रविवार, फ़रवरी 28, 2010

एक रंग मेरा भी..


हमारे यहां पहाड़ों में कहावत है: इंद्रधनुष के रंगों में सबका एक अपना रंग होता है..। मिथक लेकिन खूबसूरत कल्पना..। नहीं लेकिन फिर हर रंग सबका क्यों नहीं हो सकता ? ये सोच ज़्यादा समाविष्ट लगती है..। लेकिन वक्त के दरिया में कुछ द्वीप ऐसे आते हैं..जिनमें आप नितांत एकाकी विचरते हैं..। ये वक्त अपनी समग्रता को देखने का होता है..। ऐसे ही द्वीप पर फ़िज़ाओं में फैले गुलाल के साथ कितना एकाकार हूं ये कहना तो मुश्किल है..लेकिन एक रंग मेरा भी है..जिसे ‘अपना’ कह सकता हूं; जिंदगी की कैनवॉस ने सुबह, दोपहर, सांझ के कितने रंग दिखाए..कुछ धुल गए..। चेतना की स्लेट को समय पोंछता गया और जो पक्के रंग रह गए..उन्हीं के साथ मना रहा हूं ये होली..!



उदासी भी

एक पक्का रंग है जीवन का

उदासी के भी तमाम रंग होते हैं

जैसे

फ़क्कड़ जोगिया

पतझरी भूरा

फीका मटमैला

आसमानी नीला

वीरान हरा
बर्फ़ीला सफ़ेद

बुझता लाल

बीमार पीला

कभी-कभी धोखा होता है

उल्लास के इंद्रधनुषी रंगों से खेलते वक्त

कि कहीं वे
किन्हीं उदासियों से ही
छीने हुए रंग तो नहीं हैं ?

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