गुरुवार, सितंबर 02, 2010

डोको-डोको, डैंग-डैंग-2


आगे..
---------------------------------------------------------------------------------
ध्यान बंटाने के लिए ही शिमला गया..। इत्तफाकन वहां दूर के एक इसाई दोस्त के जनाज़े में शामिल हुआ..। उसके घर की कहानी तो खैर एक अलग दास्तान का मौजूं है..लेकिन इतना बताना ज़रुरी है कि उस परिवार के लोगों ने कभी कोई खास गर्मजोशी मुझे लेकर नहीं दिखाई..। अगर हालात का तकाज़ा नहीं होता तो मैं शायद कभी उस जनाज़े में नहीं जाता..। मैं जनाज़े में कब्रिस्तान तक गया..। बाकी लोग मुझसे कटे ही रहे..। पहनावे और शक्ल से किसी हिप्पी की तरह दिख रहा था मैं..।
‘पच्चीस साल बीत गए, जब आखिरी बार यहां आया था..।’ मेरे दिमाग में ख्याल कौंधा..। ‘कितनी मनहूस जगह है..।‘
वहां तकरीबन पंद्रह ताबूत थे..। शोक मनाने वालों के कई झुंड थे..। हर जगह अफ़सोस सच्चा था..नहीं कहा जा सकता..। कई लोग हंसते और गप्पें लड़ाते हुए भी देखे जा सकते थे..। लेकिन चर्च को भला इस पर क्यों शिकायत होने लगी..? इससे उनके खज़ाने भरते हैं..। लेकिन उस जगह की गंध, गंध...
निश्चित तौर पर मैं उस जगह का पादरी कभी नहीं होना चाहूंगा..।
मैं मुर्दा चेहरों को गौर से देखता रहा..। कुछ के चेहरों के भाव नर्म थे, कुछ के चेहरों पर कड़ुवाहट दर्ज थी..। कुछ के मुर्दा होंठो पर मंद-मंद मुस्कुराहट थी..। मुझे उनमें से एक का भी चेहरा पसंद नहीं आया..। ऐसे मंज़र आपके सपनों को डरावना बना देते हैं..।
रस्म अदायगी के वक्त मैं चर्च से निकलकर खुली हवा में आ गया..। दिन पर बादल हावी थे..लेकिन बारिश नहीं हो रही थी..। जून के हिसाब से देखा जाए तो ठंड भी कुछ ज़्यादा ही थी..। मैं कब्रों के बीच चलने लगा..। सी ग्रेड, बी ग्रेड और ए ग्रेड की कब्रें..। सी ग्रेड की कीमत 1500 रुपये..देखने में बेहद आम..। बाकी दोनों ग्रेड्स की कब्रें चर्च के नज़दीक वाले हिस्से में थीं..और ज़ाहिर है उन्हें बुक करवाने के लिए जेब ढीली करना लाज़िमी होता होगा..।
ज़्यादातर कब्रों की हालत दयनीय थी..। हर तरफ़ पानी ही पानी.! खैर, इस बारे में क्यों बात करें..? चलते-चलते मैं बाहर आ गया..। पास ही लकड़ियां और टूरिस्ट्स का सामान उठाने वाले कुलियों के लिए रैनबसेरा था..। थोड़ी दूर जाकर एक ठीक-ठाक रेस्तरां..। वहां लंच करने बैठे लोगों में से ज़्यादातर ऐसे थे जो मातमपुर्सी के लिए आए थे..। माहौल में हंसी-ठठ्ठा था..। मैंने भी सुबह से खाली पेट को भरने में देरी नहीं की..।
