सोमवार, जनवरी 11, 2010

सफेद रातें


पहली रात

राख से रूखी, कोयल से काली, रात कटे ना हिज्रां वाली..
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ये एक खूबसूरत रात थी, प्रिय पाठको, कुछ ऐसी जो सिर्फ जवानी के दिनों में ही मुमकिन है..। जगमगाते सितारों को देखकर ये सवाल उठना लाज़िमी था कि बेज़ार, दुनियादारी से भरे लोग ऐसे आसमान तले कैसे रह सकते हैं..। आपको बता दूं, अपने आप में ये सवाल भी जवानी के दिनों में उठता है; खुदा करे ये सवाल हमेशा आपके दिल में उठे ! ..खैर, ज़िक्र बेज़ारी का छिड़ा है, इसलिए बताना लाज़िमी है कि पूरे दिन मेरी कैसी हालत रही थी..। सुबह की पहली घड़ी से ही मैं एक अंजान उदासी के बोझ से दबा था..। जैसे अचानक ऐहसास हुआ हो कि इस पूरी कायनात में मैं अकेला हूं..हर कोई मुझे छोड़ रहा है..मुझ से दूर जा रहा है..। ज़रुर..आपको ये पूछने का हक है कि ये ‘हर कोई’ कौन था..। यूनिवर्सिटी की पूरी पढ़ाई के दौरान समरहिल में ही रहा था, लेकिन शायद ही कोई ऐसा रहा हो जिसे दोस्त कह सकूं..। लेकिन मुझे दोस्तों की दरकार भी क्या थी..? पूरा समरहिल मेरा था..। इसलिए जब सर्दियों की छुट्टियों में सभी अपने-अपने बैग बांधने लगे तो मुझे लगा जैसे वो मुझे ही छोड़कर जा रहे हों..। अकेलापन मुझे सताने लगा..। तीन दिनों तक बेसबब विचरता रहा..। नहीं जानता था, अपना क्या करूं ? दुनिया का वो सबसे शांत रेलवे स्टेशन हो, बर्फ से सफेद हुई सड़क या फिर जंगलों की पगडंडियां..आंखें एक अदद ऐसे चेहरे के लिए तरस रही थीं..जिन्हें उन्होंने देखा हो..। वो मुझे नहीं जानते थे, लेकिन मेरा उनसे गहरा नाता था..। किताबों से ज़्यादा मैंने उन्हें पढ़ा था..। वो चेहरे खिलखिलाते तो मेरा दिन अच्छा गुज़रता..वो उदास नज़र आते तो मेरा दिल भी मुरझा जाता..। लंबी दाढ़ी वाले एक अंकल से तो ख़ास रिश्ता था मेरा..। शाम के धुंधलके में जब समरहिल चौक पर बसों से सिर्फ गर्ल्स होस्टल की तरफ़ भागती लड़कियां निकलतीं..वो रोज़ डाकखाने की सीढ़ियों पर बैठे मिलते..। बाएं हाथ में सिगरेट थामे, हर वक्त कुछ बुदबुदाते रहते..। उनके दाहिने हाथ में शोभा सोने के हत्थे वाली एक लाठी बढ़ाती रहती..। शायद मेरा वहम हो..लेकिन मुझे लगा करता कि वो भी मेरी मौजूदगी तलाशते हैं..। भरोसे के साथ कह सकता हूं, कभी शाम को मुझे चौक पर न पाना उन्हें भी खटकता रहा होगा..। कभी अच्छे मूड में हमारे बीच मुस्कुराहटों की अदला-बदली भी हो जाती..। मैं समरहिल के घरों से भी अच्छी तरह वाकिफ था..। सुबह-सवेरे यूनिवर्सिटी जाते वक्त उनके बीच बने संकरे रास्तों से गुज़रता तो ऐसा लगता वो आगे बढ़कर कह रहे हों- ‘गुड मॉर्निंग ! कैसे हो, मैं ठीक हूं..अगली गर्मियों में मेरा एक माला बढ़ने वाला है..।‘ या फिर- ‘कैसे हो ? पता है..कल मुझे दोबारा सजाया जाने वाला है..।‘ उन घरों में कुछ मेरे फेवरेट थे, कुछ मेरे पसंदीदा दोस्त उनमें से एक का इलाज आर्किटेक्ट कर रहा था..। जब भी पास से गुज़रता तो उसका हालचाल पूछता जाता..। लेकिन मेरे पड़ोस में बनी उस गुलाबी “हट” पर जो गुज़री वो अब तक याद है..। चौकोर पत्थरों से बनी ये हट अंग्रेज़ों की निशानी थी..। उसे देखते ही मेरा चेहरा खिल उठता..। फिर एक दिन अचानक अभी घर से निकला ही था कि उसकी शिकायत सुनी- ‘वो मुझे पीले रंग में रंगने वाले हैं..। शैतान, ज़ालिम ! ’
