बुधवार, जनवरी 13, 2010

सफेद रातें



दूसरी रात
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‘तो आखिर तुम ज़िंदा हो..!‘ मेरे हाथों को दबाते हुए वो बोली..।
‘मैं पिछले दो घंटों से यहां हूं..। तुम नहीं समझ सकती पूरा दिन कैसे गुज़ारा है..।’
‘मैं जानती हूं, मैं जानती हूं..।’ लेकिन असल बात पर आते हैं..। तुम जानते हो मैं यहां क्यों आई हूं..? कल की तरह फिज़ूल की बातें करने तो नहीं..। हमें अब आगे अक्लमंद लोगों की तरह बर्ताव करना चाहिए..। कल रात मैं यही सोच रही थी..।‘
‘कैसे, हमें कैसे अक्लमंद होना चाहिए ? मैं अपनी तरफ़ से तैयार हूं; लेकिन मेरे लिए ये भी नॉन-सेन्स तो नहीं है..। ’
‘अच्छा ? पहली बात तो ये है मेरे हाथ इतने ज़ोर से मत दबाओ; दूसरी ये कि मैं दिन भर तुम्हारे बारे में सोचती रही..।’
‘अच्छा तो क्या सोचा तुमने ?’
‘वो छोड़ो..। कुल मिलाकर बात ये है कि हमें फिर से शुरुआत करनी होगी..। क्योंकि मैं इस नतीजे पर पहुंची कि मैं तुम्हें बिल्कुल नहीं जानती; पिछली रात जो मैंने कहा वो बचपना था, मैं तुम्हे इसका दोष नहीं दे रही, मैं ऐसी ही हूं..। शायद मैंने अपनी ज़रुरत से ज़्यादा तारीफ़ कर दी..। इसलिए आज अपनी ग़लती सुधारने के लिए मैं तुम्हारे बारे में सुनूंगी..। मुझे बताओ तुम कौन हो.. अपना पूरा इतिहास मुझे सुनाओ..। ’
‘मेरा इतिहास !’ मैं लगभग चिल्ला कर बोला..। ‘मेरा इतिहास ! लेकिन तुम्हे किसने बताया कि मेरा इतिहास भी है ? मुझे नहीं लगता ऐसा कुछ है...’
‘तो फिर तुम कैसे जिए हो..?’ उसने हंसकर टोका..।
‘बगैर किसी इतिहास के..। लोग कहते हैं मैं खुद में ही जीता हूं..बिल्कुल एकाकी..क्या तुम्हे पता है अकेले होने का क्या मतलब होता है..?’
‘लेकिन ऐसा कैसे हो सकता है ? तुम भी इसी दुनिया में रहते हो..!’
‘मैं ढेर सारे लोगों को जानता हूं लेकिन फिर भी अकेला हूं..’
‘क्या तुम किसी से बात नहीं करते ?’
‘सच पूछो तो किसी से भी नहीं..’
‘तो फिर तुम कैसे हो..?’ उसकी आंखों में शरीर हैरानी तैर रही थी..। ‘यानी तुम्हारे दादा भी रिटायर्ड प्रोफेसर हैं..जिन्हें अब कम दिखाई देता है, जो मुझे कभी कहीं नहीं जाने देते..। दो साल पहले पता नहीं कौन सी शरारत की थी, उसके बाद उन्हें लगा मैं बिगड़ रही हूं..। फिर क्या था..? उन्होंने हर वक्त मुझे साथ रखना शुरू कर दिया..। कभी-कभी तो हम कई दिन एक दूसरे की मौजूदगी में ही बिता देते हैं..। वो आग सेंकते हैं और मैं बगल में बैठती हूं, या तो उनके कपड़े सीती हूं या फिर उन्हें ज़ोर-ज़ोर से पढ़कर सुनाती हूं..। ’

‘ओह ! फिर तो तुम्हारी ज़िंदगी कठिन है लेकिन नहीं मेरे ऐसे कोई दादा नहीं हैं..।‘
‘अगर ऐसा नहीं है तो तुम घर में क्या करते रहते हो..?’
‘देखो ! क्या तुम वाकई जानना चाहती हो, मैं क्या हूं..?’
‘हां, हां !’
‘पक्का ?’
‘पक्का !’
‘ठीक है तो फिर सुनो, मैं ‘नमूना’ हूं..!’
