शुक्रवार, जनवरी 15, 2010

सफेद रातें



कहानी निंफिया की

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मेरी आधी कहानी तो तुम जानते ही हो- तुम्हे पता है कि मेरे घर में एक बूढ़े दादा हैं..’
‘क्या बाकी की आधी कहानी भी इतनी ही छोटी है...’ हंसते हुए मैंने टोका..।
‘खामोशी से सुनो. नहीं तो मैं भूल जाऊंगी.
हां तो मैं कह रही थी, मेरे घर में एक बूढ़े दादा हैं..मम्मी-पापा की शक्ल हल्की सी याद है लेकिन भीतर कुछ उमगाती नहीं..। बचपन से दादा ने ही पाला..। दादू बेहतर दिनों को याद करते हैं, बताते हैं कि कभी पूरा शिमला उन्हें जानता था..। तुम्हे पता है उन्होंने मुझे फ्रैंच सिखाई और उसके बाद मेरे लिए टीचर भी रखा..। जब पंद्रह साल की थी..एक शरारत कर बैठी; वो क्या थी ये जानकर क्या करोगे; इतना बताना ज़रुरी है कि कुछ सीरियस नहीं था..। लेकिन फिर भी दादू ने एक सुबह बुलाया और कहा कि अब उन्हें कम नज़र आता है, इसलिए मुझे हमेशा घर में ही रहना होगा..। उनका कहना था कि अगर मैं अच्छी बच्ची नहीं बनी तो वो मुझे गेट से बांध देंगे..। वो रिटायर हो चुके थे इसलिए उनसे बचना बहुत मुश्किल था..। एक बार उन्हें छकाने की कोशिश की और अपनी सहेली को अपनी जगह कमरे में छोड़कर..कामना देवी मंदिर चली गई..। जब दादू सोकर उठे मैं तब भी नहीं लौटी थी, उन्होंने सवाल पूछना शुरू किया..सहेली डरकर भाग गई....’
इतना कहकर निंफिया रुक गई और हंसने लगी..। फिर हम दोनों हंसने लगे..। अचानक वो खामोश हुई और बोली-
‘मैं बोल देती हूं, तुम दादू पर मत हंसो..। मैं हंस रही हूं क्योंकि वो मेरे दादू हैं, वो ऐसे ही हैं, लेकिन फिर भी मुझे उनसे प्यार है..। लेकिन उस दिन फंस गई और उसके बाद फिर भागने की कभी कोशिश नहीं की..।’
‘तुम्हे शायद पता है हम पुश्तैनी घर में रहते हैं; ये अंग्रेज़ों के ज़माने का बना छोटा सा, लकड़ी का घर है..। ऊपरी मंज़िल के बरामदे में तीन खिड़कियां हैं जो दादू जितनी ही पुरानी हैं..। एक रोज़ दादू ने वहां नया किराएदार रख लिया..। ’
‘यानी वहां पुराना किराएदार भी था..’ मैंने बहुत गौर से सुनते हुए कहा..।
‘और नहीं तो क्या ? ’ निंफिया ने उत्तर दिया..। ‘और हमेशा तुमसे कम बोलने वाले ही किराएदार..। ’
‘ पहले जो रहता था, उसकी ज़ुबान पर तो मानो ताला लगा रहता था..। ऐसा लगता था वो गूंगा ही नहीं, अंधा, बहरा भी है..। वो एक रूखा-सूखा अधेड़ आदमी था..उसने वहीं दम तोड़ा..। क्योंकि दादू की पेंशन के अलावा हमारे घर में आमदनी का ज़रिया सिर्फ यही किराया है..इसलिए उसके बाद दादू के पास नया किराएदार रखने के अलावा और कोई चारा नहीं था..। ये मैदानों से आया एक स्टूडेंट था..। उसने किराये पर ज़्यादा मोलभाव नहीं किया..इसलिए मेरे दादू ने उससे ज़्यादा सवाल जवाब नहीं किए..। हां, बाद में ज़रुर उन्होंने पूछा था: ‘निंफिया, हमारा नया किराएदार कैसा है ? मैं झूठ नहीं बोलना चाहती थी..इसलिए मैंने बताया कि वो दिखता तो नौजवान है लेकिन हरकतें वैसी नहीं हैं..। ’
‘क्या वो अच्छा दिखता है..?’ दादू ने पूछा था..।
‘मैं फिर झूठ नहीं बोल पाई: ’ हां, दिखता तो अच्छा है,’ मैंने कहा..। इस पर उन्होंने मुझे एक घंटे का जो लैक्चर पिलाया..उसका मजमूं इस तरह था कि कैसे उनके ज़माने में नौजवान सजीले हुआ करते थे..और कैसे अब करियर का दबाव उनसे जवानी छीन रहा है..!