उस दिन के बाद से मैंने यूनिवर्सिटी जाने का रास्ता ही बदल लिया..।
तो प्रिय पाठको, अब आप समझ सकते हैं, शिमला के पहाड़ पर बने उस समरहिल से मेरा क्या नाता था..।
मैं पहले ही बता चुका हूं कि उन तीन दिनों में मुझपर घनघोर उदासी के बादल छाए थे..। न तो मुझे रास्ते सुकून दे रहे थे..न ही मेरा आशियाना..। मुझे याद है पहली दो शामों तक मैं अपने भीतर के खालीपन को कमरे की दीवारों में खोजता रहा..। ‘आखिर मैं इतना बैचेन क्यों हूं ?’ मेरी नज़रों ने ग़मगीन हरी दीवारों से पूछा, मकड़ी के जालों से सजे मेरे छत से तकरीर की..। मेरी चेतना ने घर के फर्नीचर को खंगाला..एक एक कुर्सी का निरीक्षण किया..। क्या मेरी दिक्कत उनमें कहीं छिपी थी ? खिड़की के बाहर गिरती बर्फ को घंटों निहारा लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ..। इसी हालत में मैंने केयरटेकर के नौकर को भी बुलवा भेजा..उससे मकड़ी के जालों की शिकायत की..। वो हैरानी से मेरा मुंह तकता रहा..और एक शब्द बोले बगैर चला गया..। मकड़ी का जाला शायद आज भी उस छत से टंगा होगा..!
आखिरकार वजह पता चल ही गई..। अरे! वो सभी मुझे छोड़कर घरों को जा रहे हैं..। मेरे उद्गगारों के बचकानेपन के लिए माफ़ करें..लेकिन मैं परिष्कृत भाषा के इस्तेमाल के मूड में हूं भी नहीं..। आखिर पूरा का पूरा समरहिल या तो छुट्टियां मनाने रुख़सत हो चुका था..या फिर होने वाला था..। पीछे छूटे साथियों को हाथ हिलाते हुए विदा होता हर एक स्टूडेंट मेरे लिए अचानक अपने परिवार का प्यारा बेटा था..कोई आंगन जिसकी बाट जोह रहा था..। शाम ढलते ही वहां के लोकल दुकानदार भी जब दुकान के तख्ते लगाते तो एक ऐंठन से भरे होते; मानो कह रहे हों- ‘प्यारे ! फिलहाल हमीं से काम चलाओ और हम भी दो घंटों में घरों की ओर रवाना होने वाले हैं..।‘ ऐसा लग रहा था मानो समरहिल पर हमेशा के लिए वीरान होने का ख़तरा मंडरा रहा था..। मैं उदास था क्योंकि मैं कहीं नहीं जा रहा था..।
(क्यों, इसका मौजूं जानने के लिए एक अलग कहानी की ज़रुरत होगी..। ) मैं कंधे पर बैग उठाए किसी भी छात्र के साथ जाने को तैयार था..। लेकिन कोई मुझे न्योता देने को तैयार नहीं था..। ऐसा लगता था सभी मुझे भुला बैठे थे..। खाली वक्त काटने के लिए मैंने शाम के साथ सुबह की सैर भी शुरू की..। हमेशा की तरह चलते-चलते पता ही नहीं चलता कब बालूगंज तक पहुंच जाता..। कभी –कभी दूसरी तरफ़ निकलता तो वन-विहार के जंगलों में मन हल्का महसूस होता..। उन रास्तों से गुज़रने वाले इक्का-दुक्का लोग..