जब लाश को चर्च से कब्र तक लाया गया, मैं साथ ही था..। अर्थी या जनाज़े पर मुर्दे इतने भारी क्यों हो जाते हैं..? वो इसके लिए तरह-तरह की थ्योरीज़ देते हैं..जिनका विज्ञान से कोई ताल्लुक नहीं..। लेकिन फिर हमारे देश का यही तो हाल है..। सरकारी क्लर्क देश की सुरक्षा पर राय पेश करते हैं..इंजीनियर फिलॉसॉफी के गुरू हैं..और डॉक्टर धर्म की बात करते हैं..।
दफनाने के बाद बुलाए गए भोज में मैं नहीं गया..। आखिर मेरी भी कोई इज्जत है..। और अगर किसी वजह से उन्हें मुझे झेलना पड़ा तो इसका ये मतलब तो नहीं कि मैं उनके भोज में खुद को उनपर थोपूं..? लेकिन एक बात समझ में नहीं आई कि मैं कब्रिस्तान में ही क्यों रूक गया..? कब जाकर एक कब्र के पत्थर पर जाकर ख्यालों में डूब गया..पता ही नहीं चला..।
मेरी विचार श्रृंखला गेयटी थिएटर में लगी प्रदर्शनी से शुरू हुई और एबस्ट्रेक्ट आर्ट से होते हुए..हैरान होने की वजहों पर जाकर टिक गई..। हैरान होने के बारे में मेरे ख्याल कुछ यूं थे-
“ये बात सही है कि बात-बात पर हैरान होने वालों को अनाड़ी समझा जाता है और हर बात पर ठंडे बने रहने वालों को दुनिया सुलझा हुआ कहती है..। लेकिन ये सच नहीं है..। मेरे हिसाब से किसी बात हैरान न होने वाले हर बात पर आंखें फैलाने वालों से कहीं बड़े बेवकूफ हैं..।
और यूं भी किसी बात पर हैरान न होना करीब-करीब किसी भी चीज़ का सम्मान न करने जैसा है..। और सिर्फ बेवकूफ ही ऐसे हैं जो किसी भी चीज़ के लिए सम्मान न महसूस कर पाएं..। “लेकिन दुनिया में सबसे ज़्यादा कुछ चाहता हूं तो वो है औरों की नज़र में इज्जत..।“ दो रोज़ पहले ही तो एक दोस्त ने ये मुझसे कहा था..। ”
इससे आगे मेरे ख्यालों का सिलसिला टूट गया..। मुझे कब्रों पर लिखी इबारतें नहीं सुहाती..। ज्यादातर एक जैसी होती हैं..। मेरे बगल वाली कब्र पर जूठा सैंडविच पड़ा हुआ था..। मैंने उसे यूं ही उठाकर फेंक दिया..। आखिरकार वो रोटी नहीं सैंडविच था..। (हमारे धर्म में सिर्फ रोटी को फेंकना वर्जित है..।)
मुझे लगता है मैं वहां काफी देर तक बैठा रहा..। शायद मैं एक संगमरमर के बड़े से पत्थर पर लेट गया था..। ये कैसे हुआ मुझे नहीं पता लेकिन अचानक आसपास से हर तरह की आवाज़ें सुनाई देने लगी..। पहले मैंने नज़रअंदाज़ करने की कोशिश की..। लेकिन आहिस्ता-आहिस्ता बातचीत साफ होने लगी..। वो रहस्यमयी आवाज़ें दरअसल सुगबुगाहट थीं..जैसे बोलने वालों के मुंह पर तकिया रखा हो..लेकिन उन्हें सुनने में कोई दिक्कत नहीं थी..। मैं उठकर ध्यान से सुनने लगा..।

