादा सोख रही हो वहां ऐसे हालात लाज़िमी हैं..।

अगर आप बेतहाशा पेड़ काटेंगे तो एक दिन वो ख़त्म हो जाएंगे..। अब आप धरती पर पड़े कार्बन डाइऑक्साइड के कंबल को और मोटा बनाते हैं तो धरती और गर्म होगी..। ऐसे कई काम एक साथ धरती के बर्ताव को बदल रहे हैं और इसका सामाजिक, आर्थिक असर नज़र आने लगा है..।

ये स्कूल स्तर के विज्ञान की समझ है..। लेकिन ये सामयिक भी है..। “हज़ारों साल की सभ्यता में इंसान और कुदरत के बीच के रिश्ते कभी इतने तलख़ नहीं थे..।” पिछले दिनों चीन के पर्यावरण मंत्री ये बात मान चुके हैं..। क्या वो हमें ये नहीं बता रहे कि दरअसल दुनिया के इस थिएटर का हाउस फुल हो चुका है..? हम फिलहाल संसाधनों का इतना ज़्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं और धरती में इतना कचरा भर रहे हैं कि मौजूदा तकनीक के हिसाब से अब सीमा रेखा नज़दीक है..। दुनिया की अर्थव्यवस्था को आकार घटाना ही होगा..।
ये भी सच है कि जब तक संकट सिर पर नहीं होगा..हम नहीं बदलेंगे..। लेकिन चिंता मत कीजिए..ख़तरे के बादल दूर नहीं हैं..। फिलहाल इंसानियत दो चक्रव्यूहों में एक साथ घिरी है: पहला ये कि जनसंख्या में बेतहाशा बढ़ोतरी और ग्लोबल वार्मिंग थाली की कीमत बढ़ा रहे हैं; अनाज की बढ़ती कीमतें तेल के भंडार देशों में अस्थिरता की वजह बन रहे हैं, इससे तेल की कीमतें और बढ़ रही हैं और नतीजतन खाने की कीमतें और बढ़ रही हैं..और इसका सीधा असर है और ज़्यादा अस्थिरता..। इसीके साथ उत्पादकता बढ़ने का मतलब है हर फैक्ट्री में कामगारों की ज़रुरत घट रही है..। यानी अगर और ज़्यादा रोज़गार चाहिएं तो हमें और ज़्यादा कारखाने खड़े करने होंगे..। इसका मतलब है ग्लोबल वार्मिंग और बढ़ती है..। हम इन दो दुष्चक्रों के बीच फंसे हैं..।

लेकिन सभी निराश नहीं हैं..। कुछ लोग मानते हैं कि जैसे-जैसे ‘ग्रीन लाइन’ नज़दीक आती जाएगी..इंसानों की प्रतिक्रिया भी उसी अनुपात में भी नाटकीय होती जाएगी..। हो सकता है दुनिया की सरकारों को युद्धस्तर पर कोशिशें करनी पड़ें..। भविष्य में हमें इतनी तेज़ी से बदलना होगा..जिसकी कल्पना भी मुश्किल है..। कुछ ही दशकों में ऊर्जा और परिवहन उद्योग में जड़ से बदलाव सबसे बड़ी ज़रुरत बन जाएगी..। एक दिन हमें समझना होगा कि बाज़ारवादी अर्थव्यवस्था का बोझ धरती नहीं झेल सकती है और हमें ऐसी अर्थव्यवस्था चाहिए जिसमें इंसान का संतोष, उसकी खुशी पैमाना होगा..। हमें ऐसे सिस्टम की ओर बढ़ना होगा..जहां लोग कम कमाएं और कम उपभोग करें..। आखिर कितने लोग मृत्युशैय्या पर ये कहते हैं कि काश ऑफिस में और ज़्यादा काम किया होता या फिर काश ज़्यादा शेयर कमाए होते..? और ऐसे कहने वाले कितने होंगे..जो ये सोचते हुए दुनिया छोड़ते हैं कि काश मैं ज़्यादा दुनिया को देखा होता, अपने बच्चों को और ज़्यादा लोरियां सुनाईं होतीं..? इसे हकीकत में बदलने के लिए हमें ऐसा विकास चाहिए जिसमें लोगों के पास उपभोग की चीज़ों से ज़्यादा ज़िंदगी जीने का वक्त हो..। या तो हम खुद को प्रलय के लिए मना लें या फिर इस बाज़ारवाद को ख़त्म करें..। मुझे लगता है हम दूसरा विकल्प चुनेंगे..। इंसानी प्रजाति समझने में धीमी भले हो लेकिन मूढ़ नहीं है..।

शनिवार, जनवरी 15, 2011

gIrLs i'Ve LuVeD..(3)

-----------एंजेलिका---------------------
आज आठ दिसंबर है..मेरे ‘द्विज’ होने का दिवस..। कहानी ज़रुर कहता हूं लेकिन कहानीकार नहीं हूं..। सिर्फ यादों के मौसम में ज़ेहन की शाखों पर जब अशआर आते हैं तो बांट लेता हूं..। लिखने की हसरत है पर लेखक नहीं बन पाया..। जिस दिन वो याद, वो ख्याल, वो कहानी कहने जितनी ज़िंदगी अपने शब्दों को बख्श सकूंगा, उसी दिन शब्द साधना को पूरा मानूंगा..। लेकिन फिर जिसके होने से मैं हूं, जिसका ऐहसास मेरे अस्तित्त्व के कण-कण में गुंथा जा चुका है, उसकी अभिव्यक्ति असंभव सी प्रतीत होती है..। यही वजह है कि न्यूज़रूम की आपाधापी के बीच लिखी गई ये कहानी नायाब तो नहीं, कहानी की कसौटी पर भी शायद खरी न उतरे..। इसका आदि बिखरा है, अंत अधूरा है..। लेकिन कथानक के बीच कुछ है, जो अव्यक्त है..। जिसे प्रेम ने छुआ होगा, वो इस अनकहे को समझ पाएगा, ऐसी उम्मीद है..।



मैं इंसानों की उस जाति से हूं, जिसे कुंलाचे भरती कल्पना और ठाठें मारते जज़्बातों के लिए जाना जाता है..। लोगों ने अक्सर पागल भी ठहराया है, लेकिन इस मसले का निपटारा अभी बाकी है..। पागलपन को इंसानी सोच का सबसे ऊंचा मुकाम क्यों न माना जाए..? क्या ये सच नहीं कि महानतम और गहनतम को साहिल पर हमेशा मन की उफनती लहर ही छोड़कर गई है, न कि आम ख्यालों का भंवर..? दिन में देखे गए सपने कभी-कभी उन बहुतेरी चीज़ों से भी वाकिफ़ होते हैं..जिन्हें रातों के ख्वाब छू भी नहीं पाते..। धुंधले बोध में भी ‘बांवरे’ मन विराट की झलक देख लेते हैं..। दर्द की राह पर टुकड़े-टुकड़े ही सही इन्हीं पागलों के हाथ वो इल्म आता है..जो सिर्फ बुरे से नहीं बचाता, अच्छे की ओर भी ले जाता है..।

