शुक्रवार, जनवरी 08, 2010

एक नज़्म..



इश्क का राज़ ग़र न खुल जाता,
इस कदर तू न हमसे शरमाता..

आके तब बैठता है वो पास,
आप में जब हमें नहीं पाता..

जिंदगी ने वफा न की वरना
मैं तमाशा वफा का दिखलाता..

सब ये बातें हैं चाह की वरना
इस कदर तू न हम पे झुंझलाता..

मैं न सुनता किसी की बात आश
दिल जो बातें न मुझको सुनवाता..

2 टिप्‍पणियां:

  1. बेनामी10 जनवरी, 2010

    jo bhi likha hai, achha likha hai aapne........vafa kijiye khud se..jindgi ne bdi vafayen nibhai hai aapse, ye na bhooliye..

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  2. हां, गांठ ये रह गई कि दिल बेवफाओं को ज़िंदगी मानता रहा ! लेकिन फिर ऐसा भी इसीलिए हुआ क्योंकि ज़िंदगी से वफा निभा रहा था..। वफ़ा का रास्ता दर्द का रास्ता है..पूछो क्यों ? क्योंकि दुनिया अभी इतनी संवेदनशील नहीं, जहां प्रेम के फूल खिलें और उनकी पंखुड़ियां बिखर न जाएं..। प्रेम का बाना सबसे दिलकश है, इसलिए अक्सर सबसे गहरे फरेब उसी को ओढ़कर ज़िंदगी में दाखिल होते हैं..ये अलहदा बात है कि वो फरेब भी एक वजह से होते हैं..हमें हमें सत्य के अधिक निकट लेकर आते हैं..।

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