गुरुवार, सितंबर 02, 2010

डोको-डोको, डैंग-डैंग-1



कहानी
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“दीपक शर्मा, क्या कभी तुम आम इंसानों की तरह बर्ताव करोगे..।“ न्यूज़रूम में मेरे सबसे पक्के दोस्त मनीष ने परसों अचानक पूछ लिया..। जीने के लिए एक अजीब शर्त..। ऐसा नहीं कि ‘आम’ होने में मुझे कोई विरोध है..। मैं एक डरपोक इंसान हूं..। लेकिन क्या करूं, यहां मुझे पागल घोषित कर दिया गया है..। एक दूसरे दोस्त ने मेरा फोटो ब्लॉग में या फिर शायद ऑर्कुट पर सजाने के लिए मांगा..। “आखिर तुम इंटलेक्चवेल हो..।” उसका कहना था..। मैंने फोटो दिया, उसने लगाया भी..। ‘ऑफिस के सबसे बड़े पागल का चेहरा..। आज फ्री है, कल से टिकट लगेगा..!’ फोटो के नीचे लिखा था..।
हो सकता है ये सच हो..लेकिन शब्दों को तो ज़हीन होना चाहिए आखिर..। ना कहकर भी कह देने वाले जर्नलिस्टिक अंदाज़ का क्या हुआ..? मगर आज की पत्रकारिता में इस सब की जगह कहां..? मुझे इसपर भी ऐतराज़ नहीं: ऊपरवाला जानता है कि मैं ऐसा साहित्यकार तो कभी नहीं रहा कि दिमाग से जाता रहूं..। हां, मैंने कुछ कहानियां लिखी हैं..लेकिन कभी कोई छपी नहीं..। कुछ आर्टिकल्स पर भी हाथ आज़माया- लेकिन सब के सब लौटा दिए गए..। “इनमें मसाला नहीं है..।” तकरीबन हर संपादक का यही कहना था..।
खैर जहां तक सवाल पागलपन का है, मीडिया की दुनिया में हर रोज़ किसी को पागल डिक्लेयर किया जाता है..। और वो भी किस ज़ुबान में और किस प्रतिभा के साथ..। ये और बात है कि अब ये पागल भी आपके सयानों से ज़्यादा सयाने हो चले हैं..। मैं सोचता हूं सबसे सयाना वो है जो कम अज़ कम महीने में एक बार खुद को बेवकूफ कह सके..। खैर आज के ज़माने में ऐसे उम्दा बेवकूफ कहां मिलते हैं..? अब चीज़ों में इतना घालमेल है कि कौन बेवकूफ है और कौन सयाना, ये तय करना ही मुश्किल है..। और ये दुनिया ऐसी बेमकसद नहीं हुई है..। मैंने कहीं एक स्पेनिश कहावत के बारे में सुना था..। ढ़ाई सौ साल पहले फ्रांस में पहली बार पागलखाने बनाए गए..। “उन्होंने अपने सारे पागलों को एक घर में बंद किया है ताकि वो ये तय कर सकें कि वो खुद अक्लमंद हैं..।” सही भी है: किसी और को पागलखाने में डालकर आपकी बुद्धिमता साबित नहीं होती..। श्रीमान ए का दिमाग फिर गया है, इसका मतलब ये कतई नहीं कि हम दुरुस्त दिमाग हैं..।
लेकिन छोड़िए, मैं क्यों मुद्दे से भटक रहा हूं..? लेकिन शायद शिकायत ही मेरी दूसरी ज़ुबान बन चुकी है..। हमारी कामवाली भी मुझसे परेशान है..। वो ग़लत भी नहीं है..। इधर पिछले कुछ दिनों से मेरे साथ कुछ अजीब घट रहा है..। मेरी शख्सियत बदल रही है, मेरे सिर का दर्द भी बढ़ गया है..। कैसे कहूं..मुझे अजीब सी चीज़ें सुनाई देती हैं..। नहीं कोई रूहानी आकाशवाणी नहीं..। ऐसा लगता है जैसे कोई मेरे कानों में कह रहा हो- ‘डोको, डोको, डैंग, डैंग..!’
ये मुझे क्या हो रहा है..? अपना ध्यान बंटाना ही होगा..।


(क्रमश:)

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत कम तेरी तरह सच बोल पाते है व्यवसायिक तौर पर

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  2. बेनामी03 नवंबर, 2010

    कहीं पढ़ा था मैंने- 'मत रुक/ मत डर/ मत कर चिंता/चुहचुहाते माथे की/ दंत-क्षंत हाथों की/ उठा छैनी, चला हथौड़ा/ कि तेरी हर चोट, सत्य की चोट हो शिल्पी/ सत्य का उदगार...'

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