‘नमूना! किस तरह का नमूना ? लड़की खिलखिलाते हुए बोली..। कुछ इस तरह जैसे साल भर से न हंसी हो..।
‘तुम सच में दिलचस्प हो..। आओ यहां बैठते हैं..। इस वक्त इधर से कौन गुज़रेगा..बैठो और मुझे अपना इतिहास सुनाओ..सबसे पहले तो ये कि तुम किस तरह के नमूने हो..?’

उसकी हंसी मुझ पर भी असर डाल रही थी..। ‘नमूना ऐसा जो वाहियात सही लेकिन ऑरिजिनल है..। एक अलग चरित्र..ह...म ! सपनों का सौदागर..क्या तुमने कभी जाना है, क्या होता है, सपनों का सौदागर ?’
‘किस लड़की को नहीं पता होता..यूं सपनों से मेरा भी नाता रहा है..। कभी-कभी मैं दादू के पास बैठी होती हूं..तो सभी तरह की बातें दिल में आती हैं..।
‘जैसे घोड़े पे बैठा वो राजकुमार..।’ हम दोनों एक सुर में बोले..।
‘कभी सपने देखना अच्छा होता है..लेकिन भगवान जाने..! लेकिन सपनों के अलावा भी ज़िंदगी होती है..।’
लड़की ने गंभीरता के साथ बात ख़त्म की..।
‘बहुत अच्छा ! अगर तुम्हे सपनों का वो राजकुमार मिल चुका है..तो शायद तुम मेरी बात को समझो..।’
‘लेकिन मेरी बात सुनो! मुझे तुम्हारा नाम तो अब तक नहीं पता..।
‘आखिरकार तुम्हे याद आ ही गया..!’’
‘ओह ! मेरे दिमाग में ही नहीं आया..।’
‘मेरा नाम निंफिया है..।
‘निंफिया, बस इतना ही..?’
‘क्यों, क्या इतना काफी नहीं है..?’
‘काफी नहीं है ? बल्कि मैं भी ऐसा ही हूं..। निफिया... मेरे लिए इतना ही काफी है..।’
‘हां, तो निंफिया जी, अब मरी कहानी.’
मैं उसके बगल में बैठ गया, उसके चेहरे पर गंभीर भाव था, मैंने कुछ ऐसे शुरू किया..जैसे किताब बांचते हैं:
‘पता नहीं निंफिया तुम जानती हो या नहीं..लेकिन समरहिल बल्कि पूरे शिमला के कई अनोखे कोने हैं..। देखने में ऐसा लगता है कि पूरे शहर पर एक ही सूरज उगता है..लेकिन फिर भी लोग इन कोनों में झांककर नहीं देखते..। निंफिंया इन कोनों का अपना अलग सच है..। हमारे दिन, हमारी रातों से बिल्कुल अलग..। वहां ज़िंदगी ज़ालिम है तो खिलंदड़ भी..। यूं भी क्या ज़िंदगी खालिस ख्वाबों, आसमानी आदर्शों और साधारण, बेस्वाद हकीकतों का ही तो मेल है..कभी-कभी तो अश्लील भी.’
‘बाप रे ! क्या भूमिका है ! अब असल कहानी ? ’
‘सुनो निंफिंया..(ऐसा लगता है ये नाम ज़िंदगी भर भी पुकारता रहूं तो मन नहीं भरेगा..।) मैं कह रहा था इन कोनों में एक अजीब प्रजाति के लोग रहते हैं..ड्रीमर्स..सपनों का सौदागर..तुम कह सकती हो..। लेकिन अगर तुम्हे इस प्रजाति की सटीक परिभाषा चाहिए तो जान लो सपनों का सौदागर पूरी तरह इंसान नहीं होता..। ज़्यादातर वक्त वो ऐसी खोह में रहते हैं जिससे आम दुनिया का कोई वास्ता नहीं रहता..। मानो दिन की रोशनी से उन्हें चुभन होती हो..। अपने इसी हिस्से में सपनों के सौदागर जोंक की तरह बढ़ते रहते हैं..। वैसे दूसरी बातों में वो एक ऐसे जानवर की तरह होता है..