सोमवार, जनवरी 18, 2010

सफेद रातें


तीसरी रात
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सत्रह जनवरी का वो दिन कुछ बोझिल सा था, सुबह से बारिश हो रही थी..सूरज की रोशनी का छींटा भर कहीं नज़र नहीं आ रहा था..। जन्मदिन के रोज़ यूं भी अजीब ख्यालों का बोझ ज़्यादा रहता है..। जवाब जिनके सवाल तलाशने बाकी थे..आकर मेरे कंधों पर नाच रहे थे—लग रहा था मुझमें न उनसे निपटने की ताकत थी..न ही इच्छा शक्ति..नहीं, वो ख्याल वाकई मेरे काबू से बाहर थे..!
हम आज मिलने वाले नहीं थे..। कल रात हमारे विदा होने के बाद से ही आसमान में घनघोर घटाएं घिर आई थीं..और हर तरफ़ धुंध थी..जो बारिश के दौरों के बीच भी भीगी हुई रहती थी..। मैंने उससे कहा कि कल का दिन उदास रहने वाला है..। लेकिन वो खामोश रही थी, वो अपनी सबसे कीमती ख्वाहिश के खिलाफ़ कुछ नहीं सोचना चाहती थी..। उसके लिए आने वाली सुबह उजली ही रहने वाली थी, उसकी खुशी को उस रोज़ भला कौन सा बादल ढांप सकता था..।
‘अगर कल बारिश लगी रही तो हम नहीं मिलेंगे..।’ उसने कहा था..।
मैं दिन भर सोचता रहा कि शिमला में इतनी बारिश तो नज़रअंदाज़ की ही जा सकती है..लेकिन वो आज नहीं आई थी..।
पिछली रात हमारी तीसरी सफेद रात थी....
ये खुशी भी इंसान को कितना दानिशमंद बना देती है..! दिल के प्याले में प्यार की मदिरा गिरे तो वो खुद ब खुद छलक उठता है; आप ऐसे आलम में पूरी कायनात को हंसते, मुस्कुराते देखना चाहते हैं..! एक छोटे से फूल पर भी अपना दिल उडेल कर रख देना चाहते हैं..। और खुशी संक्रामक भी होती है..! कल उसके शब्दों में जो नर्माहट थी, मेरे लिए जो संवेदना...किस तरह उसकी खामोशी..मेरी खूबसूरती का आईना बनी रही..! ओह ! ये इश्क का सुरूर..! मैं...मैं हकीकत की ज़मीन से कदम हटाना नहीं चाहता था लेकिन फिर भी न जाने कहां से ख्याल आया, शायद वो...
पर, हे भगवान ! मैं ऐसा सोच भी कैसे सकता था ? मैं इस कदर अंधा कैसे हो सकता था..? जब सबकुछ किसी गैर का था, जब मेरा कुछ था ही नहीं...जबकि ये हकीकत थी कि उसकी बेकरारी, उसका प्यार...हां, मेरे लिए उसका प्यार..और कुछ नहीं सिर्फ किसी और से मिलने की खुशी था...उसका अतिरेक भी मुझे उसमें शामिल करने के लिए मचल रहा था..। लेकिन वो नहीं आया..हमारा इंतज़ार बेमानी गया..। पहले सकुचाई..फिर होंठों की शोखी..कसैली हंसी में बदल गई..। फिर अचानक जैसे कुछ हो गया हो..मेरे लिए उसकी तवज्जो दोगुनी हो गई..। मानो उसका दिल अंजाने में ही वो सबकुछ मुझपर बरसा रहा हो, जिसकी उसने खुद आरज़ू की हो..। कहते हैं इश्क का चश्मा..सब कुछ अपने ही रंगों से देखता है..शायद यही वजह रही हो..या फिर उससे साफ़ नज़र आ रही टूटन..लेकिन मुझे लगा कि निंफिया को मेरे इश्क का ऐहसास हो गया है..। जब हम दुखी होते हैं तो दूसरे के दुख का ऐहसास भी ज़्यादा होता है..। ये भाव मरता नहीं, ज़्यादा सघन हो जाता है....
