गुरुवार, जनवरी 21, 2010

सफेद रातें


चौथी रात
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हे मां, क्या इसे इस तरह ही ख़त्म होना था..? मैं एक बार फिर उन्हीं सीढ़ियों पर नौ बजे हाज़िर था..। वो वहां पहले से मौजूद थी..। मैंने कुछ दूरी से ही उसे देख लिया था; वो उन सीढ़ियों पर पहले रोज़ की तरह ही खड़ी थी..। कुहनियां रेलिंग पर टिकी थीं..। मेरे आने की आहट उसे सुनाई नहीं दी..।
‘निंफिया !’ अपनी उत्तेजना को छिपाते हुए मैंने पुकारा..।
‘अरे, जल्दी आओ..।’ हाथों से मुझे बुलाते हुए वो बोली..।
मैं असमंजस से उसे बस देखता रहा..।
‘चिट्ठी कहां है..? तुम लाए हो ना..? ’ रेलिंग को जकड़ते हुए उसने पूछा..।
‘कोई चिट्ठी नहीं है..।’ मुझे कहना ही पड़ा..। ‘क्या वो अभी तक तुमसे मिला नहीं ?’
मेरे इस सवाल पर उसका चेहरा फीका पड़ गया..। बिना हिले-डुले वो मुझे काफी देर तक देखती रही..। मैंने उसकी आखिरी उम्मीद भी तोड़ दी थी..।
‘चलो...भगवान उसके साथ रहे..भले ही उसे मेरा साथ मंज़ूर न हो...’ उसकी आवाज़ टूट रही थी..।
उसकी आंखें झुक गई, उसने मेरी तरफ़ देखने की कोशिश की लेकिन कामयाब नहीं हुई..। काफी देर तक वो अपने ज़ज़्बातों से लड़ती रही..। फिर सामने पहाड़ियों की तरफ़ मुड़ी और फफक पड़ी..।
‘प्लीज़...निंफिया..’ मैंने चुप करवाना चाहा लेकिन इतना जिगर मुझ में नहीं था, आखिर इस वक्त मैं उसे क्या कह सकता था..।
‘मुझे दिलासा देने की कोशिश मत करो,’ उसने कहा..। ‘मैं उसके बारे में कोई बात नहीं करना चाहती..मुझे मत बताओ कि वो नहीं आएगा...मुझे मत बताओ कि मुझे ठोकर मारी गई है..लेकिन क्यों—आखिर क्यों ? मेरा कुसूर क्या था ?’
उसका गला रुंधा हुआ था..लेकिन उसे देखकर मेरा कलेजा फटा जा रहा था..।
‘देखो..एक लाइन तक नहीं..एक लाइन तक... यही लिख देता कि उसे मेरी ज़रुरत नहीं, वो मुझसे प्यार नहीं करता---लेकिन तीन दिनों में एक लाइन भी नहीं..! उसके लिए कितना आसान है ऐसा दिल तोड़ना जो उससे प्यार करता है ! ओह, ये तीन दिन कैसे बीते हैं, मैं ही जानती हूं..। पहली दस्तक मैंने दी, उसतक जाने वाली मैं थी...गिड़गिड़ाकर प्यार की भीख मांगने वाली मैं थी....और उसके बाद...!! सुनो...’ मेरी तरफ़ मुड़ते हुए वो बोली, उसकी काली आंखें चमक रही थीं..। ‘क्या ऐसा नहीं हो सकता...नहीं लेकिन ऐसा कैसे हो सकता है..? शायद तुमसे कोई ग़लती हुई हो..या फिर उसे चिट्ठी मिली ही न हो..? शायद वो चिट्ठी के बारे में कुछ जानता ही न हो..? तुम खुद ही सोचो ऐसा कैसे मुमकिन है ? मेरी समझ से तो बाहर है – कोई इतना बेरहम कैसे हो सकता है ? एक शब्द तक नहीं लिखा ! आप अपने घर के पालतू के साथ इससे बेहतर पेश आते हैं..! कहीं किसी ने ज़रुर मेरे खिलाफ़ कान भरे हैं..। ’ वो रोते-रोते मेरी तरफ़ मुड़ी और पूछा- ‘तुम्हे क्या लगता है ?’
