गुरुवार, अप्रैल 11, 2013

ज़ाकिर नाइक की नज़र में ओशो-एक आलोचना

खुद को ओशो का 'अनुयायी' कहना सही नहीं होगा..। मगर ये सच है कि उनकी समझ और शख्सियत दोनों का कायल रहा हूं..। दुनिया के लगभग किसी भी विषय पर उनकी अंतर्दृष्टि, उनकी वक्तृता अनुपम है..। सभी जर्जर, सामाजिक और राजनीतिक ढांचों को लेकर उनके विद्रोह ने करोड़ों को बदला है..। हाल ही में इंटरनेट पर ज़ाकिर नाइक नाम के इस्लामिक प्रचारक को सुना..। वे खुद को धर्मों के तुलनात्मक अध्ययन का विशेषज्ञ बताते हैं..। वेद श्लोक, कुरान की आयतें, बाइबिल के वचनों की बौछार वो अपने भाषणों में करते हैं..। श्री श्री रविशंकर के साथ उनकी चर्चा सुनी..। नाम गोष्ठी का दिया गया था..लेकिन ज़ाकिर नाइक की रटी आयतों और श्लोकों के साथ ये आखिर में एक बहस ही साबित हुई..। जैसा कि वो करते हैं ज़ाकिर नाइक ने 'मूर्तिपूजक', 'कई देवताओं को मानने वाले' धर्मों को जमकर कोसा..। हिंदु और इस्लाम धर्मों पर तुलनात्मक अध्ययन की किताब निकालने पर रविशंकर की सरेआम खिंचाई भी की..। किताब में रविशंकर ने दावा किया था कि इस्लाम के कई रिवाज़ हिंदू संस्कृति से निकले हैं..। शायद श्री श्री को इस बौद्धिक गोरिल्ला हमले का इल्म ना रहा होगा..। उनके श्रीमुख से सफाई निकली भी तो ये कि किताब को जल्दबाज़ी में छपवाया गया था..। उन्होंने प्रण किया कि अब ये किताब नहीं छपेगी..। रविशंकर जी को उनकी पैनी बुद्धि के लिए कभी नहीं जाना जाता..। उनकी अपील अपनी शख्सियत के करिश्मे और शायद उनकी 'पीआर मशीनरी में ज़्यादा है..। मैंने उनका ऐसा लेख भी पढ़ा है जिसमें उन्होंने मार्क्सवाद को भगवदगीता के साथ जोड़ा है..। लेकिन मार्क्स के द्वंद्वात्मक भौतिकवाद (‘Dialectical Materialism’ ) का पूरे आलेख में ज़िक्र तक नहीं था..। बहरहाल इस गोष्ठी का मूड़ भांपने में रविशंकर जी पूरी तरह नाकाम रहे..। सुनने वालों में ज़्यादातर एक ही धर्म के लोग थे..और वो भी पहले से तैयार प्रश्नों के साथ..। श्री श्री की मृदुता और ज़ाकिर नाइक को जवाब दे पाने में असमर्थता ने गुरुदेव की जमकर किरकिरी कराई..।
ज़ाकिर नाइक आज हिंदुस्तान ही नहीं दुनिया में तेज़ी से मशहूर हो रहे इस्लामिक प्रचारकों में से एक गिने जाते हैं..। अंग्रेज़ी और हिंदी दोनों में उनका खुला हाथ है..। संक्षेप में कमअक्ल और धर्मांध लोगों को सम्मोहित करने की क्षमता उनमें साफ है..। सभी अनुयायियों की तरह उनके मानने वाले भी ज़्यादातर लकीर का फकीर ही हैं..। सोच की मौलिकता और समालोचना की कमी को ज़ाकिर कुरान, बाइबिल और वेद ग्रंथों के वचन तोते की तरह रटकर पूरी करते हैं..। अध्याय, पन्ना नंबर, श्लोक संख्या, लाइन का नंबर तक उन्हें ज़ुबानी याद होता है..। भेड़चाल मानसिकता वाले झुंड इसे विद्वता की निशानी के तौर पर देखते हैं..। जब भी ज़ाकिर नाइक अपना भाषण खत्म करते हैं..श्रोता अक्सर उन्हें standing ovation देते हैं..।
लेकिन मेरी दिलचस्पी रविशंकर-ज़ाकिर नाइक की इस बहस में तब हुई जब ज़ाकिर नाइक ने ओशो को सुरा, इख्लास समेत दूसरे इस्लामिक शास्त्रों की कसौटी पर रखकर पूरी तरह खारिज किया..। कुरान के मुताबिक ईश्वर अजन्मा है, अंतहीन है, पूरी कायनात में कुछ ऐसा नहीं जो उसके जैसा हो..। आमतौर पर कट्टर मुल्ला इसी की रोशनी में रखकर इस्लाम को सर्वोपरि और इकलौता स्वीकार्य धर्म साबित करने की कोशिश करते हैं..। इस पूरी बहस में ओशो की बात कह सके, ऐसा कोई नहीं था..। लिहाज़ा मामला एकतरफ़ा ही रहा..। श्री श्री भी ओशो के नाम पर अपराध बोध में ही दिखे..। उन्होंने श्रोताओ से अपील कर डाली कि उनके जैसे धर्मगुरूओं के बारे में ओशो को देखकर राय ना बनाई जाए..। मैं किसी धर्म का जानकार होने का दावा तो नहीं करता..लेकिन मेरी राय में ज़ाकिर नाइक जैसे शख्स को ओशो जैसे विद्रोही संतों पर उत्तर ना देना पूरी मानवता पर घात होते देखने जैसा है..। इसीलिए ये लिख रहा हूं..।