ऐसी दोस्ताना नज़र से देखते जैसे मेरा अभिवादन कर रहे हों..। ज़्यादातर तो दिन के वक्त भी शराब में धुत्त होते..। उन्हें झूमते देखकर मैं भी आह्लालादित होता..। ऐसा लगता मानो वक्त का पहिया पीछे घूम गया है..और मैं पचास साल पुराने समरहिल में पहुंच गया हूं..। समरहिल के कुदरती नज़ारों, वहां की ऊर्जा में कुछ ऐसा है जो रूह को छूता है..। वसंत के मौसम में झूमता, पतझड़ में किसी पत्ते की तरह टूट कर रह जाता..। आज भी उसे अपनी प्रेमिका से कम नहीं मानता ; भोली सी, घबराई सी..जिसे देखकर कभी आपका दिल पिघल जाता है..कभी आप उसे हमदर्दी की नज़र से देखते हैं..और कभी यूं ही नज़रअंदाज़ भी कर देते हैं..। लेकिन फिर कभी अचानक वो जाने किस संयोग से दुनिया की सबसे अज़ीम हसीना में तब्दील हो जाती है..। आप ये सवाल पूछे बिना नहीं रह पाते कि आखिर वो कौन से हाथ हैं जिन्होंने इन उदास आंखों में ये आग भरी है..? इन रुख़सारों में ये लाली भरने वाला वो कलाकार कौन है ? इस चमकती हंसी को ज़िंदगी किसने बख्शी है..? आर इर्द-गिर्द देखते हैं, किसी को ढूंढते हैं, अंदाज़ा लगाते हैं..। लेकिन लम्हा बीत जाता है और अगले दिन आप फिर उसी उदासी के रुबरु होते हैं..। आप इस मलाल में करवटें बदलते हैं कि आखिर ये रंग इतनी जल्द फीके क्यों पड़े.? वो हुस्न दोबारा क्यों नहीं लौटेगा ? वो इस दिलफरेबी से क्यों आया कि आपको इश्क करने का वक्त तक नहीं मिला ?
लेकिन फिर भी वो रात मेरे दिन से बेहतर थी..। वजह बताने जा रहा हूं..।
उस रात मैं चौक पर देर तक रहा..। करीब दस बजे का वक्त था और मैं अपने ivy cottage की ओर लौट रहा था..। मेरा रास्ता रेलवे ट्रैक के साथ गुज़रता था..। वहां आमतौर पर आठ बजे के बाद सड़कें वीरान नज़र आती थीं..। मैं समरहिल के एकांत हिस्से में रहता था..। पहले गुनगुनाते हुए आगे बढ़ रहा था, फिर माउथ ऑर्गन निकाल लिया..। ये ऐसी खुशनसीबी थी, जो सिर्फ उन्हीं रास्तों के साथ बांटी जा सकती थी..। तभी मेरे साथ कुछ अप्रत्याशित हुआ..। रेलवे स्टेशन के ठीक ऊपर बने पैराफीट पर एक लड़की बैठी थी..। शायद सामने पहाड़ की चोटियों पर आराम कर रहे बादलों को निहार रही थी..। चमकीला सफेद सूट, लोहे के रंग का ओवरकोट, मंद-मंद हवा में उड़तीं रेशमी ज़ुल्फें..। ‘वो लड़की है, इतना तो तय है, सांवली है शायद..।’ मैंने सोचा..। ऐसा लग रहा था कि मेरे कदमों का चाप उसके कानों में नहीं पड़ रही थी..। वो हिली तक नहीं जब मैं सांसों और ज़ोर धड़कते दिल को संभालते हुए उसके पीछे से गुज़रा..।
‘अजीब बात है..।’ मैंने सोचा..। ‘ऐसी क्या चीज़ है जिसमें ये इस कदर खोई है..।’ फिर अचानक मैं ऐसे थम गया मानो सांप सूंघ गया हो..। मैंने एक दबी हुई सिसकी सुनी.। हां! मुझे धोखा नहीं हुआ था..। वो लड़की रो रही थी..। मिनट भर बाद एक के बाद एक सिसकियां सुनाई देने लगीं..। हे भगवान ! मेरा दिल बैठने लगा..। यूं भी हमेशा से लड़कियों के मामले में नौसीखिया रहा था..और ये तो ऐसा लम्हा था...