बीते वक्त की बातें दादू के लिए दिल बहलाने का इकलौता तरीका हैं—जब वो जवान थे, दिसंबर के सूरज की तपिश भी ज़्यादा गुनगुनी होती थी, बर्फ भी कई गुना ज़्यादा गिरा करती थी..पाइप का तंबाकू भी नकली नहीं बना करता था..जो कुछ था उन्हीं के दिनों में था..!
कई बार मन में सवाल आया कि दादू ने मुझसे ये क्यों पूछा ? लेकिन फिर या तो बटन टांकने में, या रसोई में उलझती रही और सवाल बना रहा..।
‘फिर एक सुबह वो किराएदार हमारे यहां आया; उसने पानी की दिक्कत का ज़िक्र किया था शायद..लेकिन बातचीत बढ़ती गई..दादू को तो बात करने का बहाना यूं भी चाहिए ही..इसलिए उन्होंने कुछ लेकर आने के लिए मुझे भीतर के कमरे में भेज दिया..। मैं शर्म से लाल थी, काटो तो खून नहीं..मुझे लगा अब वो भी मेरी कैद की सज़ा से वाकिफ है..। मैं रोने लगी..। मैं शर्म के मारे गड़ी जा रही थी तभी दादू चिल्लाए, ‘जाती क्यों नहीं ? अब तो मेरी हालत और ख़राब थी, आखिरकार उस अजनबी ने मेरी हालत पर रहम किया और वहां से चला गया..।’ ’
‘इसके बाद के दिनों में तो हालत ये थी कि मैं एक हल्की सी आहट पर भी जान देने को तैयार थी..! कहीं ये वही तो नहीं ?.मैं हर बार यही सोचती..। दरवाज़ों के बीच की दरार से कई बार देखने की कोशिश करती..लेकिन कोई आहट उसके आने का पैगाम लेकर नहीं आई..। करीब पंद्रह दिन बीत गए..फिर एक दिन उसने मेरी सहेली के ज़रिए दादू के पास पैगाम भिजवाया कि उसके पास फ्रेंच की ढेर सारी अच्छी किताबें हैं..उन्हें पढ़ने से मेरी मूढ़मति भी सुधरेगी और जी भी बहलेगा..। वो आसानी से मान गए..हां उन्होंने ये तफ्तीश ज़रुर की कि कहीं ये किताबें ‘दिमाग खराब करने वाली तो नहीं..? ’
‘नौजवान शरीफ़ लड़कियों को कैसे भरमाते हैं, कैसे वो शरीफ़ लड़कियों को अपने घर से दूर करते हैं, और फिर उसके बाद उन्हें छोड़ देते हैं..ज़्यादातर किताबों में यही सब तो होता है.. । कहीं ये कोई चाल तो नहीं ? किताबों के बीच कोई चिट्ठी तो नहीं मिली..?, दादू ने कई बार ये सवाल दोहराए..।’
‘मुझे याद है उन किताबों में ज़्यादातर वॉल्टर स्कॉट के नॉवल थे..। करीब एक महीने में दादू को मैं उनमें से आधे पढ़कर सुना चुकी थी..। लेकिन वो किताबें भेजता रहा..। उनमें पुष्किन की कहानियां थीं, मोपांसां के किस्से थे..आखिरकार हालत ये थी कि अब मैं किताबों के बगैर नहीं रह सकती थी..। उन कहानियों ने पहली बार मेरे सोए सपनों को पंख दिए..। मेरे सपनों में भी घोड़े पर बैठा राजकुमार पहली बार प्रकट हुआ..।’
‘कहानी कुछ इसी तरह आगे बढ़ रही थी, जब एक दिन मुझे वो घर की सीढ़ियों पर मिला..। दादू ने मुझे दुकान से कुछ लाने भेजा था..। मुझे देखकर वो रुका, मैं भी शरमाई, वो भी हल्का सा शरमाया; हंसकर मुझे गुडमॉर्निंग कहा, दादू का हाल पूछा और आखिर मुझपर आया: क्या तुमने वो किताबें पढ़ डालीं ? मैंने हां में सिर हिलाया.’
