शुक्रवार, जुलाई 23, 2010



कल के तालुक्कात पे रोया न तू न मैं,
लेकिन ये क्या के चैन से सोया न तू, न मैं..

कुछ इस अदा से आज वो पहलूनशीं रहे,
जब तक हमारे पास रहे, हम नहीं रहे..
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वो हमसफर था मगर उससे आशनाई न थी,
कि धूप-छांव का आलम रहा, जुदाई न थी..

अदावते थीं, तगाफुल था, रंजिशें थीं मगर,
बिछड़ने वाले में सबकुछ था, बेवफाई न थी..

बिछड़ते वक्त उन आंखों में थी हमारी गज़ल,
गज़ल भी वो जो किसी को कभी सुनाई न थी..

किसे पुकार रहा था वो डूबता हुआ दिन,
सदा तो आई थी लेकिन कोई दुहाई न थी..

4 टिप्‍पणियां:

  1. वाह.
    बहुत ही अच्छी गज़ल.
    'बिछडने वाले..' वाला शेर विशेष तौर पर पसंद आया.

    उपर वाले दो मतले भी बहुत अच्छे हैं.

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  2. किसी कारण से ब्लॉग 'follow' नहीं कर पा रहा हूँ.
    'url too large' का सन्देश आ रहा है..

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  3. अदावते थीं, तगाफुल था, रंजिशें थीं मगर,
    बिछड़ने वाले में सबकुछ था, बेवफाई न थी..

    बहुत खूब....बढ़िया गज़ल

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  4. बेनामी30 अगस्त, 2010

    sham se aankh me nami si hai......aj fir aapki kami si hai.....dafn kar do hame ki saanse mile, nabz kuch der se thami si hai..............

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