जो जानवर होने के साथ एक ‘घर’ भी होता है..। एक बार यहां के चिड़ियाघर में एक कछुआ देखा था..। तुम्हे क्या लगता है, सपनों के सौदागर को वो हरी, उदास चारदीवारी क्यों पसंद है..? ऐसा क्यों है कि जब उसके घर उसके चुनिंदा दोस्तों में से कोई आता है तो वो शर्मिंदा, खामोश और कहीं गुम नज़र आता है..? मानो अभी इसी चारदीवारी के भीतर उसने अभी-अभी कोई गुनाह किया हो ; जैसे अभी वो लूट के पैसे गिनते हुए पकड़ा गया हो..? आखिर क्यों, तुम्ही मुझे बताओ, निंफिंया आखिर क्यों ऐसा है कि दो दोस्तों के बीच में बातचीत आसान नहीं होती..? उनके बीच वो हंसी नहीं होती ? समरहिल चौक पर फर्स्ट ईयर के स्टूडेंट के मुंह से तुम जिंदादिली भरी बातें क्यों कभी नहीं सुनती हो..? भले ही वो यूं हंसमुख हो..? और वो दोस्त जो उस ‘ड्रीमर’ के घर शायद पहली और आखिरी बार आया था- उसकी ज़ुबान भी बंधी-बंधी सी क्यों रहती है ? वो अपने मेज़बान के मुरझाए हुए चेहरे को देखता है, मेज़बान बेचारा सोसाइटी, राजनीति, लड़कियां..सभी तरह के मसलों में मेहमान को बांधने की कोशिश करता रहता है..लेकिन मेज़बान की हालत कुछ ऐसी ही होती है..जैसे बिन पानी मछली को ग़लती से फर्श पर छोड़ दिया गया हो..। ऐसा क्यों होता है कि उस मेहमान को हर बार अचानक कोई ज़रुरी काम याद आ जाता है..। वो अपने मेज़बान का गर्मजोशी भरा हाथ छुड़ाकर..दरवाज़े से यूं निकलता है कि फिर पलटकर भी नहीं देखता..? जाते-जाते वो हमेशा यही क्यों सोच रहा होता है कि है तो ये अच्छा बंदा लेकिन फिर भी जाते-जाते उसके ज़ेहन में अपने मेज़बान के वो भाव कौंधते हैं..जो उसे एक गांव के बच्चों के हाथों पकड़े गए एक मेमने की याद दिलाते हैं..। ऐसा मेमना, एक अंजान खौफ़ जिसकी आंखों से टपकता हो..जी-भरकर सताए जाने के बाद जिसने एक अंधेरे कोने में शरण ली हो..और वहां वो अपने खुरों से चेहरे के ज़ख्म पोंछने के बाद इस दुनिया, इस कायनात पर गुस्सा निकाल रहा हो..।

‘सुनो..।’ अब तक पूरे ध्यान से मुझे सुन रही निंफिंया ने बीच में ही टोका..। ‘मुझे नहीं पता तुम्हारे साथ क्या हुआ या फिर तुम ये अजीब सवाल मुझसे क्यों पूछ रहे हो; क्या ये सब कुछ तुम्हारे साथ हुआ है..?’
‘इसमें कोई शक महसूस होता है तुम्हे ? ’ गंभीर भाव से मैंने उत्तर दिया..।
‘बस यूं ही पक्का करना चाहती थी, वैसे कहानी के क्लाइमैक्स में मेरी ज़्यादा दिलचस्पी है, तुम कहो..।’
‘क्या तुम जानना चाहोगी कि इस कहानी के होरी, यानी मैंने अपने उस कोने में क्या किया ? तुम जानना चाहती हो मैंने आपा क्यों खोया और क्यों मैं अपने एक दोस्त के आने से दिन भर परेशान रहा ? तुम नहीं जानोगी, क्यों मैं अपने मेहमान की खातिरदारी तक नहीं कर पाया ? क्यों मैं अपनी ही मेज़बानी के ऐहसास से दबा रहा..?’
‘हां, ज़रुर जानना चाहूंगी..। तुम बहुत अच्छी बातें करते हो..लेकिन क्या तुम इसे थोड़ा आम इंसान की भाषा में नहीं सुना सकते..। तुम ऐसे बात कर रहे हो, जैसे कोई नॉवल पढ़कर सुना रहे हों..’