मैं मुड़ा, एक कदम उसकी ओर बढ़ाया..। शायद, ‘मैडम’ कहकर ही पुकारा होता लेकिन फिर ख्याल आया कि अनगिनत रोमांटिक नॉवलों में प्रेमी प्रेमिका को सबसे पहले यही कहकर पुकारता है..। खैर, अभी वो पहला शब्द तलाश ही रहा था कि लड़की होश में आई,आसपास देखा, आंखें झुकाईं तेज़ कदमों से मेरे आगे चलने लगी..। मैं भी एक दूरी पर उसकी रफ्तार से रफ्तार मिलाकर चलने लगा..लेकिन शायद उसने भांप लिया..। उसने सड़क पार की..गेट क्रॉस किया और रेलवे ट्रैक के साथ-साथ चलने लगी..। इसके बाद उसके पीछे जाने की मेरी हिम्मत नहीं हुई..। मेरा दिल पिंजरे में बंद पंछी की तरह फड़फड़ा रहा था..। लेकिन तभी किस्मत ने नायाब मौका दिया..। रेलवे ट्रैक पर बनी एक छोटी सी सुरंग से एक शख्स निकला..। उम्र इतनी रही होगी जो मर्यादा की सीमा के भीतर रखे..लेकिन हरकतें मर्यादित नहीं थीं उसकी..। उसके कदम लड़खड़ा रहे थे और बार-बार वो दीवार का सहारा ले रहा था..। लड़की ने पीछे मुड़कर देखा और तीर की सी तेज़ी से दौड़ पड़ी..। ये वो डरपोक जल्दबाज़ी थी जो आपको उन लड़कियों में नज़र आएगी..जिन्हें रात को घर छोड़ने वाले साथी की चाह नहीं होती..। वो रहस्यमयी शख्स शायद उसका पीछा भी नहीं करता और उस रात मेरी किस्मत अच्छी न रही होती..।
अचानक बिना एक शब्द कहे..वो शख्स पुरज़ोर तेज़ी से लड़की की तरफ़ भागा..। वो हवा की तरह भाग रही थी..लेकिन लड़खड़ाते हुए भी उस शख्स ने लड़की को ओवरटेक करने में वक्त नहीं लगाया..। लड़की चीख पड़ी और मैं...मैंने हाथ में मौजूद देवदार की लकड़ी से बनी लाठी के लिए किस्मत को शुक्रिया कहा..। एक छलांग के साथ मैं रेलवे ट्रैक पर था..। पलक झपकते ही वो अजनबी दुश्मन बगैर कुछ बोले झाड़ियों के बीच कूद गया था..। करीब पांच सौ मीटर दूर जाकर उसकी आवाज़ हल्की की कानों में पड़ी..लेकिन वो क्या कह रहा था- ये हम दोनों की समझ से बाहर था..।
‘अपना हाथ मेरे हाथों में दे दो..।’ मैं लड़की से बोला..। ‘वो दोबारा नहीं आएगा..।’
उसने खामोशी से अपना हाथ मेरे हाथों में दे दिया..। वो अब भी कांप रही थी..। आह ! ओ रहस्यमयी अजनबी ! तुम मेरे लिए फरिश्ता बनकर आए थे..!
मैंने नज़रें चुराकर उसे देखा, वो दिलकश थी, और सांवली भी थी, मेरा अंदाज़ा सही था..। उसकी कजरारी भौंहों पर टिका आंसू चमक रहा था..। ये उसके इस डर का नतीजा था या पहले के दुख का ; ये तो पता नहीं लेकिन उसके होंठों पर अब मुस्कान की एक रेखा भी थी..। उसने भी कनखियों से मुझे देखा, हल्के से शरमाई और उसकी नज़रें झुक गईं..।
‘देखा, तुम मेरी वजह से रेलवे ट्रैक के रास्ते पर गईं, अगर हम साथ-साथ चलते तो ऐसा नहीं होता..।’
‘लेकिन मैं तुम्हें नहीं जानती थी , मुझे लगा तुम भी.. ’
‘अच्छा ? तो अब तुम मुझे जानती हो ?’
‘कुछ-कुछ’
‘कैसे ?’
