शुक्रवार, जनवरी 29, 2010

एक नज़्म..



मेरे दिल की राख कुरेद मत, उसे मुस्कुरा के हवा न दे..
ये चिराग फिर भी चिराग है, कहीं तेरा हाथ जला न दे..

नए दौर के नए ख्वाब हैं, नए मौसमों के गुलाब हैं..
ये मोहब्बतों के चिराग हैं, इन्हें नफ़रतों की हवा न दे..

ज़रा देख चांद की पत्तियों ने, बिखर-बिखर के तमाम शब
तेरा नाम लिखा है रेत पर कोई लहर आके मिटा न दे..

मैं गज़ल की शबनमी आंख से, ये दुखों के फूल चुना करूं
मेरी सल्तनत मेरा फ़न रहे, मुझे ताज ओ तख्त खुदा न दे..

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