गुरुवार, सितंबर 02, 2010

डोको-डोको, डैंग-डैंग-3


आगे..
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लेकिन उसके बाद ऐसा शोर-शराबा शुरू हुआ कि किसी भी बात का मतलब निकाल पाना मुश्किल था..। बहुत सारे मुर्दे एक साथ जाग गए थे; एक सरकारी अफ़सर जगा और अपने महकमे की सब-कमेटी के नए प्रोजेक्ट पर चर्चा करने लगा..। जज साहब को कमेटी के लोगों की ट्रांसफर पर छिड़े विवाद में ख़ास दिलचस्पी थी..। मानना पड़ेगा कि मुझे खुद भी सीखने को बहुत कुछ मिला..। मुझे हैरानी हुई कि सरकारी दफ्तरों में कैसे-कैसे ज़रियों से जानकारी हासिल की जा सकती है..। इसके बाद एक इंजीनियर उठ बैठा और देर तक क्या बुदबुदाता रहा..। हमारे बाकी मुर्दा दोस्तों ने उसे पूरी तरह नज़रअंदाज़ किया, जब तक वो दोबारा खामोश नहीं हो गया..। आखिर एक संभ्रांत बूढ़ी औरत की कब्र में भी हलचल हुई..जिसे सुबह ही पूरी टीमटाम के साथ दफनाया गया था..। हमारे वकील साहब इसपर चहक उठे..वो हैरान थे कि इस बार मुर्दे कितनी जल्दी-जल्दी जाग रहे हैं..। मानना ही पड़ेगा कि हैरान मैं भी था; हालांकि जागने वालों में से कुछ तीन दिन पहले भी यहां लाए गए थे..। मसलन सोलह साल की एक लड़की जो न जाने किस बात पर एक भयानक हंसी हंसे जा रही थी..।
“योर ऑनर, श्रीमान कुर्सी कमल जाग रहे हैं!” वकील ने बेहद उत्तेजित होकर कहा..।
“ओह, ये क्या है?” जगने के बाद बेमने नेताजी बोले..।
अब मैं दोगुने ध्यान से सुन रहा था..। चंद रोज़ पहले ही कुर्सी कमल के बारे में कुछ बेहद सनसनीखेज़ सुनने को मिला था..।
“सर, आपकी खिदमत में मैं...”
“कौन, मुझसे क्या चाहते हो?”
“सिर्फ आपकी सेहत का हालचाल जानना चाहता हूं, हुज़ूर..। ऐसे माहौल सभी को साथ की ज़रुरत होती है..और यहां न्यायमूर्ति खुद भी मौजूद हैं...”
“कौन, क्या मैंने कभी उसके बारे में सुना है..?”
“ज़रुर सर, जस्टिस एबीसी...”
“क्या तुम हो जस्टिस एबीसी?”
“नहीं, हुज़ूर, आपका खिदमतगार...वकील...हाईकोर्ट...”
“कौन बेवकूफ़ है! मुझे अकेला छोड़ दो..मेहरबानी होगी..।”
“उसे उसके हाल पर रहने दो..।” कब्र में भी अपने मातहत की खुशामदगी..जज साहब से बर्दाश्त नहीं हुई..।
“वो अभी तक पूरी तरह से जगा नहीं है, आप समझने की कोशिश कीजिए, जागने के बाद उसके तेवर अलग होंगे..।”
“ठीक है, ठीक है..” जज साहब ने दोहराया..।
“जनाब, योर ऑनर..!” मिसेज़ टमटम के बगल से एक बिल्कुल नई आवाज़ गूंजी..।
“मैं आपको पिछले दो घंटे से देख रहा हूं..। क्या आप मुझे पहचानते हैं..? याद है, हम गेयटी थिएटर में एक दफा मिले थे..। मैं फ्रांसिस हूं..याद है या नहीं..! ”
“क्या प्रोफेसर टॉम के बेटे फ्रांसिस,?...क्या ये तुम हो सकते हो...इस छोटी उम्र में? मुझे वाकई अफसोस है...”
