रविवार, अप्रैल 11, 2010


आने वाली आहट को पढ़ने के लिए जीनियस होने की ज़रुरत नहीं..। हमारे पास पैर पसारता मध्यम वर्ग है, उपभोक्तावाद के आक्रामक लालच से लबरेज़..। औद्योगीकरण के दौर में पश्चिम से इतर..हमारे पास उसकी ये अंधी प्यास मिटाने के लिए उपनिवेश नहीं हैं..। इसलिए हमारा निज़ाम स्व-उपनिवेशवाद के लिए मजबूर है..। हमारा सिस्टम खुद को ही निगलने पर आमादा है..। बाज़ार जो लालच पैदा कर रहा है (जिसे अब राष्ट्रीयता का रंग भी दिया जाने लगा है..।) उसकी क्षुधा सिर्फ जल, जंगल और ज़मीन को हड़पने से ही बुझ सकती है..। पेप्सी और कोक जगत का ‘यंगिस्तान’ भले ही अंजान हो..लेकिन ये दौर ऐसा है जब हम आज़ाद भारत में पहली बार किसी अलगाववादी आंदोलन को कामयाब होते देख रहे हैं..। मध्यम और ऊपरी वर्ग बाकी देश से कटकर दुनिया के अमीर तबके में शामिल होने को बेताब है..। कोयला, बॉक्साइट, पानी, बिजली..कौन सा संसाधन है, जिस पर उनका कब्ज़ा नहीं..। अब उन्हें ज़्यादा कारें, बम, कंप्यटर बनाने के लिए ज़मीन चाहिए..। इसीलिए दंतेवाड़ा में जो हुआ वो एक सीधी जंग का हिस्सा है..। ऐसी जंग जिसमें दोनों तरफ़ के लोग अपने हथियार और तरीके मर्ज़ी से चुन रहे हैं..। सरकारों और MNCs के पास मनमर्ज़ी के कोर्ट आदेश हैं, वर्ल्ड बैंक के फ़लसफ़े हैं, जेब मे कैद नेता हैं और ऐसी पुलिस है जो हर कड़वी हकीकत लोगों के गले से उतारने को तैयार है..। बदलाव की सोच रखने वाले अभी तक धरने, भूख हड़ताल, सत्याग्रह जैसे तरीके अपनाते रहे हैं..। कोर्ट और मीडिया (जिसे वो अब तक मददगार समझते थे) उनका सहारा थे..। लेकिन अब बंदूक का रास्ता इख्तियार करने वालों की तादाद बढ़ रही है..। अगर ;ग्रोथ रेट’ और ‘सेंसेक्स’ ही तरक्की के बेरोमीटर बने रहे तो इमकान ऐसे ही रहने जा रहे हैं..। दीवार पर लिखी इबारत को पढ़ना इतना कठिन नहीं है लेकिन नक्सलवाद के परिप्रेक्ष्य में सरकारी देशभक्ति से अलग आप कुछ भी सोचते हैं, तो ‘अनैतिकता’ का लेबल चस्पां कर दिया जाता है..। जबकि ‘नैतिकता’ भ्रामक अवधारणा है..जो मौसम की तरह रुख़ बदलती है..। हकीकत ये है कि अहिंसक आंदोलन लोकतंत्र का हर दरवाज़ा खटखटा चुके हैं..। दशकों से उन्हें अवहेलना और दमन के सिवा कुछ नहीं मिला..। भोपाल गैस कांड के पीड़ित हों, या फिर अपनी ज़मीन के लिए लड़ रहे नर्मदा बचाओ आंदोलन से जुड़े लोग, नज़र दौड़ाकर देखने भर की देर है..देश में मिसालों की कमी नहीं..।
आखिर आज़ाद हिंदुस्तान में क्या ग़लत रह गया ? लोग अगर रहनुमाओं को जगाने के तरीकों में बदलाव की सोचें तो हैरानी क्यों ? जब सोनिया गांधी को वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम में सत्याग्रह की वकालत करनी पड़ जाए तो हमें कई सवालों पर सोचने की ज़रुरत है..। मिसाल के लिए क्या लोकतंत्र के इस ढांचे में असहयोग जैसा कोई मूवमेंट मुमकिन है..? ख़ासकर तब जब मीडिया कॉर्पोरेट की दुनिया में कठपुतली बन चुकी है, जब भूख हड़तालें, दलितों की भलाई ‘सेलिब्रिटी पॉलिटिक्स’ बन चुकी है ? उड़ीसा के कालाहांडी के आदिवासी भूख हड़ताल पर बैठ जाएं, नई दिल्ली में इससे किसी फर्क पड़ता है..? उन बिचारों के पास यूं भी खाने को कुछ नहीं है..।
ये दौर बदल चुका है..। ये NGOs का ज़माना है..। एक नई किस्म के कागज़ी शेर..। उन्हीं की मेहरबानी है कि अब हमारे यहां आंदोलन भी स्पॉन्सर्ड होने लगे हैं..। टाटा के भी 2 धनकुबेर ट्रस्ट है जो परोक्ष रूप से ही सही जन आंदोलनों की फंडिंग करते हैं..। फिर क्यों हैरानी हो जब सिंगूर नंदीग्राम की तुलना में कहीं कम सुलगे? वैसे टाटा और बिरला का गांधी के आंदोलन से भी नाता रहा है..? शायद उन्हें ही हिंदुस्तान की पहला एनजीओ कहना सही होगा..। NGOs के सर्वेक्षणों का शोर आपको हर कहीं सुनाई देगा..लेकिन सरकार को उनसे कोई ख़ास कोफ्त नहीं..। ये आंदोलनों के भी प्रोफेशनल होने का ज़माना है..। एक वक्त था जब हक की लड़ाई अदालतों में जाकर मंज़िल पा लेती थी..। लेकिन पिछले एक दशक की जजमेंट्स उठाकर देख लीजिए..देश का सबसे ताकतवर इंस्टीच्यूशन किसके साथ है, ये साफ हो जाएगा..।