‘जैसे कि मैं जानती हूं तुम क्यों कांप रहे हो..।’
‘ओह, हां ! तुम सही हो..।’ मैंने उत्तर दिया..। मानना पड़ा कि उसमें अक्ल तो है..। खूबसूरती के साथ इंसानों को पढ़ सकने वाली समझदारी विरले ही देखने को मिलती है...।
‘हां, तुमने मुझे वाकई पहली नज़र में पढ़ लिया..। लड़कियों के सामने बचपन से झिझकता हूं..। सच पूछो तो मेरी हालत इस वक्त वैसी ही है जैसी उस आदमी के सामने कुछ मिनट पहले तुम्हारी थी..। क्या तुम्हे ये सपने की तरह नहीं लग रहा..ऐसा लग रहा है जैसे किसी नॉवल का सीन चल रहा है..। ’
वो मुस्कुराई, शायद मेरी बात से उसे आपे में लौटने में मदद मिली थी..।.
‘हां, अगर मेरे हाथ कांप रहे हैं तो इसलिए क्योंकि इन्होंने कभी इतने खूबसूरत हाथों को नहीं छुआ है..।’ तुम कह सकती हो अब तक दुनिया की ‘आधी आबादी’ से अजनबी ही रहा हूं..। उनसे कितनी सही बात कर पाता हूं..इस पर भी शक होता है..। कहीं ऐसा तो नहीं है कि तुमसे भी बेवकूफाना बात कह रहा हूं..। अगर ऐसा है तो कह सकती हो, मुझे बुरा मानने की आदत नहीं है..।‘
‘नहीं तुम अच्छी बातें कर रहे हो..। लड़कियों को शरीफ़ लड़के अच्छे लगते हैं..। क्या तुम मुझे घरतक नहीं छोड़ोगे..।’
‘तुम मुझसे मेरी शराफत छुड़वाओगी और मेरा रहा-सहा चान्स भी जाएगा..।’
‘चान्स, कैसा चान्स ?’ एकाएक रुककर उसने पूछा ; उसकी भवें तनी हुई थीं..।
‘माफ करना, ज़ुबान फिसल गई लेकिन रात का ये वक्त..खामोशी..ये मौसम और एक खूबसूरत लड़की..। तुम कैसे उम्मीद कर सकती हो, ख्वाहिश न जगे..। ’
‘प्यार की ख्वाहिश..? ’ इन लफ्जों के साथ उसकी बड़ी-बड़ी आंखों में शरारत था या हिकारत..समझ नहीं पाया..।
‘हां, नहीं...मेरा मतलब...’ ज़रा समझने की कोशिश करो..। पच्चीस का हूं, अब तक किसी लड़की ने नहीं छुआ..। इसलिए अच्छा बोलना नहीं जानता..। इसलिए दिल खोलकर कहा ताकि तुम समझ सको..। जब दिल बोल रहा हो तो ज़ुबां कैसे खामोश रहे, ये नहीं जानता..। खैर छोड़ो, लेकिन ये तो सच है कि हमसफर को अब तक सिर्फ सपनों में देखा है..।‘
‘अच्छा, किसे, कैसे ?’
‘नहीं, वो इस दुनिया की नहीं हो सकती, उसका बसना सिर्फ मेरे सपनों में है...। तुम हंसोगी अगर मैं तुम्हे ये बताऊं कि कई बार राह चलते अजनबी खूबसूरत लड़की से बात करने को जी करता है..। ज़ाहिर है तब जब वो अकेली हो..। अदब से, जुनून के साथ या फिर शायराना अंदाज़ में...मन करता है उसे अपनी तन्हाई का हाल बयां करूं..उससे कहूं कि मुझ जैसे बदनसीब की फरियाद को सुनना उस जैसी हर हसीना का फ़र्ज़ है..। सच कह रहा हूं, मैं बस इतना ही चाहता हूं वो मुझसे दो लफ्ज़ हमदर्दी के कहे..पहली नज़र में ही मुझे नकारे ना, चाहे तो मुझ पर हंसे लेकिन मेरी बातों पर यकीन करे..। फिर चाहे हम दोबारा कभी न भी मिलें..मैं देख रहा हूं कि तुम भी हंस रही हो..इसीलिए तो तुम्हे सुना रहा हूं.... ’
‘ऐसी बात नहीं है; मैं सिर्फ इसलिए हंस रही हूं क्योंकि तुम अपने दुश्मन खुद हो..। अगर कभी ये हिम्मत जुटा पाते तो नाकाम नहीं होते..। दिल रखने वाली किसी लड़की ने तुम्हे निराश नहीं लौटाती जबतक या तो वो पागल नहीं होती या फिर उस वक्त किसी बात को लेकर बेहद नाराज़..। लेकिन ये मैं क्या कह रही हूं ? लोग तुम्हे पागल कहते! मैं शायद अपनी बात कह रही थी..। मैं लोगों को पहचान सकती हूं..।‘
‘शुक्रिया ! तुम नहीं जानती ज़िंदगी में पहली बार किसी लड़की ने मुझसे ये कहा है..। तुम्हे खुद नहीं पता इस वक्त तुमने मेरे लिए क्या किया है..।‘
‘चलो अच्छी बात है..। लेकिन मुझे ये बताओ तुमने मेरी मदद क्यों की ?’