“ओह! अफसोस तो मुझे भी है..लेकिन छोड़िए..मैं जहां रहूं, बस खुश रहना चाहता हूं..और बात ये है कि मेरे पिता प्रोफेसर नहीं सिर्फ लेक्चरर हैं..। खैर, मुझे परवाह नहीं..। मैं सिर्फ झूठी बौद्धिकता से भरी सोसाइटी का एक छोटा सा ठग हूं..ये और बात है लोग मुझे दिलकश कहते हैं..। ज़रा सोचिए, पिछले साल ही मेरी सगाई हुई थी- लड़की अब भी यूनिवर्सिटी में पढ़ती है, 20 साल से सिर्फ तीन महीने ज़्यादा..। टमटम तुम्हें तो याद होगा कैसे पंद्रह साल पहले तुमने मुझ पर डोरे डाले थे..जब में सिर्फ सत्रह का था..। ”
“आह, ये तुम हो! शैतान..खैर..जहां तक यहां की बात है...”
“तुम हमारे बिज़नेसमैन साथी पर नाहक बिगड़ रही थीं..ये उसकी बदबू नहीं..मुझसे आ रही थी..मैंने कहा कुछ नहीं सिर्फ हंसकर रह गया..।उन्हें मुझे कीलों से ठोके गए ताबूत में डालना पड़ा..। “
“तुम..तुम..तुम पाजी, तुम नहीं जानती तुम्हे यहां देखकर कितनी खुशी हुई..तुम क्या जानो यहां लाइफ कितनी डेड है !”
“जानता हूं, जानता हूं..। इसीलिए यहां पर कुछ नया शुरू करना चाहता हूं..। सर- मेरा मतलब आपसे नहीं योर ऑनर..सर- कुर्सी कमल जी- जवाब दीजिए..मैं फ्रांसिस हूं..पहचाना या नहीं?”
“पहचान लिया, पहचान लिया..फ्रांसिस और भरोसा करो...”
“मुझे आपपर दो टके का भी भरोसा नहीं..वैसे दिल आपको चूमने का कर रहा है..शुक्र है, मैं नहीं कर सकता..। साथियो, क्या आपको पता है श्रीमान कुर्सी कमल किस कदर छुपे हुए रुस्तम हैं..? उन्हें मरे हुए तीन या चार दिन ही बीते हैं..आप शायद नहीं जानते होंगे..जनाब विधवाओँ और अनाथों के फंड से पूरे चालीस करोड़ गायब करके निकले हैं..। किसी वजह से वो इस फंड के सर्वेसर्वा थे..। इसीलिए किसी ने इनके खातों पर नज़र डालने की ज़हमत नहीं उठाई..। नेताजी तो यहां आ गए..लेकिन इनके पीछे लोगों के लटके हुए चेहरे देखने लायक हैं..। पिछले एक साल में हैरान था..सत्तर साल का दमे का मरीज़..इतने बड़े गोलमाल के लिए जिगर कहां से लेकर आया- लेकिन अब पहेली सुलझ चुकी है..।उन्हीं विधवाओँ के ख्याल ने इसे ताकत दी..। मुझे इस बारे में बहुत पहले से पता था..। बल्कि मैं ही था..जिसे ये राज़ मालूम था..। जैसे ही पता चला मैं मौका मिलते ही इनके पास गया: मुझे दस लाख रुपये दो या फिर कल ही आपके यहां छापा पड़ेगा..। क्या आप यकीन करेंगे..उस वक्त इनके पास एक फूटी कौड़ी नहीं थी..। सर, सर, क्या आप सुन रहे हैं..? ”
“हां, हां..और इतनी तफ्सील में जाने की ज़रुरत नहीं थी..। ज़िंदगी इतनी दर्द भरी है..और राहत कहीं भी नहीं...मैं कम से कम कब्र में आराम से रहना चाहता था..लेकिन तुम्हारा शुक्रिया..अब लगता है यहां भी चैन नहीं मिलेगा..। ”
“शर्त लगा लो, उसे कैथी की मौजूदगी की भनक लग चुकी है..!”
“कौन? कौन कैथी? बूढ़े नेता की आवाज़ में एक अजीब सी कंपकंपी थी..। ”
“आ-हा..कौन कैथी..? / यहां से बांईं ओर.मेरी ओर से पांच और तुम्हारी तरफ़ से दस कदम दूर..। वो यहां पिछले पांच दिनों से है..और सिर्फ नेताजी जानते हैं, वो क्या चीज़ है..! मैंने जानबूझकर किसी से यहां तार्रुफ़ नहीं करवाया...कैथी, कैथी, जवाब दो..! ”
“ही-ही-ही!” लड़की ने फिर उसी डराने वाली हंसी से जवाब दिया..जिसमें कुछ सुई की तरह चुभोने वाला था..। “ही-ही-ही!”