ज़ाकिर नाइक ने ओशो का ज़िक्र हिंदू धर्म की गुरू परंपरा को झुठलाने के संदर्भ में किया..। उनके चिंतन को समझाने वाली एक भी बात रखे बगैर..ज़ाकिर नाइक ने फैसला भी सुना दिया..। लेकिन ओशो ने ईश्वर की जो अवधारणा दी वो धन, विद्या, विनाश, पालन वगैरह में विशेषज्ञ कोई super human being नहीं है, वो अल्लाह भी नहीं है..। ओशो का बोध बुद्ध के शून्यवाद या वेदांत के अद्वैतवाद के ही निकट नज़र आता है..। लेकिन कई बार वो नास्तिकवाद में वामपंथियों को छूते नज़र आते हैं..। उनकी नज़र कुछ हद तक 17वीं सदी में पश्चिम के सबसे बड़े तर्कवादी SPINOZA से मिलती है..। ओशो विज्ञान के साथ पूरब की समझ को जोड़ते हैं..। उन के के चिंतन में 'इल्हामी' जैसी कोई किताब या ग्रंथ नहीं है..जिसे सीधे ऊपर से ट्रांसमिट करके भेजा गया हो ((कुरान, बाइबिल और वेद ऐसा दावा करते हैं)..। ज़ाकिर नायक खुद को तुलनामत्मक धर्मों के अध्ययन का 'स्टूडेंट' बताते हैं..लेकिन बाकी धर्मों की तरह ओशो के बारे में भी वही मानते हैं जो वो मानना चाहते हैं..। ये सही है कि ओशो का नज़रिया हिंदू, बौद्ध, जैन, सूफियों के नज़दीक है..लेकिन उन्होंने जन्म या कर्म से हर पहचान का खंडन ही किया..। उन्होंने साफ ऐलान किया कि वो हिंदू, मुस्लिम, भारतीय आदि आदि सभी पहचानों को खारिज करते हैं..। इसलिए सबसे पहले तो हिंदू-मुस्लिम की किसी बहस में ओशो को लाना ही अतार्किक है..। ज़ाकिर नायक दावा करते हैं ओशो ने खुद को भगवान कहलाया..। इससे ना सिर्फ ओशो बल्कि पूरब के धर्मों में ईश्वर के स्थान के बारे में भी उनका अज्ञान ही झलकता है..। ज़ाकिर हुसैन के मुताबिक बाकी अब्राहिमी धर्मों की तरह इस्लाम भी अनुयायियों से 'ईश्वर प्रदत्त' किताब के एक-एक अक्षर को बिना सवाल उठाए मानकर चलने की मांग करता है..। ईस्लाम जिस ईश्वर को देखता है वो इस ब्रह्मांड का हिस्सा है ही नहीं, वो सातवें आसमान पर रहता है..। बल्कि वो इस कायनात को रचने वाली अलग ईयता है..। ये पालनहार पुराने ज़माने के सम्राट की तरह एक किताब में लिखे 'CODE OF CONDUCT' के मुताबिक फैसला सुनाता है..वो भी दुनिया के दरबार के आखिरी दिन..। आपको जन्नत नसीब होगी या जहन्नुम ये इस बात पर निर्भर है कि आप इस CODE OF CONDUCT पर कितना चलते हैं..। इस्लाम में अल्लाह का कोई आकार नहीं है,उसकी उपमा भी नहीं दी जा सकती..। लेकिन उसके लिए 'अल्लाह हू अकबर' जैसे उपमानों का इस्तेमाल होता है..। ज़ाकिर नाइक ये नहीं समझ सकते कि मूर्ति लफ्ज़ों की गढ़ी जाए या पत्थर की..कुफ्र तो हो ही गया..!
मूर्ति ना सही ऐसे चिन्हों की इस्लाम में भी कमी नहीं..जिन्हें पवित्र माना गया है..और उनपर मज़ाक में भी उंगली उठाने वालों को ज़्य़ादातर मुस्लिम समाजों ने बख्शा नहीं है..। इस्लाम में बुतपरस्ती हराम है..लेकिन प्रार्थना की भाषा सिर्फ अरबी हो सकती है..। आज तक किसी देश की मातृभाषा में नमाज़ का चलन नहीं पड़ा..। माना ईश्वर एक पत्थर में नहीं हो सकता.. लेकिन क्या वो किसी राष्ट्र विशेष का पासपोर्ट धारी है..? अगर नहीं तो दुनिया भर के मुस्लिम सिर्फ मक्का की ओर मुंह फेरकर ही नमाज़ क्यों पढ़ सकते हैं..? ओशो थिरकते कदमों में, गीतों की तान में, खिलते फूलों में ईश्वर को देखते हैं..। इसलिए ज़ाकिर नाइक परिभाषाओं में कैद अपने सर्वशक्तिमान की रोशनी में ओशो को सही-सही देखें भी तो कैसे?
क्रमश:

9 टिप्‍पणियां:

  1. बेनामी22 मई, 2013

    अच्छा आलेख है ....

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  2. बेनामी21 जुलाई, 2013

    जाकिर नाईक पागल है

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    1. बेनामी24 सितंबर, 2013

      MERA MANNA HAI KI SARA ISLAM BVKHUF LOGO KI JAMAT HAI IS SE JYADA KUCH NHI.

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    2. बेनामी24 सितंबर, 2013

      MERA MANNA HAI KI SARA ISLAM BVKHUF LOGO KI JAMAT HAI IS SE JYADA KUCH NHI.

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  3. बेनामी24 सितंबर, 2013

    KHUCH MULLA MOLVIYO NE LOGO KA PAGAL BNA RAKHA HAI. IS LIYE AAJ 80% CRIME MUSLIM LOGO KE DWARA HO RAHA HAI AUR AAJ KI DATE ME 90% BURAIYA ISLAM DHARM ME MOJUD HAI. LEKIN IN BEVKUF LOGO KO YE SAB DHIKHAI HI NAHI DETA. INKA TO BUS EK HI NARA HAI HUM 2 AUR HMARE 12. IS SE AAGE INHE KHUCH PATA NAHI HAI. BUS KISI BHI TREKE SE ISLAM KO FAILAO. ARE BHAI IS ISLAM KO APNAKER TUM KYA KROGE ? IS SE NA TO SAMAJ KA BHALA HAI AUR NA DESH KA. IS LIYE MERI KHASH TOUR PER MULLA - MOLVIYO SE APPIL HAI KI KRPIYA KER KE SHUDHER JAO AUR IS TRIKE SE LOGO KO BEVKHUF MAT BNAO THANKYOU.

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    1. बेनामी18 मार्च, 2015

      aare bewkuf tum kiya andhe ho gaye ho jo tumhe shachai najar nahi aati tum sika ke ek taref kiyo dekh rahe ho agar dekhna hai to dono taraf dekho dr.zakir naik jo kar rahe hai wo sahi kar rahe hai agar hai dam to galat sabit karo . Mera whatsaap no. Hai +966506301924 sampark karo mujhse tumhe mai dikhata hu galat kawn hai

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  4. ईश्वर या परम ऐसा भी है , वैसा भी है ,सब कुछ है. ..मानव निर्मित ये धर्म और समुदाय ईश्वर को पूरा कभी परिभाषित नहीं कर सकते.उसकी परिभाषा से पूरा ब्रह्माण्ड भरा है..जिसने सत्य को जाना है वो मौन हो जाता है या नेति बोल देता या नकार ही देता है..क्योंकि बुद्घि की दौड़ छोड़कर वहां प्रवेश होता है. .दो गुण उठाते हैं और अपना तबला पिटने लगते हैं..दुसरों को गलत बताने लगते हैं..

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  5. ओशो को समझना उसी के लिए ही संभव जो पूर्वाग्रह से मुक्त हो

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