‘मैंने तुम्हारी मदद क्यों की? ...तुम अकेली थीं..वो अजनबी नशे में धुत्त था..और रात के ये वक्त..। तुम्हे मानना पड़ेगा कि ये मेरा फ़र्ज़ था..’
‘नहीं बाबा, मेरा मतलब इससे पहले से था..।‘
‘इससे पहले ? इसका जवाब तो मेरे पास नहीं है; शायद डरता हूं...’ तुम्हे पता है आज दिनभर खुश रहा हूं..। गुनगुनाती धूप में गुनगुनाते हुए सेरी गांव तक पहाड़ उतरा..। एक अरसे के बाद खुशी की किरण ने छुआ..। तुम...शायद मेरे मन का वहम ही रहा होगा; आई एम सॉरी, अगर मैंने ये सोचा लेकिन मुझे लगा तुम रो रही हो, और मैं...मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ..। मेरे भगवान ! क्या इसमें भी कुछ ग़लत था ? ट
‘अच्छा, चलो छोड़ो, इस बारे में बात नहीं करेंगे,’ झुकी नज़रों से लड़की ने जवाब दिया..। ‘मुझे पूछना ही नहीं चाहिए था; लेकिन इस बात की खुशी है तुम्हें पहचानने में गलत नहीं थी...लेकिन ये रहा मेरा घर, इस मोड़ से दो कदम आगे...बॉय और हां, थैंक्स !...’
‘ओह! अच्छा, गुडनाइट !’ इतना कहकर मैं मुड़ा लेकिन पलटते-पलटते फिर रुक गया..’क्या हम दोबारा मिलेंगे ? क्या ये सपना यहीं खत्म हुआ ? ’
‘देखो, अभी कुछ देर पहले तुम सिर्फ हमदर्दी के दो लफ्ज़ चाहते थे और अब...लेकिन मेरे पास इस सवाल का जवाब नहीं है...शायद हम फिर मिलें...’
‘मैं यहां कल आऊंगा..।’ मैंने कहा..। ‘सॉरी, देखो मैं फिर हद लांघने लगा..।
‘हां, सब्र तो तुममें नहीं है.. ’
‘सुनो !’ मैंने बीच में टोका..। ‘मुझे नहीं पता मैं क्यों ये कह रहा हूं, लेकिन मुझे लगता है तुम कल मुझे यहां ज़रुर पाओगी..। मेरी ज़िंदगी सिर्फ सपनों में बीती है..अभी जैसे लम्हे इतने कम देखे हैं कि ख्वाबों में इन्हें दोबारा जिए बगैर कैसे रह सकूंगा..। पूरी रात, पूरा हफ्ता, पूरा साल..मैं तुम्हें सपनों में देखूंगा..। कल ठीक इसी वक्त, इसी जगह आऊंगा और इस लम्हे को यादकर खुश होऊंगा..। समरहिल में मेरी पसंदीदा जगहों में अब ये मोड़ भी शामिल हो गया है..। तुम्हारी तरह मैंने भी यादों के लिए ढेर सारे आंसू बहाए हैं..। शायद तुम अभी दस मिनट पहले भी किसी याद की वजह से ही उदास थी ..। माफ़ करना, मैं फिर खुद को भूल गया था..। ’
‘अच्छी बात है..।’ लड़की बोली..। ‘शायद मैं भी कल यहां आऊं, दस बजे..। दिल कहता है तुम्हें इनकार नहीं कर पाऊंगी..। हकीकत तो ये है कि कल मुझे यहां होना ही है..। ऐसा मत सोचना ये कोई अप्वॉइंटमेंट है..। पहले ही बता रही हूं कि कल मुझे अपनी वजह से इसी सड़क पर आना है..। लेकिन...साफ़ कहना बेहतर है...अगर तुम भी मुझे मिलो तो कोई हर्ज़ नहीं..। हालांकि आज जैसा हादसा कल भी हो सकता है, लेकिन उसकी फिक्र छोड़ो...कुल मिलाकर तुमसे दोबारा मिलकर भी खुशी होगी...लेकिन मेरे बारे में ऐसा-वैसा मत सोचना...मुझे ऐसे किसी से मिलने की आदत नहीं है...लेकिन चलो ये राज़ रहा..लेकिन फिर भी एक शर्त है... ’