‘निंफिंया..।’ अपनी आवाज़ की मर्यादा को हंसी में बहने से बमुश्किल रोक पाया..। ‘प्यारी निंफिंया, मैं जानता हूं कि मैं अच्छी बात कर सकता हूं.। लेकिन माफ करना, मुझे बात कहने का दूसरा तरीका नहीं आता..। इस वक्त मेरी हालत उस जिन्न जैसी है जो हज़ारों साल चिराग में घुटने के बाद बाहर निकल पाया हो..। ऐसा लगता है निंफिंया मानो सदियों से किसी को खोज रहा था और उसका मिलना इन सीढ़ियों पर बदा था..। इन्हीं सीढ़ियों पर ज़ज़्बातों के इस लावे को फूटना था..। अल्फाज़ों की इस नदी को बहने दो, निंफिंया..वरना मेरा दम घुट जाएगा..। या तो चुपचाप सुनो या फिर मैं चुप हो जाता हूं..।
‘नहीं, प्लीज़ नहीं! मैं चुपचाप सुनूंगी..। ’
‘तो फिर ठीक है..। हर रोज़ मेरे चौबीस घंटों में से एक घंटा मेरा ख़ास दोस्त है..। ये वो घंटा है जब सभी काम धंधे, कारोबार बंद हो चुके होते हैं, हर कोई रात के खाने के लिए घर भाग रहा होता है, लोग अपने परिवार के साथ दिन भर के खट्टे-मीठे लम्हे बांटना चाहते हैं..।’ इस लम्हे में हमारा हीरो- (फर्स्ट पर्सन में इस कहानी को सुनाने में झिझक न हो, इसलिए खुद को ‘हीरो’ कहने की हिमाकत कर रहा हूं..।) तो हमारा हीरो भी उस घंटे में मशरूफ़ था, दुनिया की रफ्तार से रफ्तार मिलाने की कोशिश कर रहा था..। तभी खुशी की एक बिजली उसके मुरझाए चेहरे पर कौंधी..। समरहिल के ठंडे आसमान में चमक रहे शाम के सिंदूरी आसमान को ठहरी नज़र से देखा- शायद ये कहना कि उसने देखा, झूठ होगा..। उसकी नज़र बिना भान के सिर्फ वहां ठहरी, ऐसे जैसे मानो उसके भीतर उससे भी दिलचस्प कुछ चल रहा हो..। वैसे वो खुश था क्योंकि अगले दिन उसे एक ऐसे काम से निजात मिलने वाली थी जो उसे कतई पसंद नहीं था..। ज़रा उसे देखने की कोशिश करो निंफिंया वो उसी तरह शोख़ नज़र आ रहा है..जैसे किसी बोरिंग क्लास के बाद स्कूल के बच्चे रिसेस के लिए ग्राउंड की तरफ़ भागते हैं..। ज़रा गौर करो हमारा हीरो कुछ सोच रहा है...क्या डिनर के बारे में ? या फिर इस सिंदूरी शाम के मार्फत..? क्या वो बसों से उतरते लड़कियों के झुंडों को इस गौर से निहार रहा है ? नहीं निंफिंया लेकिन ये सब बातें अब उसके लिए भला क्या मायने रखती हैं..? वो अब एक शहज़ादा है..। ये बेवजह नहीं है कि शाम का सूरज उसे मुस्कुराकर विदाई दे रहा था..। इस वक्त उसे उस रास्ते की भी ख़बर नहीं है..जिसकी सीढ़ियों तक की गिनती उसे याद है..। उसे इस वक्त रोकने की कोशिश करो, उससे अचानक जाकर पूछो वो कहां खड़ा- शायद वो कुछ न बता पाए..। लेकिन फ़ज़ीहत छिपाने के लिए हो सकता है कोई झूठ भले ही गढ़ दे..। देखो वो लगभग चिल्ला पड़ता है जब एक औरत बेहद अदब से उसे रोककर रास्ता पूछती है..। झेंपने के बावजूद वो चला जा रहा है..। इस बात से बेपरवाह कि रास्ते से गुज़रते लोग उसे देखकर हंस रहे हैं..