यानी कुल मिलाकर आप ये कह सकते हैं कि मैं पागल हूं..। कम अज़ कम इतना मानने में तो मुझे भी गुरेज़ नहीं है कि मेरे मन के दो कोने हैं; एक- जहां ठहरे पानी की तरह साफ़ तर्क हैं, उन्हें बहस से मथने की ज़रुरत नहीं, वो मेरी जिंदगी के पहले हिस्से में गढ़े गए हैं..। दूसरा कोना शुबहों की उलझी परछाइयों से भरा है..। इसका ताल्लुक मेरी ज़िंदगी के ‘दूसरे युग’ से है..। इसलिए जो मैं अपने पहले दौर के बारे में कहूं, उसपर आप भरोसा कर सकते हैं..। उसके बाद के सच को अपने हिसाब से तय कीजिएगा..। आप चाहें तो उसपर पूरी तरह शक कर सकते हैं..। अगर ये भी गवारा न हो..तो पहेलियां भी खाली वक्त का कारगर खेल साबित होती हैं..।

आज जिसके बारे में चुपचाप बैठा लिख रहा हूं, कभी वो मेरी शोखियों की धड़कन थी, मेरी खामोशियों की सांस..। चलिए उसका नाम ‘एंजेलिका’ मान लेते हैं..। मखमली सूरज तले सतरंगी घास की वादी में हम हमेशा साथ रहे थे..। उस घाटी ने कभी भटके कदमों को नहीं देखा था..। चारों तरफ़ कद्दावर पहाड़ मानो आसमान से टंगे हुए थे..। उसके आसपास किसी रास्ते को भी राहगीर का तुजुर्बा नहीं था..। हमारे खुशनुमा घर तक पहुंचने के लिए हज़ारों झाड़ियों को ज़ोर लगाकर धकेलना पड़ता, न जाने कितने फूलों की शान में गुस्ताखी करनी होती..। इसलिए हमारा इश्क कुदरत की तन्हाई में जवान हो रहा था..। हमारी दुनिया उन्हीं पहाड़ों की चारदीवारी तक थी..। मैं, मेरा परिवार, वो और उसका परिवार..।

पर्वतों के पार के धुंधलके को चीरकर रास्ता बनाती नदी हमारे घरों के पास..झूमती हुई बहती..। पत्थरों से टकराती नदी की बूंदों पर जब वसंत के सूरज की किरणें पड़तीं तो उस वादी की सबसे चमकीली शय होतीं, सिवाए एंजेलिका की आंखों के..। हम इसे ‘सुरीली सरिता’ कहते थे, उसके शोर में वाकई गुनगुनाहट जैसा असर था..। उसके किनारे बैठकर मोती सरीखे गोल-गोल पत्थरों को निहारना हम दोनों को बेहद पसंद था..। लहरों की रवानगी के बीच भी नदी की छाती से लगे वो पत्थर ठहरे हुए नज़र आते..। रेत की एक पट्टी के बाद पहाड़ों के कदमों तक बारहों महीने नरम घास की कालीन उस देस में बिछी रहती..। घास के बीच..सपनों की तरह बांवरे पेड़ छितरे हुए थे..। उनकी कमर दिन के वक्त रोशनी की तरफ़ झुकी रहतीं..। उनके तने उस वादी की सबसे मुलायम शय थे, सिवाए एंजेलिका के गालों के..।

इसी वादी में और एंजेलिका सालों हाथों में हाथ थामे घूमते रहे..। प्यार ने कब हमारे दिलों में घरौंदा बनाया, पता ही नहीं चला..। फिर वो शाम भी आई..। मैं और वो पहाड़ की चोटी पर बने मंदिर के ठीक नीचे बैठे थे..। हमारी बाहें एक दूसरे से लिपटी थीं..। पेड़ों के झुरमुट से सांझ की धूप छन-छनकर आ रही थी..। हमारी खामोश निगाहें नीचे वादी में हमारे गांव पर छाई धुंध को निहार रही थी ..। पूरी शाम हमने कुछ नहीं कहा..। उससे अगले दिन भी अल्फाज़ों का मायनों जैसे नाता टूट गया हो..। धुंध के पार से आकर हमें एक अनदेखी लहर छूकर गुज़री थी..। उस लहर की रवानगी चंद लम्हों की थी, लेकिन भीतर-बाहर का सबकुछ घुल जाने का नशा..! वही आवेग, जिसके चलते मनुष्यों की प्रजाति ने खुद को सबसे ऊंचा दर्जा दिया है, हमें बहाए ले जा रहा था..। सबकुछ न जाने कैसे बदल गया था..? सितारों सरीखे फूलों की शोखी उन टहनियों में भी आग लगाने लगी, जिनपर पहले कभी फूल नहीं आए थे..। घास की कालीन अब और हरी थी..। वो पहाड़ी रास्ते भी जी उठे थे..। जब हम गोधूलि बेला में घर लौटते, कभी-कभी नज़र आने वाली ‘शेरटी’ अपनी नटखट सहेलियों के साथ शाम में सुर घोलती..। सुनहरे रंग की मछलियां नदी में अठखेलियां करतीं..। नदी की छाती से उठने वाला संगीत अब उस वादी की सबसे सुरीली शय था, सिवाए एंजेलिका की आवाज़ के..।

बादल का वो टुकड़ा जिसे हम रोज़ निहारा करते, दिनभर तैरते हुए हमें हंसाने के लिए चेहरे बदलता..। शाम के वक्त जब उसके सिरे चोटियों पर सिर रखकर आराम करते तो शाम का रंग और भी गाढ़ा हो जाता..।

एंजेलिका के नयन-नक्ष में सबकुछ आम था..। लेकिन उसकी खूबसूरती में अजीब सा भोलापन था..। अश्वमेघ घोड़े जैसा सजीला गर्व नहीं, हिरण जैसी अनछुई निरीहता..। उसके दिल से उठने वाले इज़हार में कहीं कोई छल नहीं था..। जब हम सतरंगी घास की उस वादी में घूमते..वो उस दिल के अनदेखे कोनों में मुझे ले जाती..। उनमें आने वाले हर बदलाव की ख़बर मुझे होती..। जून की एक ठहरी-ठहरी सी दोपहर में उसकी भीगी आंखों ने वो सुनाया जो मेरे लिए कायनात की कहानी का आखिरी ट्रैजिक मोड़ था..। इसके बाद भीतर का एक हिस्सा हमेशा के लिए..ठहर जाने वाला था..। इसके बाद हमारी बातें इसी उदासी के इर्द-गिर्द बुनी हुई रहीं..।

