रविवार, जनवरी 31, 2010

कुछ अशआर..



आंधियां आती थीं लेकिन कभी ऐसा न हुआ,
खौफ़ के मारे जुदा शाख़ से पत्ता न हुआ..

वक्त की डोर को थामे रहे मज़बूती से
और जब छूटी तो अफ़सोस भी इसका न हुआ..

रात को दिन से मिलाने की हवस थी हमको
काम अच्छा न था, अंजाम भी अच्छा न हुआ..

खूब दुनिया है कि सूरज से रकाबत (दुश्मनी) थी जिन्हें
उनको हासिल किसी दीवार का साया न हुआ..

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