मुड़-मुड़कर उसे देख रहे हैं..। रात के खाने के बाद कमरे में किताब हाथ में थामने के बाद ही हमारा हीरो अपने आपे में पहुंचता है..। बगल से सिगरेट उठाकर हाथों में थामता है तभी हैरानी से याद करता है अरे ! पता भी नहीं चला और उसने तो डिनर भी कर लिया..। अंधेरा अब कमरे के भीतर भी फैल चुका है; उसकी आत्मा सिर्फ उदास खालीपन से भरी है; कितने ही ख्यालों के बादल सामने से तैरकर गुज़र जाते हैं लेकिन वो बस निहारे जा रहा है..। एक अबूझ सी सिहरन उसके दिल को छूकर ये कैसा दर्द दे रही है ? एक नई ख्वाहिश गुदगुदा रही है और मन न जाने किस आसमान की तरफ़ उड़े जा रहा है..। कमरे में फैले स्थिर मौन के आकाश में उसकी कल्पना अकेलेपन के पंख तौल रही है..। उसने अभी दो पन्ने भी नहीं पलटे हैं कि अचानक किताब हमारे हीरो के हाथ से छूट जाती है..। उसकी कल्पना फिर कुलांचे भरती नई सरहदों के पार कदम रखने लगती है..। एक नया सपना, एक नई खुशी..! मीठे ज़हर का एक और डोज़ ! हमारे हीरो की नज़र में असल ज़िंदगी क्या है, निंफिंया..? उसके धुंधले नज़रिए के मुताबिक हम भटके हुए मुसाफिर हैं, जिंदगी से थके हुए, खुदाई से नाराज़..। और देखो, सरसरी तौर पर देखा जाए तो हमारे बीच में भी सबकुछ कितना औपचारिक है.. कितना ठंडा ! हमारे हीरो की नज़र में ये हमारी ग़रीबी है..। लेकिन उस बेचारे की भी क्या ग़लती है..? ज़रा देखो तो जादुई ख्याल, मखमली ऐहसास, इंद्रधनुषी सपने उसे कैसे घेरे हुए हैं..? इस हुजूम में सबसे अहम किरदार, वो देखो, हमारा हीरो ही तो है..! शायद तुम पूछना चाह रही हो वो क्या सपना देख रहा है ? ये सवाल ही बेमानी है..। सालों गुमनाम रहे शायर को अचानक मिली कामयाबी से लेकर..अपने ड्रीम हाउस के नाम तक..क्या-क्या सपने नहीं देख रहा वो..! पहाड़ की चोटी पर बना ‘द फ्लोटिंग क्लाउड्स’ और उसके आंगन में बैठी एक प्यारी सी परी..जो इस सर्द रात में फैली आंखों से मुझे देख रही है..। नहीं निंफिंया, नहीं, कछुए सरीखे उस अस्तित्त्व के लिए भला उस दुनिया में क्या रखा है जिससे हमारी उम्मीदें, हमारी ख्वाहिशें, हमारे रिश्ते..सभी कुछ जुड़ा है..? उसे लगता है तुम्हारी दुनिया बेमानी है..। उसे इस बात का भी इल्म नहीं कि उसकी नियति में भी वो लम्हा लिखा है जब उसे सपनों के ये साल तर्पण करने होंगे..लेकिन वो खुशी या उन्माद के लिए उनका सौदा नहीं करेगा..वो उस लम्हे में असंपृक्त रहना पसंद करेगा..। ख़ैर अभी जब वो वक्त नहीं आया है-हमारा हीरो कुछ नहीं चाहता है क्योंकि उसका दिल हर ख्वाहिश से ज़्यादा नाज़ुक है, क्योंकि उसके पास सबकुछ है, क्योंकि वो खुद अपनी ज़िंदगी का शिल्पी है और हर लम्हा अपनी कल्पनाओं के मुताबिक उसे आकार देता है..। वो ये मानने को तैयार है कि कई बार ज़िंदगी सिर्फ ऐहसास नहीं होती, सिर्फ मृग-मरीचिका नहीं है, उसका वजूद कहीं ज़्यादा असल है..। लेकिन फिर निंफिया एक रात में इन अजनबी लम्हों में उसकी सांस क्यों थम जाती है ? ये क्या जादू है कि इस ठंड में भी उसके दिल की धड़कनें चौगुनी हो जाती हैं, हमारे हीरो की आंखें छलक उठती हैं, उसके नरम गाल ये किस गर्मी से सुर्ख हुए जाते हैं, उसे दर्दमंद अस्तित्त्व को ये कौन सी नरम छुअन सांत्वना दे रही है..? ऐसा क्यों है कि उनींदी रातें उसके पलक झपकते ही गुज़र जाती हैं और जब सुबह खिड़की पर गुलाबी रंग के साथ दस्तक देती है, जब चढ़ता दिन कमरे को चमकीली रोशनी से भर देता है, उस वक्त थका-मांदा हमारा हीरो, दिल में मीठे दर्द को सहलाते-सहलाते सो जाता है ? हां, निंफिया, वो खुद को धोखा देता है और सच जानते हुए भी भरोसा करता है कि उसकी आत्मा सच्चे इश्क की मस्ती में झूम रही है..। उसे लगता है कि उसके हवाई सपनों में कोई जीती जागती शह भी है ! क्या ये धोखा है ? उसकी दुनिया में प्यार अपनी सारे आनंद, अपने समूचे दर्द के साथ बसा है.....