अपने सीने पर टिकी मौत की ऊंगली को एंजेलिका देख चुकी थी..। मुकम्मिल खूबसूरती दुनिया को बर्दाश्त नहीं कर सकती, इसलिए उसकी अमरता दर्द में ही छिपाई गई है..। लेकिन दर्द तो दर्द होता है..। उसके दर्द की गहराई का ऐहसास एक रोज़ ‘सुरीली सरिता’ के किनारे बैठे उसने मुझे सुनाया..। उसके बाद सतरंगी घास की इस वादी को मैं छोड़ दूंगा, मेरा प्यार बाहर की दुनिया में किसी और की नज़्र होगा, ये ख्याल उसे खाये जा रहा था..। वहीं, उसी वक्त मैं अपने घुटनों पर झुका और उसका हाथ थामकर न जानें कितने कसमें खाई- ‘दुनिया की किसी लड़की से शादी नहीं करूंगा, उसकी यादें हमेशा दिल में सहेज कर रखूंगा, उसके प्यार की छांव ‘देवी मां’ के आशीर्वाद की तरह हमेशा मेरे साथ रहेगी..। ’ मैंने दिक दिशाओं के मालिक को उस लम्हे में बतौर गवाह तलब किया..। एंजेलिका की आंखों की उदासी मेरी बातों पर चमक उठी थी..। उसकी छाती से ऐसी आह निकली मानो उसके प्राणों की एक-एक बूंद निचोड़ी जा रही हो..। कांपते होंठो से रूलाई को थामते हुए, उसने मेरी कसमों को तस्लीम किया..। (कभी-कभी सोचता हूं ये उसका बचपना था..।) खैर इससे हमारी विदाई कुछ आरामदेह तो बन ही गई..।

‘उस पार सितारों के बीच से भी तुम्हे निहारुंगी, सर्द रात की तन्हाइयों में मेरा ऐहसास तुम्हारे ऐहसासों की बर्फ को पिघलाएगा..। अगर जन्नत में इसकी इजाज़त नहीं हुई तो भी वो अपनी मौजूदगी के चिन्ह ज़रुर दर्ज करवाएगी..।’ उसकी आखिरी सदा यही थी..।

अब तक जो सुनाया तो तकरीबन सही ही है..। इसके बाद के सफ़र को याद करता हूं तो दिमाग पर एक परछाई सी छा जाती है..। उस दौर के बारे में सब कुछ सही-सही कह पाऊंगा, खुद को भी शक होता है..। पर फिर भी किसी तरह कोशिश करता हूं-

अब हर दिन, हर लम्हा पानी में भीगी हुई रुई की तरह भारी हो गया था..। मैं अब भी सतरंगी घास की वादी में ही था..। लेकिन कुछ भी वैसा नहीं बचा था..। सितारों की शक्ल के फूल मुरझा चुके थे, घास की कालीन अब हरी नहीं थी, रास्ते फिर बेजान हो चुके थे..। शेरटियां अब रास्तों से दूर ही रहती थीं, सुनहरी मछलियों ने नदी का रुख़ करना छोड़ दिया था..। रुठी हुई नदी ने गुनगुनाना छोड़ दिया था..। लेकिन एंजेलिका अपना वादा नहीं भूली थी..। कभी लगता किसी फरिश्ते के पंखों ने अचानक गालों को छू लिया है, कभी अपनी ही सांसें महकती हुई जान पड़तीं..। तन्हा पलों में जब दिल भारी होता, हवा की ठंडी आह कानों को महसूस होती तो लगता कि वो कहीं आसपास है..।

लेकिन रोता हुआ दिल मनाए नहीं मान रहा था..। वक्त के हाथों क़त्ल ज़ज्बात कांटों की तरह चुभते..। उस वादी का हर एक नज़ारा एंजेलिका की याद से छलकता महसूस होता..। आखिर दुनिया की चमक बटोरने के लिए मैंने मुसाफिर का झोला उठाया और उस वादी को छोड़कर निकल पड़ा..। मैंने खुद को एक अजीब शहर में पाया..। यहां के दिन, यहां की रातें मेरे भीने दर्द पर बदनुमा पैबंद जैसी थीं..। ‘अहमियत’ की दुनिया और दुनिया की अहमियत के गोरखधंधे में कब उलझा, पता ही नहीं चला..। यहां की जश्न मनाती रातों और खूबसूरत चेहरों का नशा चढ़ने लगा था..। लेकिन अभी तक मेरी आत्मा एंजेलिका से किए वायदों पर खरी उतरी थी..। उसका ऐहसास अब भी मेरी खामोश रातों को अक्सर छूकर गुज़रता..। अचानक ये जादू घटना बंद हो गया और दुनिया मेरी आंखों के सामने अंधेरी हो गई..। अपने भीतर सुलगती ख्वाहिशों पर मैं खुद हैरान था..। जाने किस जन्म का बंधन वापस लौटा था..? उसके सजदे में सिर झुकाने से पहले दिल ने एक बार भी रुसवाई का ख्याल नहीं किया..। इश्क की इस दहलीज़ पर जिस दीवानगी में डूबा उसके सामने एंजेलिका के जज़्बातों का जुनून भी क्या था..? अस्तित्व से बरसते आनंद को समेटने में अंतस अचानक छोटा लगने लगा था..। वाकई रूहानी था ये ऐहसास ! अब भी उसकी आंखों के बारे में सोचता हूं तो बस सोचता रह जाता हूं..।

मैंने कसम तोड़ दी..। न तो मुझे डर महसूस हुआ और न ही कड़ुवाहट..। सच पूछिए तो अपराध बोध भी नहीं..।
बस एक रात वही भूली-बिसरी नरम आह बेचैनी को दिलासा देती महसूस हुईं-

“सो जाओ दीपक ! ” सिर्फ नाम बदला है, आत्मा वही है..। तुम अपराध मुक्त हो..!

gIrLs I’Ve LoVeD (2)..