‘अच्छा ऐसी क्या शर्त है, बताओ..। मेरा दिल बल्लियों उछल रहा था..। ’
‘तुम्हे आने के लिए सिर्फ इसलिए कह रही हूं क्योंकि तुम्हे जानती हूं..।’ लड़की ने हंसते हुए जवाब दिया..। ‘मैं तुम्हे अच्छी तरह जान चुकी हूं..लेकिन फिर भी पहली बात तो ये है कि हम तभी मिलेंगे अगर तुम भरोसा दिलाओ कि तुम मुझसे प्यार नहीं करोगे....पहले बता देना ही ठीक होता है, ऐसा होना नामुमकिन है...हम अच्छे दोस्त ज़रुर हो सकते हैं..लेकिन प्लीज़ तुम मुझसे प्यार नहीं करोगे... ’
‘वादा रहा..कसम है..’ खुशी के मारे बमुश्किल मैं इतना ही कह पाया..।
‘कसम मत खाओ, मुझे पता तुम निभा नहीं पाओगे..। मुझे ग़लत मत समझना..सच ये है मेरे पास भी ऐसा कोई नहीं जिससे अपना ग़म बांट सकूं..। दिलबर राह चलते नहीं मिलते..ये भी सच है, लेकिन तुम कुछ हटकर हो..ऐसा लगता है जैसे हम सालों से एक दूसरे को जानते हैं...मेरे भरोसे को झुठलाओगे नहीं तुम..झुठलाओगे क्या ? ’
‘देखो मेरे लिए तो मसला सिर्फ इतना है कि अगले चौबीस घंटे कैसे बीतेंगे..?’ बमुश्किल मेरी ज़ुबान से निकला..।
‘अच्छी नींद सोना..। गुडनाइट ! लेकिन याद रखना मैंने तुम पर भरोसा किया है..। तुम सपनों की दुनिया में जीते हो..इसीलिए तुम्हे कुछ बताना है..। ’
‘भगवान के लिए बताओ, क्या है..?’
‘इसे कल तक राज़ रहने दो..इसी में बेहतरी है..। शायद कल का दिन इस राज़ के खुलने के लिए तय हो..या शायद नहीं भी..। हम कल एक दूसरे को बेहतर जानने की कोशिश करेंगे..पकका..। ’
‘हां, ज़रुर..। लेकिन ये हो क्या रहा है..? ये जादू नहीं तो और क्या है..? मेरे भगवान मैं कहां हूं..! एक बात बताओ क्या तुम खुश नहीं हो कि तुमने मुझे पहली नज़र में नकारा नहीं..जैसा कि तुम्हारी जगह और कोई भी औरत होती तो करती..? चंद लम्हों में ही तुमने मुझे ज़िंदगी भर की खुशी दे दी है..। कौन जाने तुमने मेरी मुझ से दोस्ती करवा दी हो..मेरे भीतर कुलबुलाते सवालों का जवाब बनकर आई हो तुम..। तुम क्या जानती हो मेरे भीतर कैसे तूफान उठते हैं..फिर विलीन हो जाते हैं..। ’
‘अच्छा है, हम इनपर कल बात करेंगे..।’
‘तय रहा..।’
‘कल तक के लिए विदा..।’
और हम विदा हुए..। मैं सुबह तीन बजे तक अपने घर की सीढ़ियों पर बैठा रहा..। दहलीज़ लांघने के लिए खुद को मना नहीं सका..। मैं खुश था...कल !


क्रमश:

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