ऐसे हालात में एक आम इंसान के लिए क्या रास्ता बचता है ? ये सही है कि मसला महज़ हिंसा बनाम अहिंसा का नहीं है..। ऐसी भी राजनीतिक विचारधाराएं भी रही हैं जो सिर्फ आखिरी रास्ते के तौर पर ही हथियार उठाने में यकीन रखती हैं..। लेकिन इनके दमन की दास्तान भी लंबी है..। यकीनी तौर पर नक्सलवाद का दामन थामने वाले जानते हैं वो क्या चुन रहे हैं..। जिस वक्त आप ये राह इख्तियार करते हैं, दुनिया आपके लिए सिर्फ स्याह और सफेद में बंट जाती है..। लेकिन जब लोगों के पास और कोई चारा ही न बचा हो तो उनकी भर्त्सना करना कितना जायज़ है..? क्या ये मानना बेवकूफी नहीं होगी कि अगर नंदीग्राम का आंदोलन भी महज़ धरने और क्रांतिकारी गीतों तक ही रहता तो भी पश्चिम बंगाल की सरकार कदम पीछे हटाती ? हमारे वक्त की दिक्कत ये है कि सिस्टम के साथ चलने का मतलब निष्क्रिय होना है..और ज़िंदा रहने की कीमत भारी है..। लेकिन इस कीमत को मर्ज़ी से चुनने वाले लोगों को ग़लत कैसे कहा जाए ?
दुनिया में अजीब चीज़ें हो रही हैं..। कुछ वक्त पहले सउदी अरब में बर्फ गिरी..। दिन में उल्लू निकल आए..। चीन की कम्युनिस्ट सरकार ने लोगों को निजी संपत्ति का अधिकार दे दिया..! माओवाद के असली वशंज भी 21वीं सदी के सबसे बड़े कैपेटिलिस्ट होने जा रहे हैं..। हम अपने लोकतंत्र से अलग उम्मीद भला कैसे रखें ? कभी-कभी हैरानी होती है..। क्या ‘विकसित पूंजीवाद’...’advanced capitalism’ ही हर क्रांति की आखिरी नियति है..?
ज़रा सोचकर देखिए- फ्रांसीसी क्रांति, रूसी क्रांति, चीनी क्रांति, वियतनाम युद्ध, साउथ अफ्रीका का अश्वेत संघर्ष..यहां तक हमारे अपने यहां गांधी का आंदोलन भी..
क्या दुनिया को चलाने में इंसानियत की रचने की क्षमता महज़ इतने पर ही ख़त्म हो जाती है..?
बतौर सभ्यता या सिस्टम हम जितना भी पवित्र होने का दावा कर लें..असलियत यही है कि हमारे पास विकल्प कम हैं..। छतीसगढ़ में ही हालात गृहयुद्ध से कम नहीं हैं..। यहां के आदिवासियों के साथ सरकार का रवैया बुश की नीति से उठाया गया लगता है: अगर आप हमारे साथ नहीं हैं तो आतंकियों के साथ हैं..। नक्सलियों के सामने सरकार गरीब आदिवासियों को हथियार थमा रही है जबकि कश्मीर, उत्तर-पूर्व और बाकी हिस्सों में ये रणनीति पहले ही बुरी तरह पिट चुकी है..। हज़ारों आदिवासी उन जगहों को छोडऩे को मजबूर हैं जहां वो सदियों से रह रहे थे..। उनकी ज़मीनों पर टाटा, एस्सार जैसी कंपनियों के MOUs का काला साया है..। क्या छत्तीसगढ़ को दुनिया के सबसे ज़्यादा तबाह देशों में से एक कोलंबिया के रास्ते पर नहीं झोंका जा रहा है..? वहां भी सभी की नज़रें लेफ्ट गुरिल्ला और सरकार के बीच संघर्ष पर टिकी हैं और इसका फायदा उठाकर MNCs वहां की प्राकृतिक संपदा को चुपचाप लूट रहे हैं..।
कौन इनकार कर सकता है कि 76 परिवार सूने हुए हैं..। आसरे छिने हैं, उम्मीदें टूटी हैं..। चश्मे उतारकर एक नागरिक की तरह सोचकर देखें तो क्या वो भी कैपिटिलिज़्म बनाम कम्युनिज्म की जंग का ही चारा नहीं बने ? घड़ियाली आंसू बहाए जा रहे हैं..अहिंसा और देशभक्ति का पाठ पढ़ाते टीवी एंकर्स के गले सूख रहे हैं..। लेकिन जंगलों के बीच बसे उस भारत के लिए वो 76 जवान एक शोषण की निशानी थे..।
माओवादी बर्बर हैं, कोई इनकार नहीं कर सकता..। जनसमर्थन पर उनके अकेले का हक नहीं है..। लेकिन फिर सरकार भी ये दावा नहीं कर सकती..। ये मानना मुश्किल है कि कोई भी गुरिल्ला मूवमेंट स्थानीय समर्थन के बिना ज़िंदा रह सकती है..। और माओवादियों के लिए समर्थन बढ़ता ही नज़र आ रहा है..। ये बहुत कुछ कहता है..। शायद लोगों के पास शैतान और राक्षस का ही विकल्प शेष है..।
हो सकता है जिस दिन उनके हाथ में सत्ता आए वो मौजूदा व्यवस्था से भी बदतर निकलें..(हालांकि पहले से ये मानने की भी कोई वजह नहीं है) अगर ऐसा होगा तो उनके खिलाफ़ लड़ने वाले भी पैदा होंगे..। लेकिन इस दौर की हकीकत तो यही है कि माओवादी..मज़हबी या प्रांतीय पहचानों से बढ़कर किसी मुद्दे पर सिस्टम को कामयाब चुनौती दे रहे हैं..।
‘POWER CORRUPTS’..माओ का ये कथन वाकई शाश्वत लगता है..। मंडेला के सियासी वारिसों को IMF के हाथों बिकता देखिए..या ब्राज़ील के वामपंथी राष्ट्रपति की आर्थिक नीतियों पर गौर फरमाइये..। किसने सोचा था कि ऐसा होगा ? लेकिन क्या इसका मतलब ये आंकें कि यहां के लोगों को संघर्ष ही नहीं करना चाहिए था..? ज़ुल्म सह रहे लोग क्या सिर्फ इसलिए लड़ना छोड़ दें क्योंकि उन्हें अगुवाई के लिए ‘संत’ नहीं मिलते..?