स्नेहा अरोड़ा

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एक चीफ़ गेस्ट की अगुवानी के लिए दीवार पर सजाया गया लाल सूरजमुखी आधा मुरझा गया था..सो मैंने उसे दीवार से निकालकर अपने सिस्टम पर सजा दिया है..। सब फूलों में मेरा सबसे पसंदीदा फूल सूरजमुखी ही रहा है..। सिर्फ अपने प्रियतम सूरज का दीदार ही..उसकी पंखुड़ियों को खिलने की ख्वाहिश देता है..। आप उसकी खुश्बू को मोहताज कह सकते हैं..। खिलना उसका होना है..खुश्बू उसके होने की घोषणा..। चाहें तो उसके अस्तित्त्व, उसके प्रेम पर खुदमुख्तारी की वाजिब टोक लगा सकते हैं..। हां, वो आश्रित है, लेकिन फिर भी फिक्रमंद नहीं..। क्षितिज पार के प्रेम पर भी इतना भरोसा कि अपना होना भी उससे बांध रखा है..। किसी और फूल में शायद आप उदासी नहीं देख पाएंगे..लेकिन कभी पहाड़ की चोटी पर बने लकड़ी के वीरान घर की क्यारी में उगे अकेले सूरजमुखी को पांच मिनट निहारिएगा..। खैर बचपन के उन दिनों में नज़रें उस सूरजमुखी पर नहीं, घर के अंदर की सबसे खुफिया जगह पर टिकती थीं..। लुकाछिपी के खेल में छिपने की वो मेरी फेवरेट जगह थी..। सालों पहले अंग्रेज़ों ने न जाने क्यों उस घर को उजड़े रहने का श्राप देकर छोड़ दिया था..। उसके थोड़ा नीचे..आर्मी का बनवाया गया मंदिर था..। जंगल का एक टुकड़ा मंदिर और उस घर को अलग करता था..। चीड़ के पेड़ों में अभी बुज़ुर्गियत की सख़्ती नहीं, यौवन का लोच था..। खेल का रोमांच एक सैकिंड में ठिठक कर रह जाए..ऐसा इससे पहले कभी हुआ ही नहीं था मेरे साथ..।

‘ये चेहरा..यहां इस जगह पर..कैसे ? ’

काले फर जैकेट के कॉलरों में नाक तक ढका सांवला चेहरा, गर्दन तक कटे बाल, और वो बड़ी-बड़ी कत्थई आंखें..। उसकी सफेद फ्रॉक पर लाल गुलाब बने हुए थे..। सच कहूं तो इतना हुलिया सिर्फ अंदाज़े से बयां कर रहा हूं..। मानस पटल पर उस लम्हे का कोई ऐहसास अगर आज भी दर्ज है तो सिर्फ वो बड़ी-बड़ी आंखें..। चेहरे पर सूरजमुखी की छुअन के ऐहसास को खामोश हंसी से बयां करतीं..। उसकी सहेलियों की आमद ने उस पल का तिलिस्म तो तोड़ दिया..लेकिन आत्मा का एक हिस्सा जो ठिठका रहा था..सो आज भी ठिठका है..। उस एक लम्हे की बर्फ में जमा..। शिमला के मार्च की उस गुनगुनी दोपहर में उसकी हथेलियां एक और अकेले सूरजमुखी को भी ज़िंदगी भर का साथ देने वाली थीं, यादों की एक कभी न छूटने वाली सोहबत..। छुट्टियों के बाद के पहले दिन को न तो उसके पहले और न ही उसके बाद कभी खुशनसीब माना..। मॉर्निंग असेंबली के बाद..बच्चों का हुजूम..सीटों पर विराजमान तकरीबन हो ही चुका था..। एक दूसरे से मिलने के उबलते जोश पर पहले ही पीरियड का घंटा हथौड़ा बनकर पड़ा था और चिपटी हुई खामोशी पसरने को थी..। क्लास के ख़बरियों ने जैसे ही बताया प्रिंसीपल आने वाले हैं..हलचल की लहर..घुप्प सन्नाटे में बदल गई..।

‘गुड मॉर्निंग स्टूडेंट्स, दिस इज़ योर न्यू फ्रेंड..स्नेहा अरोड़ा..।’

क्लास में पहला कदम..प्रिंसीपल की निगरानी में..ऐसा सौभाग्य तो आज तक किसी को मिलते नहीं देखा था..। दिमाग इस हैरत में उलझता..उससे पहले ही वो आंखें..। कौन कहता है इश्क अंधा होता है..कभी-कभी प्यार में आपकी नज़र..किसी जासूस से भी ज़्यादा पैनी हो जाती हैं..।

कद यकीनी तौर पर दरम्याना से कम था..नाक तोतिया होते हुए भी उसके चेहरे को बांध कर रख देने वाला संतुलन देती थी..।
‘ये वही है..।‘

जाने दिल के कौन से कोने की आवाज़ थी..भीतर से विरोध का हल्का सा सुर भी नहीं उपजा..।

वो स्नेहा अरोड़ा थी..एक आर्मी मेजर की बेटी..। ‘सा$ब’ तबके में आने वाले परिवारों का गर्व नहीं लेकिन एक रोबीला शहानापन उसके चलने में ही मौजूद था..।
मैं खिड़की की ओर से दूसरी कतार में पहले बेंच पर बैठा था..। वो खिड़की से सटी लड़कियों की ‘रो’ में बैठी..।
नीतिका से सिर्फ एक डेस्क पीछे..मेरी बगल में..। दिल की धड़कनों के रुकने के उस छोटे से पल के निर्निमेष निर्वाण का वो पहला स्वाद था मेरे लिए..। लेकिन निर्वाण मौन होता है शायद इसीलिए ये रिश्ता भी मौन ही रहा हमेशा..।
ज़िंदगी यूं ही चलती रही..। हर रोज़ दिन का हिस्सा एक खुमार के नाम बद गया..।
उसके बैठने की दूरी उस खुमार का पैमाना बन गई..।
एक स्कूल बस में आते, मॉर्निंग असेंबली में भी मेरी नज़रों के दायरे के भीतर ही उसके खड़े होने की जगह मुकर्रर थी..।
क्लासरूम में सवाल पूछे जाने उसका हाथ कम ही खड़ा मिलता था..लेकिन पहले यूनिट टेस्ट ने ही साबित कर दिया कि वो होशियार बच्चों की जमात में शामिल है..।
क्लास में मेरा दर्जा अब एक पायदान और नीचे हो गया था, ठीक उसके नीचे..।
न तो उसे कभी सहेलियों के साथ उछलते-कूदते देखा, न ही ज़ोर से खिलखिलाते..। खेल या स्टेज में भी उसकी कोई ख़ास दिलचस्पी दिखी नहीं कभी..।
लाइब्रेरी के पीरियड़ में उसे अंग्रेज़ी की परिकथाएं पढ़ता पाया ज़्यादातर..। ‘black beauty, Thumbelina’..ये कुछ किताबें याद हैं, जो उसके हाथों में देखीं..।
क्या ये इत्तफाक था कि हमारा सामना कभी इस तरीके से हुआ ही नहीं कि बात करना लाज़िमी हो..? या फिर मेरा शर्मिलापन चालबाज़ था..?
एक दफ़ा क्लास टेस्ट में बच्चों पर निगरानी का काम सौपा गया था, मुझे..। किसी से ढिलाई फितरत नहीं थी मेरी लेकिन उसे पीछे वाली सीट पर बैठी लड़की से पूछते या शायद कुछ बताते देखकर भी मेरा नज़रें फेर लेना, आज तक याद है मुझे..।