‘तुम्हे सबसे अच्छी कौन सी लगी ?’
मैंने क्या जवाब दिया- ये ख्याल नहीं लेकिन हमारी वो बातचीत वहीं खत्म हो गई..।
‘कोई हफ्ते भर बाद फिर उन्हीं सीढ़ियों पर हमारा सामना हुआ..। इस बार दादू ने नहीं भेजा था, मैं खुद ही कुछ खरीदने गई थी..। ये ढाई बजे का वक्त था..उसे क्लासेज़ के बाद सीधे घर आने की आदत थी..।’
‘गुड आफ्टरनून ! ’ उसने कहा..। मैंने भी इन्हीं लफ्जों में जवाब दिया..।
‘दिन भर घर में बोर नहीं होती हो..’उसने पूछा..।
‘समझ नहीं आया क्यों, लेकिन उसके इस सवाल पर मैं सकपका गई..। मेरे गाल फिर सुर्ख हो गए थे..। लग रहा था, अब मेरी सज़ा के बारे में दुनिया सवाल करने लगी है..और मैं जवाब दिए बिना वहां से जाना चाहती थी लेकिन इसकी हिम्मत नहीं थी मुझमें..।’
‘सुनो आई एम सॉरी, अगर तुम्हें बुरा लगा तो..। लेकिन तुम अच्छी लड़की हो और तुम्हारे दादू की तरह मैं भी तुम्हारा भला सोचता हूं..। क्या तुम्हारा कोई दोस्त नहीं है..?’
‘मैंने उसे बताया कि मेरी सिर्फ एक दोस्त है जो वो अभी चंडीगढ़ मे पढ़ती है..।
’सुनो मेरे साथ मॉल रोड़ पर चलोगी? ’ न जाने अचानक उसने कहां से पूछ लिया..।‘
‘मॉल रोड !! लेकिन दादू का क्या होगा ? ’
‘उनके तो बगैर ही जाना होगा..।’ उसने कहा..।
‘नहीं मैं उन्हें धोखा नहीं दे सकती..। बाय..।’ मेरा जवाब था..।
‘तुम्हारी मर्ज़ी..बाय..।’ इससे ज़्यादा वो भी कुछ नहीं बोला..।
‘फिर उसी रात वो डिनर पर हमारे यहां आया और देर तक दादू से बातें करता रहा..। बात दादू के पुराने दोस्तों की हो रही थी, तभी अचानक उसने कहा: मैंने गेयटी थिएटर में आज के लिए बॉक्स बुक करवाया था..। हैरोल्ड पिंटर का नाटक है..। मुझे दोस्तों के साथ जाना था..लेकिन अब वो मुकर गए हैं..। टिकट अब भी है..।’
‘हैरोल्ड पिंटर..! दादू हैरानी के साथ बोले..।‘
‘हां, हैरोल्ड पिंटर..।‘ वो मुखातिब दादू से था..लेकिन नज़रें मेरी ओर थी..। मैं समझ सकती थी उन नज़रों में छिपा निमंत्रण..। मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था..।
‘तो क्या आप देखने नहीं चलेंगे..? नहीं तो ये टिकट भी बरबाद होंगे..।’
‘अरे, क्यों नहीं..हमारी निंफिया ने भी आजतक गेयटी थिएटर नहीं देखा है..।’
‘मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था..। हम झटपट तैयार हुए..माल रोड़ की चढ़ाई चढ़ने में दादू के साथ कोई दो घंटे का वक्त लगा..। हालांकि उन्हें प्ले दिख तो नहीं रहा था, लेकिन वो संगीत सुन सकते थे..। इसके अलावा कुछ भी हो दादू मुझसे प्यार करते हैं..वो मेरा जी बहलाने के मकसद से वहां आए थे..। हम दोनों का अकेले वहां आना तो खैर नामुमकिन ही था..।’