“जनाब, आपने पहले अपने वज़ीर को दो घर आगे बढ़ाया और उसके बाद घोड़ा..। एक साथ दो चालें..ये नामुमकिन है जनाब..।”
“हर जगह नियम-कायदे ज़रुरी हैं क्या? ”

कैसी अजीब आवाज़ें थीं..!

पहली आवाज़ में खुशामद की हद तक नर्माहट थी, और दूसरी सधी हुई थी..। अगर खुद नहीं सुना होता तो कभी यकीन नहीं होता..। कहीं भोज के मेहमान तो बाहर नहीं आ गए थे..? लेकिन आवाज़ें कब्रों के भीतर से आ रही थीं..इस बात में कोई शक नहीं था..। मैं झुका और कब्र पर लिखी हुई इबारत पढ़ी- “हियर लाइज़ द बॉडी ऑफ जस्टिस एबीसी..” ह..मम! “पास्ड अवे इन द मे मंथ ऑफ दिस इयर..फिफ्टी सेवन...रेस्ट, बिलवेड़, टिल द जॉयफुल डॉन...”

अच्छा, तो ये वाकई जज है..! खुशामद भरी आवाज़ जिस कब्र से आ रही थी, उसपर कोई स्मारक नहीं था..। ये ज़रुर नई लाश होगी..। आवाज़ से ही वो वकील लग रहा था..।

“ओ-हो-हो-हो ! मुझे जज की कब्र से फर्लांग भर दूर से एक और आवाज़ सुनाई दी..। ये मर्दाना सुर था, मानो कराह रहा हो..। “ओ-हो-हो-हो!”
“नहीं! उसे फिर हिचकी आ रही है..! ” एक गर्वीली महिला का सुर चिल्लाया..। “इस दुकानदार के बगल में होना वाकई टॉर्चर है..”
आवाज़ से ही पहचान गया, वो बीते ज़माने की टीवी एंकर मिसेज टमटम थी..।
“मुझे हिचकी नहीं आई, ये मेरी आदत है..। कहना ही पड़ेगा, मैडम, आपके नख़रे यहां भी बरकरार हैं..।

“तो तुम्हे यहां आकर लेटने को किसने कहा था..? ”

“उन्होंने मुझे यहां डाला, मेरी बीवी और छोटे बच्चे मुझे यहां छोड़कर गए, मैं यहां अपनी मर्ज़ी से नहीं आया हूं..। मौत की मजबूरी..! मेरा बस होता तो करोड़ रुपये के बदले भी तुम्हारे बगल में नहीं आता..। लेकिन क्या करूं, हम जैसे लोग सिर्फ सी-ग्रेड की कब्र का पैसा चुका सकते हैं..।”
“मुझसे क्या छिपा रहे हो..? लोगों को ठगकर तुमने खूब माल कमाया है..।”
“जहां तक सवाल ठगने का है, इस जनवरी से तुम्हारी एक दमड़ी की शक्ल नहीं देखी..। तुम्हारा बकाया अब भी खाते में दर्ज है..।”
“कब्र में भी तकाज़ा..! क्या बेवकूफी है..! जाओ, ज़मीन पर वापस जाओ, और मेरी भतीजी से हिसाब मांगो, जो मेरी वारिस है..। ”
“अब क्या पूछना, और कहां जाना..हम अपने अंजाम तक पहुंच चुके हैं, और ईश्वर के सामने हमारे गुनाहों का हिसाब देने में बराबर हैं..।”
“हमारे गुनाहों का हिसाब??” महिला ने नकल उतारते हुए कहा..। “मुझसे बात करने की ज़ुर्रत कैसे हुई तुम्हारी..।”

“ओ-हो-हो-हो..!”

“देखा जनाब, दुकानदार को मिसेज़ टमटम की बात माननी पड़ी..। ”
“इसमें हैरानी की क्या बात है?”
“क्यों नहीं जनाब, आखिर यहां चीज़ें अलग हैं..।”
“अलग? कैसे?”

“हम मर चुके हैं, शायद आप भूल रहे हैं, जनाब..।”
“ओह, हां! लेकिन फिर भी...”
कुछ भी कहिए, ये दिल बहलाने और वक्त काटने के लिए अच्छा तमाशा था..। अगर दो गज के ज़मीन के नीचे ये हाल है तो सतह के ऊपर क्या उम्मीद की जा सकती है..? मेरे भीतर घृणा जन्म ले रही थी, लेकिन फिर भी मैं ग़ौर से सुनता रहा..।
“हां, मुझे जीना है, अभी और जीना है, अभी और...” जज और एंकर के बीच की जगह से एक नई आवाज़ कानों में पड़ी..।

“आपने सुना जनाब, लगता है हमारे फ़ाज़िल दोस्त को फिर वही दौरा पड़ा है..। तीन दिनों तक वो खामोश पड़ा रहता है और फिर यही आवाज़.. ‘मुझे और जीना है, और जीना है’..लगता है हसरतें अभी पूरी नहीं हुई इसकी..ही-ही!”