बस एक बार उसकी तरफ़ देखो, क्या उसे देखकर यकीन होगा कि जिसे वो सपनों में दीवानगी की हद तक चाहता रहा है, असल ज़िंदगी में उसे जानता तक नहीं है ? यकीनन दोनों सालों तक हाथों-हाथों में डालकर ज़िंदगी के रास्ते पर चले होंगे..सिर्फ वो दोनों, दुनिया को ठुकराते, एक दूसरे में एकाकार होते हुए..। यकीनन विदाई के उस अविस्मरणीय क्षण में सपनों की उस राजकुमारी का दिल दर्द से भारी रहा होगा, उसके होंठों पर नरम सिसकियां रही होंगी..। उस लम्हे में वो भी अपनी कजरारी आंखों में मचे तूफान, शूल की तरह चुभती दिसंबर की हवा से बेखबर रही होगी..। क्या ये महज़ एक सपना रहा हो सकता है- वो वीरान जंगल जहां वो दोनों मिला करते थे ? जहां वो कभी उम्मीदों के पंखों पर उड़े, कभी ग़म के समंदर में तैरे, जहां उन्होंने एक दूसरे को टूटकर चाहा..और वो नदी के किनारे बना अकेला पुश्तैनी घर जहां उसने सालों बूढ़े मां-बाप के साथ गुज़ारे..। खुदा कसम निंफिया वो उससे खूबसूरत जगहों पर भी मिला; अजनबी आसमान तले, तिलस्मी मंदिरों के आंगन में, रोशनी में नहाए मेलों के झूलों पर...ऐसे मंजरों में जहां उसने झटपट अपना मुखौटा उतारा और हीरो के कानों में कहा, ‘मैं आज़ाद हूं..।’ इसके बाद के आलिंगन में दोनों अपना ग़म, अपनी सारी कड़वी हकीकतें भूल गए..। ओह, निंफिया, ये तो तुम्हे भी मानना पड़ेगा कि ख्यालों के इस भंवर में डूबे हमारे हीरो के दरवाज़े पर बिन बुलाई दस्तक होती है तो उसका चोरी करते पकड़े गए बच्चे की तरह चौंकना लाज़िमी है..। ‘बेटा, मैं अभी-अभी करसोग से पहुंचा हूं.’ हे भगवान ! धरती फट गई है या आसमान टूट कर गिरने को है, करसोग से भी कोई आया है ! ’
इतना कहकर मैं सांस लेने के लिए रुका..। अचानक ख्याल आया कि मेरे भीतर कुछ है जो ज़ोर-ज़ोर से हंसने के लिए ठाठें मार रहा है..। गला भर्राया था, आंखें नम हो रही थीं..।
मुझे लगा निंफिया जो अभी तक हैरान बचकानी आंखों से मुझे सुन रही थी अभी खिलखिला कर हंसने वाली है; अभी से ये अफ़सोस सताने लगा था कि मैं नाहक ही अपना हाल ए दिल बयां कर बैठा था..। एक अरसा बीता जब मेरा मन अपने बारे में फैसला सुना चुका था और अब एक ऐसा शख्स सामने था, जिसके सामने ये जजमेंट पढ़ना ज़रुरी था..। हां, ये तो आपको मानना पड़ेगा कि वो मेरी स्वीकारोक्ति थी..उसमें समझे जाने की आस कहीं नहीं छिपी थी..। लेकिन हैरानी की बात ये है कि वो अब भी खामोश बैठी थी, किसी इंतज़ार में....
फिर उसने मेरे हाथों को हल्के से दबाया और बोली—
‘तुम ये कहना चाहते हो कि तुमने अपनी पूरी ज़िंदगी यूं ही गुज़ारी है ?’
‘अब तक की पूरी ज़िंदगी, निंफिया..और लगता है आगे भी यूं ही बीतेगी..।’
‘लेकिन ऐसे तो नहीं चलेगा,’ उसने कुछ बेचैनी से जवाब दिया..। ‘ऐसा होना भी नहीं चाहिए..। हां, ये हो सकता है कि मेरी पूरी उम्र बाबा के साथ बीते..। क्या तुम्हे मालूम है, ऐसे जीना कैसा होता है ?’