‘हेरोल्ड पिंटर के नाटकों के बारे में उस रोज़ मेरी क्या राय बनी..ये बताने की ज़रुरत नहीं; लेकिन उस पूरी शाम वो किराएदार मुझे अदब भरी नज़रों से देखता रहा, अदब से बातें करता रहा..। ऐसा लग रहा था मानो जतला रहा हो कि सुबह उसका मुझे न्योता देना ग़लत नहीं था..। लेकिन फिर भी..ये मेरी ज़िंदगी के सबसे रंगीन दिनों में से था..। मुझे याद है रात को सोते वक्त मैं खुश थी, मेरे दिल में न जाने कौन सी हल्की सी तपिश थी..सपने में भी उस नाटक के खामोश सीन्स ही नज़र आते रहे..। ’
‘मुझे उम्मीद थी कि अब उसका आना-जाना बढ़ेगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ..। बल्कि उसने इधर झांकना भी बंद कर दिया..। वो महीने मे एक आध बार आता..सिर्फ हमको थिएटर जाने का न्योता देने के लिए..। मुझे याद है हम दो बार और उसके साथ गेयटी थिएटर गए..। लेकिन दोनों बार मैं बेमन ही गई..। मुझे लगता था उसके मन में मेरे लिए सिर्फ दया है..। जैसे-जैसे वक्त बीता मेरी बेचैनी बढ़ती गई, मैं इत्मीनान से बैठ नहीं सकती थी, पढ़ नहीं सकती थी, काम नहीं कर सकती थी..कभी-कभी बेवजह ही हंसने लगती तो दादू गुस्सा होते..। कभी यूं ही रोने लगती..। हालत यहां तक पहुंच गई कि मैं बीमार पड़ गई ..। यूनिवर्सिटी में इलेक्शन्स का वक्त था..कई दिनों से उसका आना-जाना पूरी तरह बंद थी..। हमारी मुलाकात हर बार उन्हीं सीढ़ियों पर होती..। हर बार वो कुछ इस अंदाज़ में हलो कहता मानो जबरन बात कर रहा हो..। मैं सामने की सीढ़ियों पर खड़ी रहती वो सीधा सामने के दरवाज़े से भीतर घुस जाता..। उसे देखते ही लगता मानो पूरे बदन का खून दिमाग में चढ़ गया हो..। ’
‘अब मेरी कहानी का क्लाइमेक्स नज़दीक है..। तकरीबन एक साल पहले, मई महीने में वो हमारे पास आया और दादू से बोला अपनी रिसर्च के सिलसिले में दिल्ली जा रहा है..।’
‘जैसे ही मैंने सुना मानो किसी ने गोली मार दी हो..मैं तकरीबन बेहोश हालत में कुर्सी पर गिर पड़ी..। दादू को कुछ पता नहीं चला..जब वो उनके सामने आखिरी बार झुका और चला गया..।’
‘मैं कर ही क्या सकती थी..? सोचती रही, सोचती रही, फिर आखिरकार एक फैसला लिया..। उसे अगले दिन जाना था और मैंने इस कहानी को उसी रात खत्म करने की ठानी..। जब दादू सोने चले गए, मैंने अपने कपड़े पैक किए, न जाने कौन सी ताकत मुझे खींचकर उसके कमरे तक ले गई..। अभी तक याद है तकरीबन एक घंटे तक उसकी दहलीज़ के बाहर खड़े रहकर दस्तक देने की हिम्मत जुटाती रही..। जैसे ही उसने दरवाज़ा खोला, उसके मुंह से चीख निकल गई..उसे लगा मैं कोई भूत हूं और वो मेरे लिए पानी लाने दौड़ा..। मेरे लिए खड़े रहना भी मुश्किल हो रहा था, मेरा दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि मेरा सिर तक दुख रहा था..नहीं जानती थी मैं क्या कर रही हूं..। जब थोड़ा होश आया अपना ब्रीफकेस उसके बिस्तर पर रखा, धड़ाम से बैठ गई..और हथेलियों में चेहरा छिपाकर रोने लगी..। ऐसा ऐहसास हुआ जैसे वो सबकुछ समझ रहा था..।