‘सुनो निंफिया, मैं कल उससे मिलने जा रहा हूं..।’
‘क्या सच ?’
‘मैं उससे ये हर सवाल पूछूंगा..उसे तुम्हारे बारे में सबकुछ बताऊंगा..।’
‘अच्छा ?’
‘तुम एक और चिट्ठी लिखो, निंफिया..देखो ना मत करना ! वो कैसे नहीं सुनेगा, उसे मानना ही होगा- ’
‘नहीं मेरे दोस्त ! ’ उसने टोका..। ‘बहुत हो गया! अब मेरी ओर से कोई कोशिश नहीं---बस ! न मैं उसे जानती हूं, न प्यार करती हूं..। मैं....उसे भूल जाऊंगी..। ’
इससे आगे वो एक शब्द नहीं बोल पाई..।
‘शांत हो जाओ! यहां बैठो, निंफिया,’ उसे बांह से पकड़कर बिठाते हुए मैं बोला..।
‘मैं शांत हूं..। फिक्र मत करो..। मुझे कुछ नहीं हुआ है..। आंसू ही तो हैं ! सूख जाएंगे..। तुम्हे ऐसा लगता है मैं उसके लिए जान दे दूंगी..?’
‘मेरा दिल भर आया: मैंने कुछ कहने की कोशिश की..लेकिन कह नहीं पाया..।’
‘सुनो,’ मेरा हाथ थामते हुए वो बोली..। ‘मुझे बताओ, क्या तुम भी मेरे साथ यही सुलूक करते ? तुम तो ऐसी लड़की को कभी नहीं छोड़ते जो तुम तक खुद चलकर आती? उसके वजूद को यूं गाली तो नहीं देते तुम ? तुम समझते कि वो दिल के हाथों मजबूर है... ’
‘निंफिया!’ ज़ज़्बातों पर काबू नहीं रहा और मैं रो पड़ा..। ‘निंफिया, मुझे यूं दर्द न दो! मेरा दिल घायल है..तुम जान ले लोगी मेरी..! निंफिया ! अब खामोश रहना मुश्किल है..।’
‘ऐसा कहते-कहते मैं उठ गया..। उसने मेरा हाथ पकड़ लिया..और हैरानी भरी आंखों से मेरी ओर देखा..।
‘क्या हुआ है..?’ आखिरकार वो बोली..।
‘सुनो.. ’ मैंने संभलते हुए कहा..। ‘सुनो..शायद मैं पागलों जैसी बात कर रहा हूं ! मैं जानता हूं ये कभी मुमकिन नहीं हो सकता, लेकिन अब खामोश रहना मुश्किल है..। तुम्हें दर्द में नहीं देख सकता..। लेकिन वादा करो तुम मैं जो कहने जा रहा हूं, उसके लिए मुझे माफ़ कर दोगी..। ’

‘पहेलियां मत बुझाओ..।’ अपनी पलकों को ऊंगलियों से पोंछते हुए मैंने उसे देखा..। उन आंखों में गहरा सवाल था..।
‘प्लीज़ बताओ क्या बात है..?’
‘मैं जानता हूं कि कभी कामयाब नहीं हो सकता लेकिन फिर भी इश्क तो तुमसे है, निंफिया..! हां...इश्क तो है...’। हाथ झुलाते हुए मैं बोला..।
‘क्या तुम आगे भी सुन पाओगी..?’
‘ह...म..।’ जवाब में उसने सिर्फ गहरी सांस ली..।
‘पहले ये सिर्फ पसंद थी, निंफिया, लेकिन अब..अब ! इस वक्त मैं उसी हालत में हूं जैसी तुम उस वक्त थीं जब अपने घर की दहलीज़ लांघकर उसके पास जा रही थी..। या शायद उससे भी ख़राब..। ’
‘ये तुम क्या कह रहे हो..! मेरी तो कुछ समझ में नहीं रहा..। मैं तो न जाने क्या-क्या कह गई...लेकिन तुम.. ’
और निंफिया असमंजस में फूट पड़ी..। उसके गाल लाल हो गए..उसने आंखें झुका लीं..।
‘सारा कुसूर मेरा है..मैंने तुम्हारे साथ धोखा किया है..नहीं, नहीं मेरा भी क्या कसूर है..मैं महसूस कर सकता हूं..बल्कि जानता हूं कि ग़लत नहीं हूं..देखो, मैं तुम्हे चोट नहीं पहुंचा सकता..तुमने मुझे दोस्त माना लेकिन मैं उस भरोसे पर खरा नहीं उतर पाया..। मेरे आंसुओं को बहने दो..वो सूख जाने के लिए ही बने हैं..’
‘हे मेरे भगवान..प्लीज़ बैठ जाओ..। ’मुझे बिठाने की कोशिश करते हुए वो बोली..।
‘नहीं निंफिया, यहां अब और रुकना बेमानी है, हम शायद कभी न मिलें..। लेकिन उससे पहले दिल की बात कहना ज़रूरी है..। सिर्फ इतना ही है कि तुम्हे कभी मेरा हाल ए दिल पता नहीं चलता..। मुझे इसे राज़ बनाए रखना चाहिए था..। लेकिन अब तुमने ज़िक्र छेड़ा है..तो तुम चाह कर भी मुझे खामोश नहीं रख पाओगी..।’
‘नहीं..लेकिन मैं चाहती भी नहीं तुम खामोश रहो..।’ बेचारी निंफिया बमुश्किल अपनी हैरानी छिपाने की पूरी कोशिश कर रही थी..।
‘लेकिन मैं खुद यहां से भाग जाना चाहता हूं..। तुम्हारा प्यार ठुकराया गया है, निंफिया..रो तुम रही हो और पिघल मेरे भीतर कुछ रहा है....’
‘जल्दी बोलो, फिर मुझे भी कुछ कहना है..।‘
‘जानता हूं, तुम्हारे मन में मेरे लिए सिर्फ हमदर्दी है..सिर्फ हमदर्दी..। लेकिन जो हो गया उसे वापस तो नहीं लिया जा सकता..। अब तुम जानती हो कि मैं तुमसे प्यार करता हूं..। चलो ठीक है, अब सुनो..। जब तुम अभी बैठकर रो रही थीं..मेरे मन में ख्याल आया (जानता हूं,ये कभी मुमकिन नहीं है..।)...मुझे लगा..मुझे लगा कि तुम्हें अब उससे प्यार नहीं है..। पिछले रोज़ और उससे पिछले रोज़ निंफिया—मुझे लगा कि शायद तुम्हे भी मुझसे प्यार है..। तुमने खुद जो कहा उससे कुछ-कुछ ऐसा ही लगता है..। और क्या ? बस यही कहना था..। मेरे लिए इतना ही काफी है कि हम दोस्त हैं..। मेरे पास यूं भी तुम्हे देने के लिए कुछ नहीं है..। लेकिन प्वाइंट ये नहीं है...(ओह खुदा, मुझे खुद नहीं पता मैं क्या कह रहा हूं..) तुम चाहे जिसे चाहो.मेरा प्यार बरकरार है..। अगर तुम उसके साथ ज़िंदगी की राह पर चली भी जाओ तो भी तुम्हे याद रहेगा कि तुम्हारे बेहद करीब से कभी एक धड़कता हुआ दिल गुज़रा था..। ऐसा दिल जिसमें सिर्फ और सिर्फ तुम थीं... ’
‘प्लीज़, मत रोओ..।’ तपाक से उठते हुए निंफिया बोली..। ‘उठो, मेरी बात सुनो..। चलो यहां से चलते हैं..। ’ रूमाल से आंसू पोंछते हुए वो बोली..। ‘लेकिन एक बात मैं भी कहना चाहती हूं..। देखो, मैं तुम्हे धोखा नहीं देना चाहती..। भले ही उसने मुझे छोड़ दिया हो लेकिन मुझे तो उसी से प्यार है..। फिर भी मैं समझ सकती हूं तुम पर क्या गुज़री होगी जब मैं तुम्हारे प्यार पर हंस रही थी, कैसे मैंने तुम्हे कह दिया कि तुम मुझसे प्यार नहीं करते..। मैं क्यों नहीं समझ पाई ? आखिर मैं कैसे नहीं समझ पाई..। लेकिन मैंने भी मन बना लिया है.. ’
‘सिर्फ तुम्हारी तकलीफ की वजह बन रहा हूं..हमेशा के लिए चला जाऊंगा..। मैं नहीं चाहता तुम्हारे ग़म में मेरा ग़म भी शामिल हो जाए..गुड बाय..! ’
‘सुनो, प्लीज़ रुक जाओ..। जानती हूं प्यार पर तो किसी का बस नहीं..। शायद अब भी उससे प्यार करती हूं लेकिन फिर भी आगे तो बढ़ना ही होगा..। सच पूछो तो मुझे उससे अब नफ़रत है..। वो अपनी बेरुख़ी से मेरे दिल को ज़ख्म दे रहा हो..और तुम्हे देखो, तुम मेरे सामने आंसुओँ से भीगे हो..। उसने मुझे कभी चाहा ही नहीं..जबकि तुम सच्चा प्यार करते हो..। मैं तुम्हारे साथ हूं..। हां, मैं तुम्हे प्यार करती हूं..उतना ही जितना तुम..। क्योंकि तुम उससे ज़्यादा भले हो..क्योंकि तुम्हारा दिल नेक है..क्योंकि... ’
वो इस कदर भावावेश में थी कि आगे कुछ नहीं कह पाई; उसने मेरे कंधों पर सिर टिकाया, फिर छाती पर..और फफक पड़ी..। मैंने उसे समझाया, बहलाया लेकिन उसके आँसू नहीं थमे..। सिसकियों के बीच वो रह-रहकर कहती रही- ‘बस..अब और नहीं..मैं ठीक हूं...’ आखिरकार आंसुओँ की ये बरसात थमी, उसने आंखें पोंछी और हम टहलने लगे..। मैंने कुछ कहना चाहा लेकिन उसने खामोश रहने का इशारा किया..। काफी देर तक सिर्फ खामोश सफेद रात..और हमारे कदमों की आहट...काफी देर बाद उसने जीवन ऊर्जा बटोरी और बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ा..।
‘देखो बात ऐसी है...’ उसकी आवाज़ कांप रही थी लेकिन फिर भी उसमें कुछ ऐसा था जो मीठी छुरी की तरह दिल के पार हो रहा था..। ‘तुम्हे लगेगा मैं मिनट भर में बदल जाने वालों में से हूं..। लेकिन मैंने पूरा साल एक एक लम्हा उसका इंतज़ार किया..भगवान की कसम है किसी और का ख्याल..एक पल के लिए भी नहीं आया..। खुदा उसके गुनाह माफ़ करे लेकिन मैं नहीं कर सकती..। उसे मेरी कद्र ही नहीं है..। लेकिन मैं भी सिर्फ उसी को प्यार कर सकती हूं जो मुझे समझे क्योंकि मैं खुद भी ऐसी ही हूं..। बहुत हुआ..वैसे देखा जाए तो जो हुआ ठीक ही हुआ..मुझे वक्त रहते उसका असली चेहरा तो पता चल गया..। खैर अब खत्म हुई ये कहानी..। और कौन जाने... ’ मेरे हाथों को हाथों में लेते हुए वो बोली..। ‘शायद मेरा प्यार ही वहम रहा हो..। शायद मुझे घर में कभी आज़ादी नहीं मिली..इसलिए ? लेकिन...छोड़ो.. ’ इतना कहकर निंफिया की सांसे फिर टूटने लगीं..। भर्राए गले से बमुश्किल अल्फाज़ निकल पाए..। ‘मैं तुम्हे बस इतना बताना चाहती हूं---बावजूद इसके कि मेरे प्यार पर मेरा बस नहीं..तुम कहते हो---अगर ये प्यार हमेशा यूं ही रहेगा..तो हम ज़िंदगी भर भी साथ चल सकते हैं..। ’
‘निंफिया..!’ सिसकियों के बीच न जाने कैसे मेरे गले से आवाज़ निकल रही थी..। ‘निंफिया, ओ, निंफिया..!’
‘बस-बस बहुत हुआ..।’ उसके लिए संभलना मुश्किल हो रहा था..। ‘तुम्हे नहीं लगता जो कहा जाना चाहिए था..वो कहा जा चुका है..? तुम भी खुश हो—मैं भी खुश हूं..इसलिए अब ग़म के बारे में एक भी बात नहीं..भगवान के लिए अब हम इस बारे में बात नहीं करेंगे..। ’
‘सही कहा तुमने ! जब दोनों खुश हैं तो चलो खुशी की बात करें..।’
हम दोनों में से कोई नहीं जानता था क्या बात करें: हम साथ हंसे, हम साथ रोए..हज़ारों बेतुकी बातें कीं; एक वक्त हम रेल की सुरंग के माथे पर बने पैराफीट पर जाकर खड़े हो गए..। फिर सुरंग को पार कर जंगल से गुज़रती पटरी पर हाथ पकड़कर चलने लगे..। फिर दोबारा उस ठंडी सड़क पर पहुंच गए..। हां, उस रात बच्चे ही तो थे हम दोनों..!
‘अभी तो मैं अकेला रहता हूं, निंफिया,’ मैंने उससे कहा..। ‘लेकिन कल ! मेरे पास तुम्हे देने के लिए कुछ नहीं है निंफिया..लेकिन प्यार तो इससे परे की चीज़ है..।’
‘हां, किसी राजकुमार के साथ ज़िंदगी बिताने की हसरत यूं भी नहीं है मुझमे..। मैं आम घर की लड़की हूं..। जीने के लिए कुछ तो कर ही लेंगे हम..।’
‘हम दादू को साथ रख लेंगे..।‘
‘हां, ये तो करना होगा—हम साथ रहेंगे—तुम कल ही आ जाओ..।’
‘तुम्हारे यहां ? लेकिन कैसे ?’
‘हमारे घर की ऊपरी मंज़िल खाली है समझो..। वहां एक बूढ़ी आंटी रहती थीं लेकिन बहुत दिनों से नहीं आईं..। मुझे पता है दादू भी एक नौजवान को किराएदार रखना चाहते हैं..।’
मैने पूछा-‘लेकिन नौजवान ही क्यों ? ’
‘क्योंकि मैं बूढ़ा हो गया हूं, निंफिया मैं अब तुम्हारे लिए लड़का ढूंढ़ रहा हूं..।’ अब वो दादू की नकल कर रही थी ..।
‘ओ, निंफिया !’