“क्या जाहिलपन है..।”

“लेकिन वो इससे मजबूर है, जनाब..। और क्या आप जानते हैं उसपर अब नींद हावी रहने लगी है- वो यहां अप्रैल से है..लेकिन ‘मुझे जीना है..” की रट”

“लेकिन वो बोरियत से भरा है..।” योर ऑनर का मानना था..।
“बजा फरमाया, हुज़ूर..। क्यों न हम फिर मिसेज़ टमटम को छेड़ें..?”
“नहीं, प्लीज़..मेरे लिए उसे जीते जी भी झेलना मुश्किल था..।”
“और मेरे लिए तुम दोनों को झेलना मुश्किल है..।” मिस टमटम की कब्र से लगभग चिल्लाती हुई आवाज़ आई..। “तुम दोनों अव्वल दर्जे के बोर हो..और कहने के लिए तुम्हारे पास कुछ भी नया नहीं है..। लेकिन मुझे आपके बारे में एक कहानी मालूम है, प्लीज़ नाक भौं मत सिकोड़िए, योर ऑनर..- कैसे आपको सिसिल होटल के वेटर ने एक शादीशुदा जोड़े के बिस्तर के नीचे से निकाला था..”
“साली..*&%$#” जज साहब ने मन ही मन में बुदबुदाया..।
“मिसेज़ टमटम..” दुकानदार की कब्र से फिर आवाज़ गूंजी..। “आप नाराज़ क्यों हो रही हैं..मुझे ये बताइये ये दर्द क्या है..? ”
“नहीं फिर नहीं, मुझे इसी का डर था..। इस बदबू का एक ही मतलब है कि ये करवट बदल रहा है..।”

“माफ कीजिए, मैं बिल्कुल पलट नहीं रहा हूं, और मुझसे कोई ऐसी ख़ास बदबू भी नहीं आ रही..। मैंने अपने शरीर को सहेज कर रखा है..और बदबू क्या होती है ये मुझसे पूछिए..मैं सिर्फ इसलिए चुप रहता हूं क्योंकि आपका लिहाज़ करता हूं..। ”

“जाहिल आम आदमी..। बदबू खुद से आ रही है और बात मेरे बारे में करते हो..।”
“ओ-हो-हो-हो~!पता नहीं, क्रिसमस कब आएगा: मुझे उनके आंसुओं से भीगी हुई आवाज़ सुनाई देगी, मेरी पत्नी ज़ोर-ज़ोर से रोएगी..और बच्चे भी सिसकते हुए सुनाई देंगे..।“

“ओह!, ये भी कोई खुश होने की बात है? वो कब्रिस्तान की खामोशी में खलल डालेंगे और कुछ नहीं..। काश कोई और मुर्दा जागे..!”

“मिसेज़ टमटम, थोड़ा सब्र कीजिए..।” वकील ने बीच में टोका..। “ज़रा इंतज़ार कीजिए, हमारे बीच आए नए साथी भी जल्द ही बोलेंगे..।”
“क्या उनमें जवान भी शामिल हैं..?”
“हां, मिसेज़ टमटम, उनमें कई अभी जवान भी हैं..।”

“क्या उनमें से अभी कोई भी नहीं जगा है..?” जज साहब ने जानना चाहा..।
“अभी तो परसों लाए गए मुर्दे भी सो रहे हैं, जनाब..। आप जानते ही हैं कभी-कभी तो वो हफ्तों तक ख़ामोश रहते हैं..। अच्छी बात ये है कि पिछले तीन दिनों में आसपास कई जवान लोगों को दफनाया गया है..।”