‘सुनो,’ ’..उसने कहना शुरू किया..। ‘सुनो निंफिया, मैं कुछ नहीं कर सकता हूं; अपने घर का इकलौता हूं, पापा रिटायर हो चुके हैं..दिल्ली में अभी नौकरी की शुरुआत करनी है..अगर तुम मेरे साथ आओगी तो क्या दे पाऊंगा तुम्हे ? ’
‘हम देर तक बात करते रहे; लेकिन आखिरकार मैं आपा खो बैठी..। मैने कहा कि मैं दादू के साथ और इस तरह नहीं रह सकती; कि मैं दिल्ली में भी उसके साथ रहने को तैयार हूं..कि मैं उसके बिना जी नहीं सकती..मेरा प्यार मेरी शर्मिंदगी पर भारी पड़ रहा था..कहते-कहते मुझे चक्कर आ गया..ठुकराए जाने का दर्द ऐसा था..जो उस वक्त मेरे लिए बर्दाश्त से बाहर था..।
‘वो कुछ देर खामोशी से बैठा रहा, फिर उठा, मेरे पास आया और मेरे हाथों को अपने हाथों में लेकर बोला-
‘सुनो, निंफिया, प्लीज़ सुनो; मेरा वायदा है तुमसे अगर कभी शादी करने लायक हुआ तो तुम्ही मेरी ज़िंदगी की खुशी बनोगी..। मेरा यकीन करो..मेरी ज़िंदगी में खुशी सिर्फ तुम्हारे साथ आ सकती है..। सुनो मैं दिल्ली पत्रकार बनने जा रहा हूं..। खुद पर भरोसा है, एक दिन पैसा, नाम सब होगा..। उस वक्त जब लौटूंगा तो सीधा तुम्हारे पास आऊंगा..। लेकिन इस वक्त तुमसे कोई और वायदा नहीं कर सकता..। हां, साल भर में तुम्हारे पास लौटने की कोशिश करूंगा, अगर इस अरसे में नहीं लौट पाया तो जब भी लौटूंगा तुम्हारे पास ही लौटूंगा..। लेकिन तुम्हें बांधकर नहीं रखूंगा..अगर उस वक्त तुम्हारी ज़िंदगी में कोई और हुआ तो बीच में कतई नहीं आऊंगा..। ’
‘बस यही कहा था, उसने मुझे..।’ लंबी आह के साथ निंफिया ने पल भर का विराम लिया..। ‘अगले दिन वो चला गया..रेलवे स्टेशन पर बेंच पर बैठे हुए हमने तय किया कि दादू को कुछ नहीं बताएंगे..ये उसीकी ख्वाहिश थी..। ’
‘तो...बस यही है मेरा इतिहास..। देखो एक साल बीत चुका है और वो वापस शिमला में है; वो पिछले तीन दिनों से यहां है, और—और--’
‘और क्या ?’ मैं उसकी पूरी बात सुनने को अधीर था..।
‘अब तक वो मुझसे मिलने नहीं आया है !’ निंफिया ने मेरी चिल्लाहट के साथ सुर मिलाते हुए कहा..। फिर मानो अपना पूरा हौसला जुटाकर कह रही हो-
‘उसका नाम ओ निशां तक नहीं है..।’
इतना कहकर वो खामोश हो गई..। फिर मिनट भर का मौन, उसके बाद उसने घुटनों पर सिर टिकाया और चेहरे को हथेलियों में ढककर रोने लगी..। उसकी सिसकियां मेरे दिल को बेध रही थीं..। मुझे इस सफेद रात के यूं नम होने का अंदेशा नहीं था..।
‘निंफिया..।’ मैंने झिझकते-झिझकते दिलासे भरी आवाज़ में कहा, ‘निंफिया, भगवान के लिए रो मत ! तुम कैसे कह सकती हो? शायद तुम्हे ग़लत ख़बर मिली हो...’