‘जानता हूं, निंफिया जानता हूं !’ मैं लगभग चिल्ला रहा था, मेरी भावनाएं बेकाबू हो रही थीं..। ‘अब ऐहसास होता है कि अपने सबसे बेहतरीन साल मैंने गंवा दिए..। शायद ऊपरवाले ने तुम्हे यही ऐहसास दिलाने के लिए तुम्हे मेरे पास भेजा..। अब जब तुम्हारे करीब बैठकर तुमसे बात कर रहा हूं, आने वाले कल के बारे में सोचना नामुमकिन सा है..। आने वाला कल फिर अकेलेपन से भरा है, फिर वही बेज़ार ज़िंदगी होने जा रही है..। ये लम्हा जो तुम्हारे होने से छलक रहा है, उसे किसी आरज़ू की दरकार नहीं है..। ऊपरवाला तुम्हे सलामत रखे, तुमने पहली नज़र में मुझे नहीं ठुकराया..मेरी ये दो रातें स्याह नहीं सफेद रहेंगीं..।’
‘नहीं..।’ डबडबाई आंखों के साथ निंफिया बोली- ‘क्या हम इस तरह बिछड़ेंगे ? अकेले आसमान के पंछियों का साथ क्या सिर्फ दो शामों का होगा ?’


‘ओ निंफिया, निंफिया ! क्या तुम जानती हो तुमने मुझे मुझसे मिलवाया है..? तुमने एक शापित पत्थर को छुआ और वो राजकुमार बन गया..। शायद उदासियों के बादल छंटने को हैं..? क्या तुम्हे ऐसा लग रहा है कि मैं बातें बना रहा हूं ? प्लीज़ ऐसा मत सोचो निंफिया...तुम्हे पता है खुशी की हर झलक के बाद मैंने हमेशा खुद को ,कोसते पाया है..। सपनों के रंगों से सजी सफेद रातों के बाद..बेस्वाद सुबहों ने सताया है..। तुम अपने इर्द-गिर्द भीड़ का शोर सुनती हो; तुम हकीकत की दुनिया में उन्हें सांस लेता पाती हो; तुम देखती हो ज़िंदगी उनके लिए फ़रेब नहीं है, उनके ख्वाब बादलों की तरह हवा नहीं होते..। लेकिन कल्पना कितनी लचर होती है, एक सी शोख, परछाइयों की गुलाम, एक हिरण की तरह निरीह..। उदासी में भला क्या मज़ा है ? ये दुनिया सोचती है उम्र के कारवां के साथ कदम मिलाते हुए सपने भी थक जाते हैं..। जैसे-जैसे आप प्रौढ़, अक्लमंद होते जाते हैं..सपने भी धूल होते जाते हैं..। अगर और कोई चारा न हो तो इसी धूल से दोबारा ज़िंदगी को तामील करना पड़ता है..। लेकिन जुस्तजुओं की इस जद्दोजेहद में आपकी आत्मा किसी और तड़प में जलती जाती है..। आखिर हारकर सपनों का सौदागर पुराने सपनों के टुकड़ों से ज़िंदगी की चिंगारी पैदा करने की कोशिश करता है, कुछ ऐसे ही जैसे चकमक पत्थर को घिसकर आग सुलगाई जाती है..। उसकी हर कोशिश ख्वाहिशों को पुरनूर शमां बनाने की होती है..जिससे वो दिल में पसरती मुर्दा ठंडक को तापने की कोशिश करता है, अपने खून में रवानगी भरने की कोशिश करता है, अपने आंसुंओं में उबाल खोजता है..। तुम जानती हो मेरे दिल की हालत, निंफिया..? क्या तुम जानती हो कि मैं अपने सपनों की भी सालगिरह मनाता आया हूं, हां, वही सपने जो हकीकत कभी थे ही नहीं..। शायद इसलिए कि वो अब नहीं हैं, शायद इसलिए कि मुझमें उन्हें खरीदने की कुव्वत नहीं है..। तुम जानती हो, निंफिया, सपनों की भी कीमत होती है..। तुम जानती हो, मुझे ऐसी जगहों, ऐसी तारीख़ों को याद रखने की आदत है जिन्होंने कभी ज़रा सी भी खुशी मुझे दी हो..। मैं चाहता हूं कि मेरा आज मेरे बीते हुए कल के साथ जुगलबंदी