शुक्रवार, अप्रैल 30, 2010

चंद अशआर..




दर ओ दीवार पे शक्लें सी बनाने आई,
फिर ये बारिश मेरी तन्हाई चुराने आई..

मैंने जब पहले पहल अपना वतन छोड़ा था,
दूर तक मुझको इक आवाज़ बुलाने आई..

आजकल फिर दिल ए बरबाद की बातें हैं वही,
हम तो समझे थे कि कुछ अक्ल ठिकाने आई..

दिल में आहट सी हुई रूह में दस्तक गूंजी,
किसकी खुश्बू ये मुझे मेरे सिराहने लाई..

5 टिप्‍पणियां:

  1. क्या बात है... बहुत खूब भाई...
    किसकी खुश्बू ये मुझे मेरे सिराहने लाई.

    भई वाह..

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  2. आपके अलफ़ाज़ रुह से निकलते हैं ! बहुत उम्दा ! गज़ब !

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  3. बेनामी11 मई, 2010

    ajkal fir dile barbaad ki baaten hai vahi.....hum to samjhe the kuch akl thikane ayi................AMAZING

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  4. क्या सूरजमुखी भाई.. हमभी समझे थे की झटके खा के आप की भी कुछ अकल हमारी तरह ठिकाने आ ही गयी होगी... पर आप भी ना....!!!
    कब सुधरबो बताए दो...????

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  5. हमने जब वादी ए गुरबत में कदम रखा था,
    दूर तक याद ए वतन आयी थी समझाने को.....!!!

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