शुक्रवार, फ़रवरी 05, 2010

कुछ अशआर..




दर्द के रिश्ते न कर डालें उसे बेकल कहीं
हो गई कुछ बस्तियां इस साल भी जल-थल कहीं..

रात की बेरंगियों में हम बिछड़ जाएं न दोस्त,
हाथ मेरे हाथ में दे और यहां से चल कहीं..

आज सूरज खुद ही अपनी रोशनी जल गया,
कह रहा था राज़ की ये बात इक पागल कहीं..

ये खबर होती तो करता कौन बारिश की दुआ,
प्यास से हम मर गए रोता रहा बादल कहीं..

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