‘वो यहीं है, वो यहीं है, मैं जानती हूं..।’ निंफिया ने दोहराया..। उस रोज़ हमारे बीच एक समझौता हुआ था..। उसके ट्रेन छूटने से कोई घंटा भर पहले हम इन्हीं सीढ़ियों पर बैठे थे..बिल्कुल इसी जगह..। उस वक्त मैं नहीं रो रही थी..। उसकी बातें अच्छी लग रही थीं..उसने कहा था वो शिमला लौटते ही सीधा मुझसे मिलने आएगा..और अगर मैं तैयार हुई तो वो दादू से बात करेगा..। देखो, वो शिमला में ही है, लेकिन समरहिल आया तक नहीं..!‘
उसने इतना कहा और दोबारा वही सिसकियां...
मैं उसकी बगल से उठा और उसके सामने जाकर बोला- ‘मेरे भगवान, क्या मैं तुम्हारे लिए कुछ कर सकता हूं? ’
‘मुझे बताओ निंफिया वो इस वक्त शिमला में कहां है..? क्या मैं उससे जाकर नहीं मिल सकता..?
‘क्या ऐसा हो सकता है?’ उसने अचानकर सिर उठाकर पूछा..।
‘ज़ाहिर है, नहीं! ’ अब मैं थोड़ा संभला; लेकिन मेरी मानो तो उसे ख़त लिखो..।‘
‘ये नामुमकिन है..।’ उसने फैसला सुनाया और फिर सिर झुकाकर बाईं तरफ़ फैले जंगल को निहारने लगी..।
‘लेकिन नामुमकिन क्यों ? ’ मुझे भरोसा था ये नुक्ता काम कर सकता है..। ‘देखो, निंफिया, बहुत कुछ इस बात पर टिका है कि तुम ख़त में क्या लिखती हो..मेरा यकीन करो, मैं तुम्हे ग़लत सलाह नहीं दूंगा..जब एक साल पहले भी तुमने ही पहला कदम उठाया तो अब क्यों नहीं..? ’
‘क्या ये खुद को उसपर ज़बरदस्ती थोपना नहीं होगा..? ’
इस भोलेपन पर मैं मुस्कुराए बगैर नहीं रह सका ‘लेकिन तुम्हे इसका हक है, निंफिया..! क्योंकि उसने तुमसे वादा किया था..। तुमने जो बताया उसे सुनकर लगता है कि वो दिल का सच्चा इंसान है...मेरी दलीलों का सिलसिला जारी रहा..।
‘देखो, उसने खुद को वादे की डोर में बांधा लेकिन तुम्हे पूरी आज़ादी दी..। ऐसे में तुम्हे एक बार फिर पहला कदम उठाना ही चाहिए—अगर तुम उसे अपने वायदे से मुक्त करना चाहती हो, तो भी... ’
‘सुनो, तुम क्या लिखोगे ?’
‘लिखूंगा...क्या लिखूंगा ?’
‘चिट्ठी और क्या ?’
‘ह...म..मैं बताता हूं..तुम लिखो..प्यारे...
‘प्यारे..? क्या मुझे ऐसे ख़त शुरू करना चाहिए..? ’
‘हां, क्यों नहीं? ’
‘अच्छा, उसके बाद ?’