के सुरों में गाए..। भटकते-भटकते मैं अक्सर शिमला की गलियों पर हैरान होता हूं..। क्या यादें बिखरी पड़ी हैं, वहां ! जैसे कि मुझे याद है एक साल पहले, ठीक इसी दिन, इसी वक्त मैं स्टेडियम की सीढ़ियों पर बैठा चांद से बातें कर रहा था..। मुझे ये भी याद है कि उस वक्त मेरे सपने मुरझाए हुए थे..। हालांकि बीते हुए कल की तासीर नहीं बदलती लेकिन न जाने क्यों इस वक्त लग रहा है जैसे वो मेरी सोच से बेहतर था..ज़िंदगी ज़्यादा सुकून भरी थी..। दिल कभी-कभी खुद से सवाल पूछता है- कहां हैं तुम्हारे सपने ? अपने सालों के साथ तुमने क्या सुलूक किया है ? तुम्हारे सबसे खूबसूरत पल कहां दफन हैं ? क्या तुम जिए हो या नहीं ? दिल कहता है इस ठंडी दुनिया को देखो..। कुछ और साल बीतेंगे उसके बाद वही धुंधला एकाकीपन, बिस्तर में जकड़ा बुढ़ापा..उसके बाद इतिश्री..! तुम्हारी सुनहरी दुनिया मुरझा जाएगी, तुम्हारे सपने पतझड़ के पत्तों की तरह सूखकर बिखर जाएंगे..।
ओह निंफिया ! क्या तुमने कभी जाना है अकेले छोड़े जाने का ग़म..? जब तुम्हारे पास मलाल करने की भी वजह न हो..? क्योंति तुम जानती हो कि जो छूटा वो कुछ नहीं था, अहमकाना शून्य..। कुछ नहीं था, सिर्फ सपने...

‘बस और कुछ मत कहो..।’ गाल पर ढलके आंसू को पोंछते हुए निंफिया बोली..। ‘तन्हाई की उम्र ख़त्म हुई..। हम अब साथ हैं...चाहे जो हो, हम कभी जुदा नहीं होंगे..। देखो, मैं एक आम लड़की हूं, मेरे पापा प्रोफेसर ज़रुर हैं लेकिन कॉलेज से आगे नहीं पढ़ी..। फिर भी मैं तुम्हे समझ सकती हूं..क्योंकि जो तुमने जीया है, वही मैंने भी जीया है..। तुम्हारी तरह तफ्सील में सुनाने का हुनर तो मुझे नहीं आता... ’ ज़िंदगी में पहली बार मेरे अंदाज़ ए बयां की तारीफ़ सी उसकी इस बात में महसूस हुई..। ‘मुझे खुशी है कि तुमने जो कहा, दिल से कहा..। मैं भी तुमसे कुछ छिपाना नहीं चाहती..। शायद मेरे ग़म की दवा तुम्हारे पास हो..। ’
‘वैसे किसी ने मुझसे कभी सलाह मांगी नहीं..। लेकिन मेरी प्यारी निंफिया, फिर भी शायद हम एक दूसरे की ज़िंदगी को बेहतर बना सकें..इस वक्त मेरे पास हर मर्ज़ की दवा है..। ’
‘नहीं, नहीं ! ’ उसने हंसते हुए टोका..। ‘मैं तुम्हारे दिल के आईने में खुद को देखना चाहती हूं, इस तरह जैसे तुम मुझे ताउम्र चाहते रहे हो..। ’

‘मंज़ूर है, निंफिया, मंज़ूर है..’ मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था..अगर बीस साल पहले भी तुमसे मिला होता तो इससे ज़्यादा नहीं चाह सकता था, जितना इस लम्हे में तुम्हे चाहता हूं..।
‘तुम्हारा हाथ..’ निंफिया बोली..।
‘ये लो..।‘ अपना हाथ उसे थमाते हुए मैंने कहा..।
‘तो चलो, अब मेरी कहानी..।‘


क्रमश:

1 टिप्पणी:

  1. बेनामी04 फ़रवरी, 2010

    ye bahad khoobsurat rachna hai...shayad hum bhi yhi kehte lekin hme khuda ne wo alfaaz nhi bakshe...khair aapne hi hmari bhawnaon ko aaina diya hai..to hum shukarguzar hain......

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