5 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छा । बहुत सुंदर प्रयास है। जारी रखिये ।

    आपका लेख अच्छा लगा।


    अगर आप हिंदी साहित्य की दुर्लभ पुस्तकें जैसे उपन्यास, कहानी-संग्रह, कविता-संग्रह, निबंध इत्यादि डाउनलोड करना चाहते है तो कृपया अपनी हिंदी पर पधारें । इसका पता है :

    www.apnihindi.com

    जवाब देंहटाएं
  2. बेनामी12 अप्रैल, 2010

    you wrote very well indeed....Foucault's concept of power/knowledge truly does claim that those who have knowledge have power...and power generates kowledge.It is such an ancient game, right from the times of Ramayana and Mahabharata. Sometimes it seems that we should accept this existentialism..but then we continue fighting.The nihilism creeps deep inside and yet we yearn and hope too for A Second Coming....The new power may be destructive but surely it will not belong to the gods of underworld...A revolt destroys and creats......The tragedy is that we, people of free India live in a virtual world of globalisation.We think we are cosmopolitan. we dont consider these people as our own countrymen...Nevertheless.........a good attempt on your part to at least think about our own people...a conciousness at least, if not full support being a patriot and so called good citizen of an anti-terrorist country.............

    जवाब देंहटाएं
  3. Me not at all an authority in philosophy but to the best of my knowledge Foucault’s concept of power draws on micro-relations without falling into reductionism because it does not neglect, but emphasizes, the systemic (or structural) aspect of the phenomenon.
    therefore it seldomly applies to the advent of naxalism in our society.
    Here not knowledge but bitter experiences are forcing people to wield gun for power.
    And the concept of 'power' is bent decisively to suit the needs of capitalism.
    Nihilism too can be constructive or destructive based upon the current socio-economic milieu of any society at a given point in history.
    n last part of your comments remind me of an often quoted statement of Mao; Intellectuals are idiots, but we need these idiots!
    The point is not of interpretation of the world, the point is to change it!

    जवाब देंहटाएं
  4. बेनामी14 अप्रैल, 2010

    ha ha ..........vry true dpk...i did nt mean 2 make philosophy of this stark reality thou..watever i said abt power nd knwlg obvisly blngd to upper strata f society, d capitalists..well i stl thnk the concpt applies evrywhr in dis wrld,the brkdwn of hegemonic pattrns here are result of conciousness ofcourse..i can nvr evr thnk a cncpt can evr be static. well, i knw tmse nhi jeet skti debate me, nd ofcrse it was an opinion nly.......As for Mao, i wud quote Nietzsche."there are no facts, only interpretations." Well change the world comrade...i m looking forward 2 it. even i m fed up of this world......wat say.....

    जवाब देंहटाएं
  5. can ny1 win from you, आखिर स्त्री हो! :-)

    जवाब देंहटाएं