“फिर तो दिलचस्प रहेगा..।”
“हां, योर लॉर्डशिप, उन्होंने श्रीमान कुर्सी कमल को भी आज ही दफनाया है..। आप जानते ही होंगे..पिछली सरकार में मंत्री थे..। मैं उनकी आवाज़ों से ही पहचान गया था..। मैं उसके भतीजे को जानता हूं, ताबूत को कब्र में डालने वालों में वो भी शामिल था..।”
“अच्छा, तो फिर वो कहां है?”
“बस आपसे पांच कदमों की दूरी पर जनाब..वहां बांईं तरफ़...आपके पैरों के पास, आपको उससे जान-पहचान बढ़ानी चाहिए, हुज़ूर..।”
“ह..म! लेकिन पहल तो उसे करनी चाहिए..।”
“ओह, वो खुद पहल करेगा, जनाब..उसे खुशी होगी, आप बस मुझपर छोड़ दीजिए...”
“आह! ये मुझे क्या हो रहा है?” एक डरी हुई आवाज़ आई..। ये नई लाई गई लाश थी..।
“नया साथी, जनाब, नया साथी..शुक्र है..!और देखिए कितनी जल्दी जाग गया है! कई बार वो हफ्तों तक कुछ नहीं कह पाते..।”
“ज़रूर ये कोई नौजवान लाश है!” मिसेज़ टमटम ने लगभग चिल्लाकर कहा..।
“मैं...मैं...सबकुछ इतनी अचानक!” नौजवान की आवाज़ भर्राई हुई थी..। “अभी सिर्फ एक शाम पहले डॉक्टर सक्सेना ने मुझे बताया था, ‘कुछ कॉम्लिकेशन है,’ और अगली ही सुबह मैं मर गया. ओह, ओह! ”
“इसमें तुम कुछ नहीं कर सकते, यंग मैन,” जज साहब ने गरिमा भर सुर में कहा..। यकीकन वो इस नए आगुंतक से खुश थे..। “तुम्हे खुश होना चाहिए..हमारी इस अजीब दुनिया में तुम्हारा स्वागत है..। हम बुरे लोग नहीं है, आहिस्ता-आहिस्ता तुम हमें पहचान जाओगे..। मैं जस्टिस एबीसी... ”
“ओह, नहीं...नहीं! मैं डॉक्टर सक्सेना के क्लिनिक पर था, मेरे साथ कुछ कॉम्पलिकेशन थी, पहले मेरी छाती में कफ की शिकायत थी, उसके बाद सर्दी लग गई..और अचानक, अचानक...सबसे ख़राब बात ये है कि इसका अंदेशा सपने में भी नहीं था..।”
“तुमने कहा छाती से दर्द शुरू हुआ?,” वकील ने अदब भरे लहज़े में बातचीत का सिलसिला शुरू किया..।
“हां, मेरी छाती, फिर फेफड़े, और मैं सांस नहीं ले सकता था..और, और..तुम जानते हो..”
“हां, मैं जानता हूं..जानता हूं..। लेकिन अगर तुम्हारी छाती में शिकायत थी तो तुम्हें डॉक्टर सक्सेना नहीं, डॉक्टर खुराना के पास जाना चाहिए था..।”
“मैं डॉक्टर परमार के पास जाने वाला था, लेकिन..सबकुछ इतना अचानक...”
“डॉक्टर परमार को लोग कड़क कहते हैं..। ” जज साहब ने फैसला सुनाया..।
“नहीं, वो बिल्कुल कड़क नहीं, मैने सुना है वो मरीज़ को देखते ही मर्ज़ बता देते हैं..।”
“जनाब का मतलब उनकी फीस से था..।” वकील ने नौजवान को दुरुस्त किया..।
“ओह, बिल्कुल नहीं, वो चेक-अप के सिर्फ पंद्रह सौ रुपये लेते हैं..और उनका प्रिस्क्रिप्शन..और मैं उनके पास जाने वाला था..मुझे किसी ने बताया था...”
“क्या? किसके पास?” जज साहब की लाश ने ठहाका लगाया..। वकील की हंसी की गूंज भी उसमें शामिल हो गई..।
“मेरे प्यारे दोस्त, मेरे अजीज़..मिसेज़ टमटम के लिए अब खामोश रहना मुश्किल था..। “काश उन्होंने तुम्हे मेरे बगल में दफनाया होता..”
अब ये तो हद थी! हमारे मुर्दों का भी ये हाल..! लेकिन मैं इतनी जल्दी किसी नतीजे पर नहीं पहुंचना चाहता था..। इसलिए गौर से सुनता रहा..। और ये रिरियाती हुई नई लाश- उसके डरे हुए चूज़े जैसी शक्ल को मैंने ताबूत में कुछ देर पहले ही देखा था..। खैर, मैंने फैसला किया मुझे रुककर अभी और इंतज़ार करना चाहिए..।

(क्रमश:)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें