गुरुवार, नवंबर 22, 2012

punishment or revenge?

assuming that i'm on the facebook page of a friend who is infinitely un4givin 2

me n having spared a lot of time to spend in 4gettin myself, let me indulge in a

lit bit more of 'baudhik ayashi'; loved all sort of aiyashis in ny case...


सज़ा ए मौत का ये पूरा सिद्धांत मुझे रूसी उपन्यासकार टर्जिनेव के एक कथानक की याद दिलाता है..। जहां दो बदमाश दोस्तों के हाथ एक अनमोल खज़ाना लगता

है। दौलत इतनी थी कि दोनों में से एक के लिए इसे बांटना मुमकिन नहीं था..। उसने तरकीब रचकर खुद को मरा हुआ साबित करवाया..और ऐसे सारे सुबूत छोड़े

जिससे उसका दोस्त कातिल साबित हो..। लालच ने एक दोस्त से दूसरे दोस्त को खत्म करवाया, लेकिन कानूनी तरीके से..। लेकिन कातिल साबित हुआ दोस्त

फांसी से पहले ही जेल तोड़कर भाग गया और 12 साल बाद एक मशहूर नेता की लाश को घसीटता हुआ अदालत के सामने पेश हुआ..। उसने अदालत से कहा;

मैंने उस आदमी को मारा है जिसके कत्ल के लिए आपने मुझे 12 साल पहले सज़ा ए मौत दी..। अगर आपका पहला फैसला सही था तो आप मुझे उसी कत्ल की

दोबारा सज़ा नहीं दे सकते..और अगर पहला ही फैसला ग़लत था तो क्या गारंटी है कि अब जो आप सुनाएंगे वो भी सही होगा..? कहानी हमारे विषय के लिए

कुझ अहम सवाल छोड़ जाती है..। उस आदमी ने कहा- अगर मुझे फांसी हो जाती तो अब क्या होता..? आपको पता चलता कि जिसके कत्ल के लिए आपने फांसी

चढ़ाया वो मरा ही नहीं था..तो क्या आप मुझे मेरी ज़िंदगी लौटा सकते थे..? आप मुझे जो जीवन दे नहीं सकते उसे छीनने का क्या हक है? कहानी के मुताबिक

उस जज को अंत में पेशा छोड़ना पड़ता है..। लेकिन इंसान कब ये नहीं करता रहा है..? कहना कुछ और करना उसके ठीक उलट..। बात सभ्यता की होती

है..संस्कृति की होती है..। मगर आंख के बदले आंख, सिर के बदले सिर..ये तो बर्बर समाजों में होता रहा है..। बहुत साधारण नियम है- अगर किसी ने दूसरी की

ज़िंदगी छीनी है तो उसे भी ज़िंदा रहने का कोई हक नहीं है..। लेकिन एक ही कृत्य से दूसरे को कैसे मिटाया जा सकता है..? ये साधारण बुद्धि के नियमों के विरुद्ध

है..। अगर कसाब से पहले 166 लोग मारे गए थे..तो 21 नवंबर के बाद 26/11 167 मौतों के लिए इतिहास में दर्ज होगा..। अगर जान लेने का कृत्य अपराध

है..तो फिर इसे कोई शख्स या संगठन करे या फिर समाज इससे कोई फर्क नहीं पड़ता..। सज़ा ए मौत उस नज़र में समाज की ओर से एक ऐसे इंसान पर किया

गया अपराध है, जो बेचारा यूं ही लाचार है..। मैं इसे सज़ा नहीं कह सकता..। इसे अपराध ही कहना होगा..। और ये अपराध क्यों होता है..? ये समझना कठिन

नहीं..। समाज बदला लेता है एक ऐसे शख्स से जो उसके बनाए नियम नहीं मानता..। ये कोई नहीं सोचता अगर कोई कातिल है तो वो बेहद गहरे में बीमार है..।

अधिकाधिक उसे नर्सिंग होम की ज़रुरत है..। जहां उसका मानसिक, भावनात्मक और शायद आध्यात्मिक इलाज हो..। हां ये बात सही है किसी की जान जाती है..।

लेकिन क्या कोई कह सकता है किसी दूसरे की जान लेकर उसे लौटाया जा सकता है..। अगर ये मुमकिन है तो मैं फांसी का हिमायती हूं..। तब कातिल को जीने

का कोई हक नहीं है..और क़त्ल हुए शख्स को ज़िंदगी वापस मिलनी ही चाहिए..। ऐसा होता नहीं है..। जो चला गया वो वापस नहीं आता लेकिन आप खून से खून

को धोने की कोशिश करते हैं..। इतिहास में हमेशा यही कोशिश होती रही है..। बमुश्किल 300 साल पहले तक पागलों का इलाज उनके बदन से खून चूसकर किया

जाता था..। ऐसा माना जाता था कि उनके खून में ऊर्जा ज़रुरत से ज़्यादा है और उसे निकालने की ज़रुरत है..। अल्बर्ट कामू के नोबेल पुरस्कार जीतने वाले उपन्यास 'अजनबी' की कहानी भी मौजूं है..। एक व्यक्ति कत्ल के आरोप में पकड़ा जाता है..। बल्कि पकड़ा जाना कहना भी गलत होगा..। क्योंकि वो बचने की कोई कोशिश करता ही नहीं है..। वो समंदर किनारे बैठे एक अजनबी शख्स का कातिल होता है..। मामला अजीब था..क्योंकि इस कत्ल का कोई मकसद नहीं था..। अदालत ने आरोपी से पूछा- 'ये समझ से परे है तुमने कत्ल क्यों किया..?' आरोपी का जवाब था कि ये 'क्यों' का प्रश्न ही नहीं है..। ज़्यादातर लोग जो करते हैं उसकी वजह खोजते हैं..। लेकिन मैं साधारण इंसान हूं..। मैंने खून किया क्योंकि उस वक्त करना चाहता था..और ये एक रोमांचक अनुभव था..। जब मैंने एक उस शख्स की पीठ में खंजर भोंका..जिसने मेरा कुछ बिगाड़ा भी नहीं था..मैं नहीं जानता क्यों लेकिन मेरे लिए सबसे गहरा पल था..। अब बताइये क्या ऐसा शख्स कातिल है या फिर पागलपन का ऐसा केस जिसे ज़िंदगी में उत्सव मनाने के लिए कोई मौका ही नहीं मिला..? शायद उस चरित्र को प्रेम की ही भूख रही होगी..। क्योंकि अगर सिगमंड फ्रायड से पूछेंगे तो वो यही कहेगा कि चाकू पुरुष जनानांग की निशानी है..और उसे घोंपना सिर्फ दूसरे के भीतर प्रवेश करने का तरीका है..एक बीमार कोशिश..। और दुनिया का हर पुरुष स्त्री के शरीर में प्रवेश क्यों चाहता है..? इसलिए क्योंकि उसका जन्म स्त्री के शरीर से होता है..और अवचेतन की स्मृति में कोख से बढ़कर और कोई सूकून नहीं होता..। हर शख्स कोई कोख खोज रहा है..। कातिल भी, लेकिन रुग्ण तरीके से..। लेकिन रुग्णता का जिम्मेदार समाज है..। अगर कत्ल होता है तो समाज को सजा मिलनी चाहिए..। पूरे देश को मिलकर दंड भरना चाहिए..। आपके समाज में ऐसा हुआ क्यों..? आपके नागरिक इतने विध्वंसक क्योंकर हो गए..? क्योंकि कुदरत तो सबको सृजन का बीज बनाकर भेजती है..। इस समाज में होश संभालते संभालते ही आप भ्रमित हो चुके होते हैं..। मौत की सज़ा ही क्यों, दुनिया की कोई भी सज़ा कभी प्रीतिकर नहीं हो सकती..। हर रोज़ अपराधियों की तादाद बढ़ती जाती है..। हर रोज़ आप नई जेलें बनाते हैं..। अजीब है, होना तो इससे उलट चाहिए था..। इतनी सारी अदालतें, इतने सारे कानून, पुलिस..इन सब के साथ तो अपराध को कम होना चाहिए था..। शायद आपको पता ना हो..महज़ डेढ़ सौ साल पहले तक ब्रिटेन में चोरी के लिए सरेआम मृत्युदंड आम बात थी..। ये भी 'सबक' सिखाने का रिवाज था- चोरी की तो सरेआम सूली पर टांगे जाओगे..! लेकिन क्या हुआ..? कोई सौ साल पहले ही इसे खत्म करना पड़ा..। वहां की संसद के जेहन में दो बातें लाई गईं..। पहली तो ये मौत का नज़ारा देखने आने वालों की तादाद बेकाबू हो रही थी..। अगर समाज में किसी बदसूरती की प्यास है तो ये कोई अच्छा लक्षण तो है नहीं.. और ये लक्षण आज भी मौजूद हैं..। स्टेडियम में 13 प्रोफेशनल खिलाड़ी खेल रहे होते हैं..लेकिन वो 1 लाख सीटों पर बैठे क्या करते हैं..? एक प्रकार से वो भी खेल के प्रतिभागी हैं..। खिलाड़ियों के लिए तो अक्सर उनका बिज़नेस ही होता है और लाखों मूर्ख...और ये ग्रेट ब्रिटेन के मूर्ख क्या करते थे..? वो मौत के खेल में इतना डूब जाते थे कि जेबकतरों की तादाद बढ़ने लगी..! संसद से पूछा गया ये क्या माजरा है..? लोग चोरी ना करने का 'सबक' सीखने जा रहे हैं और वहीं उनकी जेब काटने वाले घूम रहे हैं..! सज़ा के ज़रिए सीखने के लिए इंसानों का जेहन नहीं बना है..। मैंने देखा है कैदियों के लिए जेल अजीज़ घर बन जाता है..। क्योंकि वहां उसे अपना 'समाज' मिलता है..। बाहर वो बेगाना था..ये उसकी अपनी दुनिया है..जेलों के भीतर कैद लोगों का मनोभाव ये नहीं होता कि गुनाह सलाखों के पीछे पहुंचाता है..। ये ज़्यादातर पकड़े जाने का ही रंज होता है..ये सही करने का सवाल नहीं है..ग़लत को सही तरीके से करने का हुनर है..और जेल इस हुनर की सबसे आला यूनिवर्सिटी होती है..। सज़ा से कोई नहीं सीखता..। बल्कि कानून तोड़ने के डर से आप सज़ायाफ्ता को बावस्ता करवा देते हैं..। वो जानते हैं पुलिस की मार मिलेगी..। अगर एक इंसान झेल सकता है तो मैं क्यों नहीं..और यूं भी 100 चोरों में से औसतन 2 फीसदी ही पकड़ में आते हैं..और अगर आप 2 फीसदी रिस्क भी ना ले पाएं तो फिर कैसी मर्दानगी..? ये कैसा समाज है जहां कुछ लोगों को सींखचों के भीतर अपनापन तलाशना पड़े..? एक ओर अनवरत इंसानों को पैदा किया जा रहा है..। दूसरी ओर संसाधन चंद लोगों की मुट्ठी में हैं..। हालात पैदा किए जा रहे हैं जहां लोगों के पास अपराध के सिवा कोई चारा ही ना हो..। लेकिन मुझे नहीं लगता अपराध में को कम करने में किसी की भी गंभीर दिलचस्पी है..। वकील, जज, न्याविद्, सरकारें कहां जाएंगी..? ये बड़ी बेरोज़गारी समस्या हो जाएगी..। आप खुद को नैतिक, पाक-साफ मान सकें इसलिए समाज को अपराधी भी चाहिएं..। संत खुद को संत महसूस करे, इसके लिए अपराधी होना भी लाज़िमी है..। अपराधी नहीं होंगे तो फिर संत भी कौन कहलाएगा..? अगर सिर्फ सज़ाओं से जुर्म रुकता तो हमें राम, जीज़स, बुद्ध को याद रखने की क्या ज़रुरत होती..? सभी अच्छे, सच्चे होते तो ये सभी भीड़ का हिस्सा ही होते..। बल्कि जनमानस मूढ़ रहे ये दुनिया के सभी संबुद्धों की साझी साज़िश लगती है..और मैं इसके खिलाफ़ हूं..। लिहाज़ा मानता हूं कि फांसी सिर्फ इस बात का सबूत है कि हमारा सही मायनों में सभ्य होना बाकी है..। दुनिया में अपराधी कौन है..? सिर्फ लोग हैं..तरह-तरह के लोग..। उनमें से कुछ को सबकी साझी करुणा चाहिए..।

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