‘शुक्र है, बेखोट नज़र आने वाले इस रहस्यमयी बुत में कुछ तो इंसानों जैसा है..। ’ कुछ ऐसा ही ख्याल मेरे मन में आया था..।

एक बार और जब बर्थ-डे वाले रोज़ ‘सिविल ड्रेस’ में आने पर प्रिंसीपल ने झिड़का तो उसके चेहरे पर शर्म और ज़लालत का कुछ मिला-जुला सा रंग तैरते देखा..।
यूं समझ लीजिएवो ‘चंद्रकांता’ थी..तो मैं वीरेंद्र विक्रम था..। अलबत्ता सीरियल नहीं, किताब वाला..। बस बेहोश नहीं होता था, उसे देखकर..और ये फर्क भी दर्ज करवाना होगा कि कुंवर तो कतई नहीं था, उसके सामने..।
एक बार गिना तो एक पीरियड से जहां तक याद है पचास से भी ज़्यादा बार अपनी नज़रों को उसकी ओर घूमते हुए पकड़ा..।
बदले में सिर्फ एक, जी हां सिर्फ एक नज़र..। ‘एक नज़र’ में आप इंसान को पढ़ सकते हैं, ‘एक नज़र’ में प्यार की जादुई दुनिया में दाखिल हो सकते हैं, एक नज़र आपके दिल को लहुलूहान कर सकती है..लेकिन क्या ‘एक नज़र ’ किसी पूरे रिश्ते का इकलौता हासिल हो सकती है..? एक नज़र जो इस कदर पैवस्त हुई कि यादों के अंबार को परे हटाकर आज भी गाहे-बगाहे सपनों में दस्तक दे देती है..?
न जाने मेरी कौन सी नज़र के जवाब में, किस भले दिन, किस मंशा से..उसने पलटकर देखा था, हमारी नज़रें टकराईं थी..एक सैकिंड के सौंवे हिस्से में उन्होंने मेरे ऐहसास को छुआ था..गर्दन ज़रा सी हटकर फिर टिक गई थी..। ‘लो पी लो ये जाम’..ऐसा कहने के अंदाज़ में उसने गालों पर बायां हाथ टिकाया था, अपनी आंखों के प्यालों में कुछ था जो भरा था..और बिन मांगे, बिन आस मुझे दिया था..। मैं भीतर तक भर गया था..। जब-जब नैनों से ठगा गया, नज़रों का वो एक जाम हमेशा याद आया..।
PS:
कई सालों बाद यूनिवर्सिटी की एंट्रेस परीक्षा के दौरान..गेट के ठीक पास एक चेहरा नज़र आया..। जैसे ही दिखा, अभिषेक को बताया इस लड़की का नाम स्नेहा अरोड़ा है..। इसके पिता अमुक-अमुक हैं..। उसने फौरन उस चेहरे का नाम-पता करने के लिए भाग-दौड़ की..। वापस लौटे तो लड़की गायब थी, हमारे हाथों में पड़ा फॉर्म बता रहा था, वो कोई और थी..। और हां, मेरी इकलौती सगी भांजी का नाम भी स्नेहा है, मैंने ही रखा था..

gIrLs i'Ve LuVeD..(1)



पहली बार ज़िंदगी में हालात ने नहीं, अपने फैसले ने एकाकीपन का दामन थमाया है..। अगले पड़ाव पर बंजारा मन फिर साथ खोजेगा..?
फिलहाल ऐसा नहीं लगता..। लेकिन उन आइनों पर एक नज़र..जिन्होंने कभी मोड़ पर, कभी पड़ाव पर मेरा अक्स दिखाया..। आइने जिनके अक्स को मिलाकर बनी है मेरी ज़िंदगी की तस्वीर


नीतिका
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दिल की वादियों में तन्हाई का मौसम है..। यादों की धुंध हर तरफ़ फैली है; दर्द के धुंधलके में ख्यालों की सिहरन..याद दिला रही है, मैं ज़िंदा हूं..। धुंध के बीच दस्ताने का कवच भी आपके हाथों को जमने से नहीं रोक पाता..। नहीं, दिल्ली में अभी ठंड का मौसम नहीं आया है लेकिन जो कलाइयां कि-बोर्ड पर दौड़ रही हैं..उनमें जलने का एक हल्का सा दाग अब भी है..। दाग..। लम्हों के जीवाश्म..। कुछ ऐहसासों के साथ हमारे जीवन भर का नाता..। शिमला के स्कूलों में क्लासरूम में घुसने के बाद बच्चे सीटों की तरफ़ नहीं भागते..। कम अज़ कम हर घंटी के बाद की आज़ादी के वो चंद मिनट कोयले की अंगीठी के इर्द-गिर्द ही सजते हैं..। शॉर्ट ब्रेक में उसी के धक्के से गिरा था अंगीठी पर..। वो ऐहसास कब पैदा हुआ, ब्रह्मांड की उत्पत्ति के पल की तरह उस लम्हे की खोज में भी चेतना बस गहनता के इर्द-गिर्द घूमती भर रह जाती है..। हां, इतना याद है कि ऐहसास तो था..। सिर्फ तीसरी क्लास और एक लड़की से इश्क..। सुनने में भले अजीब लगता है, लेकिन अजीबपन का ये ऐहसास उस वक्त भी था, मुझे..। गोरा रंग, चौड़ा चेहरा, दरम्याना आंखें..।होंठों पर बाईं ओर चोट का निशान कभी उसकी निरीहता को बढ़ाता था..। कभी उसकी गंभीरता को सजाता था..। अक्सर नज़रें उसी पर टिकी रह जातीं..। न जाने कौन सी अंजानी फिक्र उसके चेहरे पर टंगी रहती थी, हमेशा..। ब्लेज़र की जेबों में हाथ डाले एक अजीब सी गरिमा बरसती थी उससे..। मॉर्निंग असेंबली में कभी उसके आस-पास खड़ा होता तो खुद को खुशनसीब मानता..। हफ्ते में एक बार होने वाली हाउस मीटिंग में हम क्लासरूम छोड़कर..अपने -अपने हाउस की मीटिगों में जाते..। एक पीरियड की ये दूरी ख़ासी खलती मुझे..। हम कॉलोनीनुमा मोहल्ले में रहते थे, उसके साइंसदान पिता को पड़ोस के खुले खेतों के बीच बना एक अलग क्वार्टर मिला था..। पड़ोसियों के घर जाकर राप्ता जमाने के लिए तो खैर शुरू से ही बेहद शर्मीला था लेकिन यहां दिक्कत ये थी कि उसकी मां मेरी टीचर थी..। ऐसी कोई क्लास नहीं थी जहां संस्कृत की क्लास से पहले एक खौफ़ज़दा खामोशी न छा जाती हो..। सुषमा ‘मैम’ को जतोग का केंद्रीय विद्यालय इसी खामोशी से पहचानता था..। कभी मेरे और उसके परिवारों का मिलना होता भी था तो कन्नी काटने के लिए कोना ही खोजा करता था अक्सर..। नीतिका का भाई नितिन इस काम में ख़ासा काम आता..। हम दोनों अक्सर खेलने निकल जाया करते..। हमेशा मन में हसरत होती कि वो भी आए..। खेलते वक्त, घर की छत पर दूरबीन के चाव को पूरा करते वक्त..। लेकिन कुदरत की मेहरबानी दूधवाले की खटखटाहट के बाद हर सुबह के लिए बंधी थी..। अक्सर वो स्कूल जाने से पहले हमारे घर आकर मेरा इंतज़ार करती..। मां से बातें करती, फिर हम दोनों साथ जाते..। रास्ता तो जेहन से कभी मिटा नहीं लेकिन उसपर वो साथ इस कदर सिट्टी-पिट्टी गुम करता था कि उसकी यादें भी दिमाग ठीक से जमा नहीं कर पाया..। एक पहाड़ी पर ऐसे रास्ते से चढ़ते जो दरअसल भेड़ों के लिए बना था, उसके बाद एक बड़ा सा मोड़ और फिर आर्मी कॉलोनी से गुज़रता हुआ रास्ता..। कहते हैं पहला प्यार सबसे गहरा होता है..इस सवाल की विवेचना को बाद के लिए छोड़ते हैं..अभी के लिए इतना कहना काफी है कि एक अजीब सी पवित्रता ज़रुर थी उसमें..। मेरी क्लास में हमेशा मुझसे दो रैंक ऊपर ही आते उसके..। हैंडराइटिंग कॉम्पिटिशन में तकरीबन हर साल वो फर्स्ट होती और मैं उसके बाद..। लेकिन स्कूल की उस छोटी सी दुनिया में दायरे की अपनी सल्तनत का शहज़ादा मैं भी था..। अगर ज़िंदगी में किसी के दायरे को भेदने की सजग कोशिश की..तो वो उसी बचपने में थी..। कई दिनों तक सोचा, फिर कुछ दिन दिमाग में रोज़ दोहराता रहा वो वाक्य, बीसियों बार ऐसा भी हुआ कि कहते-कहते रुक गया..। एक दिन ब्लैक बोर्ड पर रची एक पहेली..। ‘SLNATID..।’ उससे इसका मतलब पूछने की जुर्रत तो की..लेकिन कभी बता नहीं पाया..’SOMEONE LOVES NITIKA AND THAT IS DEEPAK..’। खैर, दायरे तो फिर भी टकराते रहे..। कई सालों बाद अक्ल की काई के साथ ये सवाल भी मन के किसी कोने में उग आया..’क्या वो भी प्यार के धागे से जुड़ी थी मुझसे ?’ ये रहस्य तो उन्हीं लम्हों के साथ हमेशा के लिए वक्त के अंतहीन सागर में घुल गया..। लेकिन कुछ लम्हे याद आते हैं..। मेरे बॉयज़ मॉनिटर होने और उसके गर्ल्स मॉनिटर बनने के बाद होने वाले झगड़े..। एक बार क्लास में शोर करने वाले बच्चों की लिस्ट में उसका भी नाम लिख दिया..। होनहार जमात का होने की वजह से टीचर की सुनने की आदत नहीं थी उसे..। स्कूल की टंकी के पीछे से जब वो निकली तो उसकी आंखों को भरा हुआ पाया..। दिल ऐसा पिघला कि रात को जगे हुए हर लम्हे ने आंखें भींचकर सुबह को सूरज को खींचकर लगाने की जुगत लगाई..। ओह! याद आया, सॉरी भी मैंने ही कहा था..। याद नहीं, उस ऐहसास की छुअन बताती है कि उसका जवाब अब तक मिले सबसे गहरे उत्तरों में शुमार होना चाहिए..। उसकी खामोशी में न तो दोबारा दोस्ती जैसी राहत थी न गुस्सा, न क्षोभ , न जीत की मुस्कान..। कुछ नहीं बस एक गर्भ धारण किए उदास सी खामोशी..। फिर रूमाल-गेम में कभी आमने-सामने होते तो अजीब हालत होती..। मन को हार भी गवारा नहीं होती..और जीत को जी नहीं चाहता..। इसी चक्कर में हमेशा रूमाल उसी ने उठाया..! उस नादान उम्र में कई बार सवाल आया..। ‘क्या इसकी परिणति एक रिश्ता है..? सवाल ही नहीं..। हमेशा जवाब यही मिला..।’ क्या बचपन की पवित्रता उस रिश्ते में भी उतर आई थी..? क्या किसी भी मांग से परे था वो संबंध ? ऐहसास और सिर्फ ऐहसासों की स्निग्ध बारिश..? ये जवाब कभी नहीं होगा, मेरे पास..। चाहता भी नहीं, इतनी कीमती याद को समझ की सज़ा दूं..। शायद अबोधता ही उस रिश्ते की आत्मा थी..उसकी वो महक जो आज भी ज़िंदा है..।

P:S दो-तीन साल पहले सुनने को मिला है कि उसने एनिमल हस्बेंडरी में बी.एस.सी पूरी की है..। जिसने देखा, उससे पूछा, कैसी दिखती है, वो ? दाग वैसा ही है, जवाब मिला..!

