गुरुवार, दिसंबर 31, 2009

बंजारे का गीत





There’s a time to rend and time to sew
Time to embrace, time to bid adieu...

साल बदलने को है, विदाई का एक और पल सामने है..। वक्त के उस शहर की दहलीज़ पर हूं जो अब जीज़स के जन्म के बाद के 2009वें साल के तौर पर दर्ज है..। बंजारे सफ़र में इस शहर ने कई रंग दिखाए..। ऐहसासों के रास्तों पर जो कदम पड़े, उनके निशां, इस ब्लॉग में दर्ज हुए..। देवदार की छांव में बैठे मन की घाटियों को निहारते..कभी आनंद का अलख जगा, कभी दिल ने दर्द भरी तान छेड़ी..। लेकिन शब्द का आलाप आत्मा के सुर नज़दीक रहे, इस बात की हमेशा फ़िक्र की मैंने..। इस शहर का हर रंग गूढ़ा ही चढ़ा..।
मेरे लिए मेरी ऊंगलियों की हरकतों के साथ उकेरे जाते लफ्ज़ अंतस का आईना था..। इसीलिए फ़र्क नहीं पड़ा अगर इस झरोखे से मेरी ज़िंदगी की सूरत भी कुछ को नज़र आई..।
ज़िंदगी के मुसाफ़िरों के लिए रास्ता सब कुछ होता है, पड़ाव नहीं..। मंज़िल तो खैर एक ही है, सबकी..। लेकिन पड़ाव भी दर्ज होते हैं..हमारे मिलने, हमारे विदा होने की यादों में



मैं बंजारा
वक्त के कितने शहरों से गुज़रा हूं
लेकिन
वक्त के इस इक शहर से जाते-जाते
मुड़के देख रहा हूं
सोच रहा हूं
तुमसे मेरा ये नाता भी टूट रहा है
तुमने मुझको छोड़ था जिस मोड़ पे आके
वक्त का वो मोड़ भी मुझसे छूट रहा है..।

मुझको विदा करने आए हैं
लम्हों के वो टुकड़े
वो सारे दिन
जिनके कंधे पर सोती है
अब भी तुम्हारी ज़ुल्फ़ की खुश्बू
सारे पल
जिनके माथे पर हैं रौशन
अब भी तुम्हारे स्पर्श का टीका
नम आंखों से
गुमसुम तुमको देख रहे हैं
मुझको इनके दुख का पता है
इनको मेरे ग़म की ख़बर है
लेकिन मुझको हुक्म ए सफ़र है
जाना होगा
वक्त के अगले शहर मुझे अब जाना होगा

वक्त के अगले शहर के सारे बाशिंदे
सब दिन सब रातें
जो तुमसे नावाकिफ़ होंगे
वो कब मेरी बात सुनेंगे
मुझसे कहेंगे
जाओ अपनी राह लो राही
हमको कितने काम पड़े हैं
जो बीती सो बीत गई
अब वो बातें क्यों दोहराते हो ?
कंधे पर ये झोली रखे
क्यों फिरते हो क्या पाते हो ?
मैं बेचारा
इक बंजारा
आवारा फिरते-फिरते जब थक जाऊंगा
तनहाई के टीले पर जाकर बैठूंगा
फिर जैसे पहचान के मुझको
इक बंजारा जानके मुझको
वक्त के अगले शहर के
सारे नन्हे-मुन्हे भोले लम्हे
नंगे पांव
दौड़े-दौड़े भागे-भागे आ जाएंगे
मुझको घेर के बैठेंगे
और मुझसे कहेंगे
क्यों बंजारे
तुम तो वक्त के कितने शहरों से गुज़रे हो
उन शहरों की कोई कहानी हमें सुनाओ
उनको कहूंगा
नन्हे लम्हो !
एक थी रानी...

सुनके कहानी
सारे नन्हे लम्हे
ग़मगीं होकर मुझसे ये पूछेंगे
तुम क्यों उनके शहर न आईं
लेकिन उनको बहला लूंगा
उनसे कहूंगा
ये मत पूछो
आंखें मूंदो
और ये सोचो
तुम होतीं तो कैसा होता
तुम ये कहतीं
तुम वो करतीं
तुम इस बात पे हैरां होती
तुम इस बात पे कितनी हंसती
तुम होती तो ऐसा होता
तुम होतीं तो वैसा होता

धीरे-धीरे
मेरे सारे नन्हे लम्हे
सो जाएंगे
और मैं
फिर हौले से उठकर
अपनी यादों की झोली कंधे पर रखकर
फिर चल दूंगा
व़क्त के अगले शहर की जानिब
नन्हे लम्हों को समझाने
भोले लम्हो को बहलाने
यही कहानी फिर दोहराने
तुम होतीं तो ऐसा होतॉ
तुम होतीं तो वैसा होता...


ब्लॉग के इस कोने में इस अकेले सुरजमूखी का अस्तित्त्व यहीं तक !

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