‘नहीं तुम ऐसे शुरु करो—प्रिय—माफ़ करना अगर—नहीं लेकिन माफ़ी का तो फिर अंत ही नहीं होगा..तुम्हे सबकुछ साफ़-साफ़ लिखना चाहिए..।’
‘अगर मेरी चिट्ठी से तुम्हे बुरा लगे तो माफ करना..लेकिन पूरे साल मैं तुम्हारी उम्मीद के सहारे ज़िंदा रही, अगर अब मन डरता है तो यकीन करो..इसकी वजह शक नहीं..। कहीं ऐसा तो नहीं तुम्हारा मन बदल गया है ? अगर ऐसा है तो ये ख़त यही ज़ाहिर करने के लिए है कि मैं तुम्हे दोष नहीं देती..तुम दोषी नहीं हो क्योंकि तुम्हारे दिल पर मेरा बस नहीं..शायद यही मेरा नसीब है..!’
‘तुम गैरतमंद हो , उम्मीद है मेरी चिट्ठी पढ़कर मज़ाक नहीं उड़ाओगे न ही गुस्सा करोगे..। मत भूलो ये एक तन्हा, बिचारे दिल के ज़ज्बात हैं..। उसका कोई नहीं है..। मुझे माफ़ करना अगर तुमपर शक किया हो...’
‘आखिरकार और किस लिए भगवान ने मुझे तुमसे मिलवाया है ! ’ मैंने कहा..।
‘हां, हां, मैं भी यही सोच रही थी !’ निंफिया अब हल्की हंसी से बोली..। उसकी आंखों से खुशी साफ़ झलक रही थी..। ‘ओह ! तुमने मुझे नई रोशनी दिखाई है: भगवान ने तुम्हे यकीनन इसीलिए मुझसे मिलवाया..!’
‘आह निंफिया ! क्या आप कभी किसी को महज़ इस दुनिया में होने के लिए शुक्रिया कह सकते हैं? मुझे अचानक मिलने के लिए शुक्रिया, ज़िंदगी भर की याद देकर जाने के लिए शुक्रिया ! ’
‘बस, बस..काफी है..अब मेरी बात सुनो; मेरे लिए दादू को छोड़कर घर से निकलना मुश्किल है..तुम ज़रुर उसके डिपार्टमेंट में किसी को जानते होंगे..अगर कोई जवाब मिलता हो तो प्लीज़ उसी वक्त मुझे बताना..।’
‘लेकिन चिट्ठी, चिट्ठी! सबसे पहले तो तुम्हे वो चिट्ठी लिखनी होगी..।’
‘हां..चिट्ठी...लेकिन...’ अब वो कुछ पसोपेश में थी..। उसने अपनी बात को अधूरा ही रहने दिया, अपने गुलाबी गाल मुझसे फेरे और मेरे हाथों में कुछ थमाया..। अरे ! तो वो ख़त पहले ही लिख चुकी थी..!
उसके बाद दोनों कोई पांच मिनट तक खामोश यूं ही बैठे रहे..।
‘अजनबी कौन हो तुम…’ अचानक सफेद रात गुनगुनाती महसूस हुई..। मैंने लगभग उसे गले लगा लिया..लेकिन उसे सिर्फ लजाना आता था..वो लजाती रही और हंसती रही..उसके आंसू उसकी कजरारी पलकों पर मोतियों की तरह चमक रहे थे..।
‘अच्छा, अच्छा बहुत हो गया..! अभी के लिए बाय..।‘ न जाने कहां से वो अचानक ही बीच में उठ बैठी और जल्दबाज़ी में बोली- ये लो चिट्ठी, पता लिफाफे पर लिखा है..। अच्छा कल तक के लिए बाय..!
उसने मेरे हाथों को गर्माहट के साथ छुआ और तीर की तरह बगल की गली से घर की तरफ दौड़ गई..। मेरी नज़रें गली के आखिरी छोर तक उसका पीछा करती रही..।
‘कल तक के लिए..कल तक के लिए..’ जब तक उन सीढ़ियों पर बैठा रहा..उसके यही लफ्ज़ गूंजते रहे.. कानों में, उस कॉलोनी में, समरहिल में..दूर-दूर तक फैले हिमालय की चोटियों पर..उस सफेद रात की धुंध को चीरते हुए...


क्रमश:

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