शुक्रवार, मार्च 26, 2010

गज़ल


मिली हवाओं में उड़ने की वो सज़ा यारो,
कि मैं ज़मीन के रिश्तों से कट गया यारो..

वो बेकरार मुसाफिर, मैं रास्ता यारो,
कहां था बस में उसको रोकना यारो..

मेरी कलम पे ज़माने की गर्द ऐसी थी,
कि अपने बारे में कुछ भी न लिख सका यारो..

तमाम शहर ही जिसकी तलाश में गुम था,
मैं उसके घर का पता किससे पूछता यारो..

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