शुक्रवार, जनवरी 14, 2011

प्रतिभा

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कहानी-----------------
सूरज नाम का एक कलाकार उस साल गर्मियों की छुट्टियां पहाड़ों के एक गांव में बिता रहा था..। एक विधवा के मकान में बिस्तर पर लेटे हुए उस पर सुबह की उदासी हावी थी..। फ़ज़ाओं में अभी से पतझड़ की आमद की आहट थी..। आसमान घने, बैड़ोल बादलों से ढका था; हवा नश्तर की तरह चुभ रही थी; पेड़ कुछ इस अंदाज़ में एक तरफ़ झुके हुए थे मानो कोई फरियाद कर रहे हों..। उसकी नज़रें एकटक हवा में सरसराते पीले पत्तों पर टिकी थीं..। अलविदा वसंत! कुदरत की ये उदासी एक कलाकार की नज़रों में दिलकश होती है..लेकिन सूरज का मिजाज़ उस वक्त कुछ अलग था..। उसे एक गहरी ऊब खाए जा रही थी..। सांत्वना के लिए उसके पास सिर्फ ये ख्याल था कि कल वो यहां नहीं होगा..। उसके बिस्तर, कुर्सियों, मेज़ों और फर्श पर हर जगह सामान बिखरा पड़ा था..। अगले दिन उसे शहर के लिए रवाना होना था..।
सूरज की मकान मालकिन..वो विधवा उस वक्त घर पर नहीं थी..। वो कल के लिए लॉरी का इंतज़ाम करने कहीं गई थी..। कड़क मां की गैर-मौजूदगी का फायदा उठाकर बीस साल की कौमुदी सूरज के पास ही थी..। कल उसका पेंटर शहर जा रहा था..और उसके पास कहने के लिए कितना कुछ था..! वो कहती रही, कहती रही..लेकिन फिर भी ऐसा लग रहा था..उसके दिल की अनकही बाकी है..। कौमुदी की डबडबाई आंखें सूरज के बिखरे बालों को निहार रही थीं..उनमें उन्माद और उदासी एक साथ छलक रही थी..। सूरज की बेतरतीब हालत रात के वक्त अकेले में किसी को डराने के लिए काफी थी..। वो किसी जंगली जानवर की तरह दिखता था..। उसके बाल कंधों तक लंबे थे, उसकी दाढ़ी गर्दन, नथुनों, कानों तक से उगी हुई थी; उसकी आंखें उसकी मोटी भवों के पीछे बमुश्किल नज़र आती थीं..। आलम ये था कि अगर कोई कीट-पतंगा उन भवों में आकर फंसता तो शायद ही बाहर निकलने का रास्ता खोज पाता..। सूरज कौमुदी को उबासियों के साथ सुन रहा था..। वो थका हुआ था..। जब कौमुदी की आवाज़ रुआंसी हो गई..उसने गहरी, भर्राई आवाज़ में कहना शुरू किया:
“मैं शादी नहीं कर सकता..।”
“क्यों नहीं..?” कौमुदी की आवाज़ नरम थी..।
“…क्योंकि एक चित्रकार के लिए..बल्कि कला के हर साधक के लिए शादी का कोई सवाल ही नहीं है..। एक कलाकार के लिए उसके आज़ादी से ज़्यादा कीमती कुछ नहीं हो सकता..।“
“लेकिन मैं तुम्हारी आज़ादी में अड़चन कैसे हूं..? ”
“मैं सिर्फ अपनी बात नहीं कह रहा..। ज़्यादातर महान कलाकारों ने शादी से परहेज़ ही किया है..।”
“एक दिन तुम भी मशहूर बनोगे—मेरा दिल कहता है..। लेकिन मेरी जगह खुद को रखकर देखो..। मेरी मां के बारे में तुम जानते हो..जब उसे पता चलेगा कि तुम शादी के लिए राज़ी नहीं..और हमारे बीच में जो है वो कुछ नहीं...तो क्या होगा..? ओह! मैं कहां जाऊं..? तुमने कमरे का किराया भी तो नहीं दिया है..!”
“लानत भेजो किराए पर! वो मैं चुका दूंगा..।“
सूरज उठा और कमरे में बेचैनी से टहलने लगा..।
“मुझे कहीं और होना चाहिए..।” सूरज ने मानो खुद से कहा..। उसने कौमुदी को बताया कि शहर में कामयाब होना कितना आसान है..। बस एक पेंटिंग को बनाकर उसे बेचने भर की देर है..।
बिल्कुल, बिल्कुल..! कौमुदी ने हामी भरी..। “तुमने इस वसंत में कोई तस्वीर क्यों नहीं बनाई..?”
“क्या तुम्हे लगता है मैं ऐसे बाड़े में काम कर सकता हूं..?” सूरज ने बेरुख़ी से कहा..।
उसी वक्त किसी ने निचली मंज़िल पर ज़ोर से दरवाज़ा खटखटाया..। कौमुदी को किसी भी वक्त मां के आने का डर था..वो ज़ोर से उछलकर खड़ी हुई और भागकर चली गई..। अब हमारा चित्रकार अकेला रह गया..। काफी वक्त तक वो कुर्सियों और घर के सामान के ढेर के बीच चहलकदमी करता रहा..। नीचे बर्तनों की खनखनाहट इस बात की निशानी थी कि विधवा रसोई में काम कर रही है..। वो बड़बड़ाते हुए इन लॉरी ड्राइवरों को कोस रही थी..जिन्होंने उससे शहर तक सामान ले जाने के लिए पूरे दो हज़ार मांगे थे..। खीझकर सूरज कमरे की अलमारी के सामने रुक गया..और देर तक वहां रखी शराब की आधी बची बोतल को देखता रहा..।
“तेरा सत्यानाश हो!” उसने विधवा को कौमुदी पर झल्लाते हुए सुना..।
शराब के दो घूंट अंदर जाते ही उसकी आत्मा पर छाए काले बादल छंटने लगे..। उसे लग रहा था मानो उसका पूरा अंतस उसके साथ मुस्कुराने लगा हो..। मदहोशी उसे सपनों की दुनिया में ले जा रही थी....हां एक दिन वो ज़रुर महान बनेगा..। उसके ब्रश से निकले वो कौन से मास्टरपीस होंगे..ये सूरज के ख्यालों में नहीं था..लेकिन वो देख सकता था..कैसे अख़बारों में उसके चर्चे होंगे, दुकानों में उसकी तस्वीरें बिकेंगीं, उसकी कामयाबी पर दोस्त रश्क करेंगे....कल्पनाओं के उस संसार में वो एक शहाना महल में परी सरीखी लड़कियों के बीच था; लेकिन सपनों की ये तस्वीर कुछ-कुछ धुंधली थी..क्योंकि असल ज़िंदगी में उसने ऐसा कोई महल देखा ही नहीं था..। प्रेमतंत्र के पन्नों पर भी उसकी तकदीर ज़ीरो ही थी..लिहाज़ा ‘अप्सराएं’ भी दूर की कौड़ी थीं..। अक्सर जो असल ज़िंदगी में अनाड़ी होते हैं..वो किताबों में ज़िंदगी का ख़ाका खोजते हैं..लेकिन सूरज की ज़िंदगी में किताबें भी नहीं थी..। कुछ साल पहले अज्ञेय को पढ़ने की कोशिश की थी..लेकिन दूसरे पन्ने तक पहुंचते-पहुंचते ही सो गया था..।