और हम दोनों हंसने लगे..।
हम मानो बौराए हुए से उस सड़क पर घूम रहे थे..। पागलपन या नशा सवार था..। हम नहीं जानते थे, हमें क्या हो रहा था..। बीच-बीच में किसी मोड़ पर अचानक बातें करने के लिए रुक जाते..और फिर चलने लगते..शायद ऊपरवाला भी नहीं जानता था हम कहां पहुंचना चाहते थे ; कभी आंसू, फिर हंसी..। फिर अचानक उसे घर जाने की याद आई..। मैंने रोका नहीं सिर्फ उसे घर तक छोड़ने की पेशकश की..। हम घर के लिए बढ़े..करीब पौने घंटे के बाद हम दोबारा उन्हीं सीढ़ियों पर थे..। यहां वो पल भर के लिए फिर रुकी और उसकी आंखें भर आईं..। मैं एक बार फिर जड़ होने को था...तभी उसने फिर से मेरा हाथ थामा और मुझे तकरीबन खींचते हुए आगे बढ़ चली..।
‘हम बहुत लेट हो गए, मुझे लगता है हमें अब ऐसा बचपना छोड़ देना चाहिए..। ’
‘लगता नहीं कि आज की रात सो पाऊंगा..। मैं तो आज घर नहीं जा रहा..।’
‘नींद तो मुझे भी नहीं आएगी..लेकिन घर तो जाना होगा..। चलो मुझे छोड़कर आओ..।’
‘इस नीले आसमान की तरफ़ देखो, निफिया..।’ मैंने चलते-चलते ही ज़िक्र छेड़ा..। ‘कल का दिन खूबसूरत होगा..क्या तुम इस दूधिया बादल को देख रही हो, कैसे चांद को ओट दे रहा है...’
लेकिन निंफिया ने बादल की तरफ़ नहीं देखा; वो ऐसे मूक खड़ी रही..मानो कोई बुत हो; मिनट भर बाद वो मेरे करीब आ गई ..। उसके हाथ मेरी हथेलियों के बीच कांप रहे थे; मैंने उसकी तरफ़ देखा..अब वो और करीब आ गई थी..।
उसी लम्हे में एक नौजवान हमारे पास से गुज़रा..। चलते-चलते वो अचानक रुक गया, पल भर के लिए उसने हमें देखा और फिर कुछ कदम आगे की तरफ़ बढ़ाए..। मेरा दिल ज़ोरों से धड़कने लगा..।
‘ये कौन है निंफिया ?’ मैंने दबी आवाज़ में पूछा..।
‘ये वही है,’ उसने धीमे से कहा..। अब वो मेरे और भी करीब थी..। उस सर्दी में हमारी सांसों की भाप हवा में घुलने से पहले एक दूसरे में मिल रही थी ...मेरे लिए खड़ा रहना भी मुश्किल हो रहा था..।
‘निंफिया, निंफिया ! ये तुम्ही हो ! ’ अगले मोड़ से अचानक आवाज़ मेरे कानों में पड़ी..। वो नौजवान अब हमारी तरफ आ रह था..।
उसकी चीख कैसी थी इसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है ! कैसे वो मेरी बांहों से छिटककर उसकी तरफ़ लपकी ! मैं खड़ा सिर्फ देखता रह गया..। अभी वो उसतक पहुंची नहीं थी कि अचानक फिर मेरी तरफ़ मुड़ी और पलक झपकते ही वो फिर मेरे बगल में थी..। मुझे पता भी नहीं चला कब उसने अपनी बांहें मेरे इर्द-गिर्द डाल दीं और मेरा माथा चूम लिया..। फिर बिना एक शब्द कहे वो दोबारा उसके पास गई..उसका हाथ थामा और खींचकर अपने घर की तरफ़ ले चली..।
मैं लंबे वक्त तक उन्हें देखता रहा..। आखिर में वो मेरी नज़रों से ओझल हो ही गए..।


क्रमश:

1 टिप्पणी:

  1. U wrote Iisk to tum se hai Nimphyia.
    Ab tum bataooge kya?
    Ye Iisk pyaar byarr kitni ladkiyoon se or kitni baar hua haiiiiiiiiiiiiiiiii.

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