मैं पूरे दिल से उस मुलाकात के लिए गया था..एक-एक रोयां बेकरार था..। आप मानिए या ना मानिए लेकिन जैसा अभी ज़ाहिर किया..मुलाकात से पहले ऐसी ग़लतफहमी नहीं थी मुझे..। लेकिन ये भी पता नहीं था कि मुलाकात का यूं दुखांत होगा..। उससे उम्मीद छलक रही थी, उसे ज़िंदगी के सबसे अहम जवाब का इंतज़ार था..जवाब वो शख्स खुद था..। वो उसकी सदा पर दौड़ा चला आने वाला था..। वो मुझसे एक घंटा पहले सीढ़ियों पर पहुंच गई..। शुरू-शुरू में उसने खूब ठहाके लगाए..। मेरी कही तकरीबन हर बात पर हंसती रही..लेकिन थोड़ी देर बाद..उसी खामोश के भंवर में चली गई..।
‘तुम जानते हो मैं इतना खुश क्यों हूं,’ उसने कहा, ‘मैं तुमसे मिलकर खुश हूं—पता नहीं आज क्यॉं तुमपर इतना प्यार आ रहा है..?’
‘अच्छा ? ’ सिर्फ इतना ही कह पाया, मेरा दिल बल्लियों उछलने लगा..।
‘तुम मुझे पसंद हो क्योंकि तुम्हे मुझसे प्यार नहीं हुआ है..। तुम जानते हो तुम्हारी जगह कोई और होता और एक चांस तो ज़रुर लेता..। आहें भरता, अफसोस मनाता, लेकिन तुम कितने अच्छे हो ना..! ’
फिर उसने मेरे हाथ पर इतने ज़ोर से च्योंटी काटी कि मेरी चीख़ निकल पड़ी..। वो फिर हंस पड़ी..।
‘तुम कैसे दोस्त हो ! मिनट भर बाद वो फिर शुरू हो गई..। ऊपरवाले ने तुम्हे मुझसे मिलवाया..। इस वक्त तुम मेरे साथ नहीं होते तो मेरा क्या होता..? लेकिन बिना स्वार्थ भी तुम्हे मेरा ख्याल है..! हम शादी के बाद भी अच्छे दोस्त रहेंगे..सबसे अच्छे दोस्त.. ’
‘क्या तुम्हे ये डर नहीं सता रहा कि वो नहीं आएगा..।’ मैंने सीधे-सपाट तरीके से पूछा..।
‘ओह जान ! ’ उसने जवाब दिया..। ‘तुम्हे मुझपर भरोसा नहीं..? तुमने मुझे सोचने के लिए बहुत कुछ दिया है..खैर वो बाद की बात है..लेकिन अभी के लिए इतना जान लो कि तुम सही हो..। हां, मैं वाकई आपे में नहीं हूं..। ज़िंदगी भर पहेली ही तो रही हूं..कभी किसी चीज़ को सीरियसली लिया ही नहीं..लेकिन खामोश..कुछ और बात करते हैं.... ’
उसी वक्त हमें कदमों की आहट सुनाई दी..अंधेरे से एक परछाई हमारी ओर बढ़ती दिखाई दी..। हम भी उसकी ओर बढ़ चले..वो तो लगभग चिल्ला पड़ी; मैंने उसका हाथ छुड़वाया और वापस जाने के लिए मुड़ा..। लेकिन हाय ये दिलफरेब इश्क..! वो कोई और ही था..।
‘क्या हुआ? अपना हाथ क्यों छुड़वा लिया..? ’ उसने मेरा हाथ थामते हुए पूछा..।
‘जब वो आएगा तब भी हम यहीं रहेंगे..। वो भी तो देखे हम एक दूसरे को कितना पसंद करते हैं..।’
‘हम एक दूसरे को कितना पसंद करते हैं ! ’ ये शब्द मन के एकाकी सन्नाटों में भीतर तक गूंज गए..। (ओह, निंफिया, काश तुम्हे पता होता, सिर्फ ये कहकर तुमने सबकुछ कह दिया है ! ऐसे मौकों पर एक ऐसा अनुराग जगता है जो आपके दिल को ठंडक से भर देता है, आपकी आत्मा भारी हो जाती है..लेकिन मेरा दिल आग की तरह जल रहा है..क्या तुम अंधी तो निंफिया!...कभी-कभी एक खुश इंसान के पास होना भी कठिन होता है..लेकिन तुम्हारे साथ तो कभी भी, कहीं भी..किसी भी वक्त...! )’
आखिरकार मेरा दिल भी छलक रहा था..।
‘सुनो, निंफिया !’ मैं बोला..। ‘तुम्हे पता है मेरा पूरा दिन किस तरह बीता है..?’
‘बताओ कैसा ? मैं भी कितनी बेवकूफ़ हूं..तब से खुद ही बोले जा रही हूं..।’
‘तुम्हारे उनके दोस्तों को चिट्ठी देने के बाद..घर लौट गया..ठंड इतनी थी कि सीधे बिस्तर में जाकर गिरा, रजाई के बीच..’
‘बस यही कहानी है आज के दिन की..? ’ उसने हंसते हुए टोका..।
‘हां, तकरीबन इतना ही..।’ मैं बमुश्किल खुद को रोक पाया क्योंकि निगोड़े आंसू पहले ही बाहर आ रहे थे..। ‘तुमसे मिलने आना था..इसलिए अभी दो घंटे पहले जगा..। मुझे नहीं पता मुझे क्या हुआ था..। तुम्हे वही बताने आया था..सोच रहा था ये एक ऐहसास हमेशा मेरे साथ रहने वाला है, महसूस हो रहा था जैसे दुनिया बस एक लम्हे में ठहरकर रह जाने वाली है..। जब जगा ऐसा लगा मानो सुरों से बिछी राह पर तरन्नुम की एक मंज़िल है; उसे भुला बैठा था..लेकिन अब वो दोबारा ज़िंदगी में लौट आई है... ‘
‘भगवान के लिए...’ निंफिया ने फिर टोका, ‘भगवान के लिए आम आदमी की ज़ुबान में बात करो !’
‘आह, निंफिया ! कबसे सोच रहा हूं तुम्हे बताऊं...’ मैंने फरियादी सरीखे सुरों में कहना शुरू किया..मेरी आवाज़ में मद्धम सी ही सही..एक छिपी हुई उम्मीद अब भी थी..।
‘छोड़ो ना ! ’ क्या वो सैकेंड भर में ही सब समझ गई थी..। अचानक वो बेहद बातूनी, शरारती हो गई; उसने मेरी बाज़ुओं को पकड़ लिया, ज़ोर से हंसने लगी और मुझे भी हंसाने की कोशिश की..। पसोपेश में मैं जो भी कहता..वो हंसी में उड़ा देती..। मुझे गुस्सा आने लगा..अब क्या वो मुझसे फ्लर्ट कर रही थी..?’
‘तुम जानते हो,’ ऊंगलियों से इशारा करते हुए उसने कहना शुरू किया, ‘इतना सा अफसोस तो होता है कि तुम्हे मुझसे प्यार नहीं, इस दिल को सच में कोई नहीं समझ सकता ! लेकिन मैं तुम्हे अपनी हर बेवफूकाना बात भी बताती हूं.. मिस्टर unapproachable, इसके लिए तो तुम मुझे कसूरवार नहीं ठहराओगे..? ’
‘सुनो मुझे लगता है, ग्यारह बज गए हैं..।’ मैंने घड़ी की तरफ़ देखते हुए कहा..। उसकी हंसी अचानक थम गई..जैसे मन ही मन कुछ गिनने लगी हो..।
‘हां, 11 बज चुके हैं, ’ आखिरकार घबराई आवाज़ में उसने जवाब दिया..।
‘पहले अफसोस हुआ कि उसका दिल दुखाया..मन ही मन खुद को कोसा; लेकिन अल्फाज़ तो ज़ुबान से निकल चुके थे, वापस नहीं लिए जा सकते थे..। ’
मैं उसे दिलासा देने लगा..उसके न आने की वजहें गिनवाने लगा..। मैंने कई तर्क और सुबूत पेश किए..। इस वक्त उससे ज़्यादा आसान और भला किसे छलना हो सकता था..? चाहे किसी भी दिल में उपजी हो, डूबती हुई उम्मीद किसी सहारे की परछाई से भी बिलखना बंद कर देती है..।
‘देखो, तुम्हारी वजह से मैं भी बेवकूफी कर बैठा..।’ अपने तर्क की साफगोई पर लगभग इतराते हुए मैंने कहा- ‘ज़रा सोचो, महज़ एक दिन में उसे चिट्ठी मिलना लगभग नामुमकिन था..मान लो उसने चिट्ठी का जवाब देने की सोची होगी तो भी कल से पहले जवाब नहीं मिलेगा...कल सुबह होते ही मैं पता करूंगा और तुम्हे बताऊंगा..। हज़ारों चीज़ें हो सकती हैं..शायद जब तुम्हारी चिट्ठी पहुंची उस वक्त वो घर पर ही न रहा हो..! कुछ भी हो सकता है...’
’10, न्यू फ्लावर्स डेल..छोटा शिमला..तिब्बती स्कूल के पास...’ उसने फिर पता दोहराना शुरू कर दिया..।
फिर वो अचानक मेरे लिए बेहद नर्म हो गई..। वो मेरी हर बात गौर से सुन रही थी..लेकिन मेरे सवालों पर खामोश थी..।
मैंने उसकी आंखों में झांककर देखा- हां, वो रो रही थी..।
‘देखो, ऐसा मत करो..तुम ऐसा कैसे कर सकती हो..? प्लीज़...’
उसने खुद को मनाकर मुस्कुराने की कोशिश की..। लेकिन उसकी छाती धड़क रही थी..उसकी आंखें अब भी नम थीं..।
‘मैं तुन्हारे ही बारे में सोच रही थी,’ मिनट भर की खामोशी के बाद उसने कहा..। ‘तुम्हारी अच्छाई को जो न देख पाए, वो पत्थर ही होगा..। वो भी तुम जैसा क्यों नहीं है..? लेकिन देखो ना, उसकी नाराज़गी फिर भी मुझे तड़पाए जा रही है..।’
उसे उम्मीद थी मैं कुछ कहूंगा..लेकिन मैंने कोई जवाब नहीं दिया..।
‘शायद अभी तक मैं उसे पूरी तरह नहीं जानती..। तुम जानते हो उसे लेकर डर कभी दिल से गया ही नहीं..। वो हमेशा सीरियस रहता था, लोग घमंडी कहते थे उसे..। हां, मुझे पता है दिल से वो बेहद नर्म है..मुझे अब भी याद हैं वो नज़रें..उस दिन जब उसके कमरे में गई थी...लेकिन फिर भी ये शक..मैं प्यार के लायक हूं ही नहीं शायद..।’
‘ऐसा मत कहो, निंफिया..तुम्हारे शक से ज़ाहिर होता है कि तुम दुनिया में सबसे ज़्यादा उसे चाहती हो, खुद से भी ज़्यादा..।’
‘शायद...’ निंफिया ने अबोधता में जवाब दिया..। ‘उसके बारे में ये तो पहले भी मन में आता रहा है..। मुझे बताओ, ऐसा क्यों है कि अच्छे से अच्छा लड़के भी कुछ न कुछ छिपाकर ज़रुर रखते हैं..? आप अपनी बात को सीधा-सपाट भी तो कह सकते हैं..? ऐसा लगता है जैसे पूरी दुनिया अपने जज्बात ज़ाहिर करने से डरती है..। ’