”ये निगोड़ी गीली लकड़ियां ऐसे नहीं जलेंगी..।” रसोई में विधवा ज़ोर से चिल्लाई..। “मुन्नी ज़रा कुछ सूखी लकड़ियां लेकर आना..।“
तभी हमारे स्वप्निल सूरज के दिल में किसी से इन हिलोरें लेती उम्मीदों को बांटने की तीव्र इच्छा जगी..। वो सीढ़ियां उतरकर रसोई में गया..जहां खड़ूस विधवा और कौमुदी चूल्हा जलाते-जलाते बेदम हो रही थीं..।
“दुनिया में आर्टिस्ट होने से बेहतर कुछ नहीं..!” मैं जहां चाहूं, वहां जा सकता हूं..। ना तो दफ्तर में सिर खपाने की ज़रुरत है..ना खेतों में पसीना बहाने की..। मुझपर हुक्म चलाने वाला सिर्फ मैं हूं..। और इस आज़ादी के साथ मैं इंसानियत की भी भलाई कर रहा हूं..।“
रात के खाने के बाद अब उसके आराम करने की बारी थी..। आमतौर वो दोपहर बाद तक सोने का आदी था..। लेकिन आज उसे अचानक महसूस हुआ मानो कोई उसकी टांग खींच रहा है..। कोई बिना रुके हंसे जा रहा था..और चिल्ला-चिल्लाकर उसे पुकार रहा था..। सूरज ने आंखें खोलीं तो सामने उसका दोस्त विवेक था..। इस वसंत में कुदरत के नज़ारों को कैनवॉस को उतारने के लिए वो भी इन्हीं पहाड़ों पर आया था..।
“अरे वाह! ये मैं क्या देख रहा हूं..!”
हाथ मिलाने और कुशलक्षेम पूछने की रस्म अदायगी हुई..।
“क्या कुछ साथ भी लेकर आए हो..? तुमने तो सैंकड़ों स्केच पूरे कर डाले होंगे..?” विवेक के कंधे पर टंगे झोले को देखकर सूरज ने पूछा..।
“ह...म! हां, कुछ कोशिश की है..। और अपनी सुनाओ..? क्या तुमने कुछ नया नहीं बनाया..?”
सूरज ने बिस्तर के पीछे गोता लगाया...और शरमाते हुए धूल और मकड़ी के जालों से भरा एक कैनवॉस पेश किया..।
“ये देखो...प्रेमी से जुदा होने के बाद एक प्रेमिका..! मैंने इसे तीन बैठकों में बनाया है..अभी अधूरी है..”
तस्वीर में कौमुदी का एक धुंधला सा नक्श था..जिसे एक खुली खिड़की की दहलीज़ पर दिखाया गया था..। खिड़की से बगीचे को देखा जा सकता था..। पृष्ठभूमि को सूरज ने नीला रखा था..। विवेक को पेंटिंग ख़ास नहीं भाई..।
“ह’म!...एक्सप्रेशन तो है,” वो बोला..। “दूरी का ऐहसास भी नज़र आता है, लेकिन...लेकिन वो झाड़ी देख रहे हो..वो चिल्लाती हुई नज़र आती है..!”
कला विमर्श में मदिरा का पदार्पण हुआ..।
शाम घिरते-घिरते सूरज के यहां हसन भी आ पहुंचा..। हसन का नाम भी प्रतिभाशाली चित्रकारों में आता था..। वो सूरज का पड़ोसी था..। उम्र कोई पैंतीस की रही होगी..उसके बाल लंबे थे..खद्दर के कुर्ते पर झोला उसकी पहचान थी..। शराब की बोतल देखकर वो पहले सकुचाया, सीने में दर्द का रोना रोया..लेकिन दोस्तों के मनाने पर एक जाम उसने भी उठा लिया..।
“मैंने एक सबजेक्ट सोचा है..” पीते-पीते उसने कहना शुरू किया..। “मैं कुछ नया पेंट करना चाहता हूं...कोई देवी या देवता या फिर कोई असुर..। मैं इसे हिंदुत्त्व के परिप्रेक्ष्य में पेश करना चाहता हूं..। एक तरफ़ आर्यन सभ्यता और दूसरी तरफ़ पहाड़ी रीतियां..” मैं अंतर्मन की बात करना चाहता हूं, समझे..?”
नीचे विधवा लगातार चिल्ला रही थी:
“मुन्नी, मुझे लाकर प्याज़ दे! कमबख्त अभी तक चूल्हा नहीं जलाया....”
तीनों दोस्त कमरे में घंटों इस तरह चहलकदमी करते रहे..जैसे पिंजरे में कैद भेड़िए हों..। तीनों उमंग से भरे हुए थे..और घंटों बिना रुके बतियाते रहे..। कोई भी उनकी बातें सुनता..उसे यही लगता कि भविष्य, प्रतिष्ठा, पैसा..सबकुछ इनके कदमों पर आने ही वाला है..। लेकिन तीनों में से किसी के जेहन में ये ख्याल नहीं था..कि वक्त बीत रहा है, कि हर बीतते दिन के साथ जीवन का पटाक्षेप भी नज़दीक आता जा रहा है, कि वो अब तक दूसरे लोगों की कीमत पर जीते आए थे..लेकिन कुछ पा नहीं सके थे, कि वो सभी एक क्रूर कानून से बंधे हैं..। कानून जिसके मुताबिक सैकड़ों प्रतिभाओँ में से सिर्फ दो या तीन ही होती हैं..जो निशान छोड़ पाती हैं..। बाकी सबके हाथ इस लॉटरी में खाली ही रह जाते हैं..शायद वो सभी उन चुनिंदा खुशनसीबों की कामयाबी की सीढ़ी बनते हैं....तीनों दोस्त खुश थे और भविष्य की तरफ़ देखते हुए उनकी आंखों में चमक थी..।
...सुबह एक बजे हसन ने विदा ली..और अपने झोले को लहराता हुआ वो घर लौट गया..। विवेक सूरज के कमरे में ही सोने के लिए रुक गया..। सोने से पहले सूरज मोमबत्ती लेकर रसोई में पानी पीने गया..। अंधेरे गलियारे में कौमुदी एक बक्से पर बैठी थी, उसके हाथों ने उसके घुटनों को थाम रखा था..वो आकाश के शून्य को अनवरत निहारे जा रही थी..। उसके चेहरे पर स्निग्ध मुस्कान थी, आंखों में एक अजीब सी दीप्ति थी..।
“क्या ये तुम हो..? क्या सोच रही हो..?” सूरज ने पूछा..।
“मैं सोच रही हूं..एक दिन तुम मशहूर बनोगे...” उसने लगभग कानाफूसी के लहज़े में कहा..। “मैं यही सोच रही थी..पूरी दुनिया में तुम्हारा नाम होगा..लोग तुम्हारी पेंटिंग्स की मिसाल देंगे...मैं तुम्हारी बातें सुन रही थी...ओहऍ इन सपनों का कोई ठिकाना नहीं है...”
सूरज ज़ोर से हंस दिया..और अपना हाथ प्यार से कौमुदी के कंधों पर रख दिया..।

(समाप्त)