‘इसकी कई वजहें हैं, निंफिया..।’ मैं बोल ही पड़ा था..खुद पर काबू रखना और ज़्यादा मुश्किल हो रहा था..।
‘नहीं, नहीं...’ उसने यूं कहा मानो उत्तर मन के कहीं गहरे कोने से निकल रहा हो..’मिसाल के तौर पर तुम औरों की तरह नहीं हो ! मुझे अपनी बात कहनी नहीं आती; लेकिन....जैसे....अभी....अभी भी ऐसा लग रहा है..जैसे तुम मेरे लिए कुछ कुर्बान कर रहे हो..। ’ मेरी ओर देखते हुए..वो कुछ झिझकते हुए बोली..। ‘मैं एक आम लड़की हूं, मुझे नहीं पता मैं सही कह रही हूं या ग़लत...लेकिन सुनो....शुक्रिया..।’ उसके होंठो से ज़्यादा मेरे हाथों को दबातीं उसकी हथेलियां इस ‘शुक्रिया का इज़हार कर रही थीं..।’
‘भोले बाबा, तुम्हे खुश रखेंगे..। कौन कहता है---तुम महज़ सपने देख सकते हो..किसने कहा—तुम खूबसूरत नहीं हो..? एक बार प्यार करके देखो, वो तुम्हे बदलकर रख देगा..। मैं जानती हूं तुम्हे दुनिया की सबसे अच्छी लड़की मिलेगी..मैं खुद भी एक लड़की हूं, इसलिए मेरी बात का यकीन करो..। ’
इतना कहकर वो रुक गई..। मुझसे भी कुछ कहते नहीं बन रहा था..। कुछ मिनट बीत गए..।
‘अब वो नहीं आएगा..।’ आखिरकार उसने सिर उठाते हुए चुप्पी को तोड़ा..।
‘वो कल यकीनन आएगा..।’ मैंने बुलंद आवाज़ में लगभग ऐलान किया..।
‘हां…’ उसकी आवाज़ में पहले जैसी उदासी नहीं थी..। ‘अब वो आज तो नहीं आएगा..। चलो कल तक के लिए विदा...अगर बारिश हुई तो कल नहीं आऊंगी..। लेकिन उससे अगले दिन ज़रुर आऊंगी..चाहे कुछ भी हो जाए..भूलना नहीं...तुम्हारा इंतज़ार करूंगी..। ’
फिर जब हम जुदा होने वाले थे, वो मुझपर झुकी और मेरे गालों को चूमा..।
‘हम हमेशा साथ रहेंगे..। रहेंगे ना..? ’
‘ओह, निंफिया, काश तुम समझ पाती मैं कितना अकेला हूं..!’
जैसे ही घड़ी ने नौ बजाए, चारदीवारी और जमाकर रख देने पर आमादा समरहिल की बारिश भी मुझे रोक नहीं पाई..। बर्फ के इमकान के बावजूद मैं वहां उन्हीं सीढ़ियों पर अपनी जगह बैठा था..। मैं उसकी गली तक गया..लेकिन फिर खुद पर शर्मिंदगी महसूस हुई तो उसकी खिड़की की तरफ़ बिना आंख उठाए ही लौट गया..। उसके दरवाज़े से सिर्फ दो कदम की दूरी पर था मैं..। घर लौटा तो उदासी का बोझा और भारी हो चुका था..। कितना बोझिल दिन था वो..। मेरा बस चलता तो उस पूरी सफेद रात मैं चलता रहता..।
लेकिन फिर कल, कल..! कल वो मुझे सब कुछ बताएगी..। आज न तो वो आई..न उसका कोई पैगाम..यानी वो दोनों अब यकीनन एक हो चुके होंगे...


क्रमश:

2 टिप्‍पणियां:

  1. hiiiiiiiiiiiiiiiiii
    happy Birthday.
    ab jara tum Bhanu ki story or uske liye jo feeling thi bo sunaoooooooooooooo

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  2. मुझे पता है इडियट तेरा बर्थ-डे भी पास-पास आता है..सो तुझे भी हैप्पी बर्थ-डे..:-)
    जिस दिन उस ऐहसास को शब्द देने लायक बन जाऊंगा..उस दिन दुनिया मुझे 'कलाकार' कहेगी..। वैसे कुछ चीज़ें शब्दों के परे रहें तो बेहतर है..।

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