“तो…तो ये तुम हो..? नेताजी हकलाते हुए बोले..।”
“ही-ही-ही!”
मैं..मैं...पंद्रह साल की गोरी..ऐसे किसी एकांत में..ऐसी तन्हाई में इसीका ख्वाब देखा करता था..।
“गौर से देखिए..यही है वो दरिंदा...” मिसेज़ टमटम की ज़ुबान से बेसाख्ता निकला..।
“बस..!” फ्रांसिस ने फैसला किया..। ”यहां चीज़ें बेहतर बनाई जा सकती हैं..। सबसे ज़्यादा ज़रुरी है कि हम बाकी बचा वक्त खुशी-खुशी बिताएं; लेकिन कितना वक्त..? हमारे बीच मौजूद वकील सब कुछ जानते हैं..। सबसे पहले ये बताइये कि मरने के बाद भी हम बात कैसे कर सकते हैं..? मैं कल से ही हैरान हूं..। हम मर चुके हैं, लेकिन फिर भी बात कर रहे हैं..हरकत कर सकते हैं- लेकिन फिर भी हम अपनी जगह पड़े हैं..ये क्या माजरा है..? ”
“अगर आपको इसका राज़ जानना है तो फिलॉसफर डिकोस्टा मुझसे बेहतर बता सकते हैं..”
“ये कौन फिलॉसफर है? मुद्दे से भटको मत..।”
“फिलॉसफर डिकोस्टा हमारे देसी दार्शनिक, वैज्ञानिक और कलाकार हैं..। अपनी ज़िंदगी के सारे महान फलसफे उन्होंने यहीं कब्र के नीचे दिए..। लेकिन अब वो बेसुध रहते हैं, काफी वक्त से उन्होंने कुछ नहीं कहा..। हां, लेकिन हफ्ते में एकाध बार कुछ अटपटा उनकी ज़ुबान से सुनने को ज़रुर मिल जाता है..।”
“मसले पर आइये..।”
“फिलॉसफर डिकोस्टा का मानना है कि सतह पर रहते हुए हम ग़लतफहमी में रहे कि मौत जैसी कोई चीज़ है..। यहां ज़मीन के नीचे जीवन के बचे अंश फिर इकट्ठा होते हैं, अलबत्ता सिर्फ चेतना के स्तर पर..। मैं नहीं जानता, इसे कैसे कहा जाए लेकिन ज़िंदगी यहां भी वैसे ही कुछ देर तक चलती रहती है, जैसे ब्रेक लगने के बाद भी कोई गाड़ी..। तो हमारे फिलॉसफर की राय में ज़िंदगी के कुछ टुकड़े हमारी परिभाषा की मौत के बाद भी कुछ वक्त तक चेतना को बनाए रखते हैं..अक्सर दो या तीन महीने तक..कुछ मामलों में छह महीने तक भी..। अब मिसाल के तौर पर यहां एक मुर्दा ऐसा भी है, जिसका शरीर पूरी तरह गल चुका है, लेकिन छह हफ्तों में एक बार वो अचानक कुछ अनर्गल कह उठता है- डोको-डोको, डैंग-डैंग जैसा कुछ..। लेकिन समझने की कोशिश कीजिए, होश का एक रेशे से अब भी उसकी ज़िंदगी की डोर बंधी है..। ”
“यकीन करना मुश्किल है, लेकिन मुझे ये बताओ मैं यहां कोई गंध क्यों महसूस नहीं करता..?”
“वो..हा-हा…सभी दार्शनिकों की तरह यहां हमारे डिकोस्टा साहब के ख्याल भी कुछ धुंधले हैं..। इस मसले पर वो कहते हैं कि ये दरअसल..आत्मा की सड़ांध है..। हम इसे महसूस करते हैं ताकि चेतना के आखिरी दो-तीन महीनों में ही सही अपनी आत्मा को चंगा कर सकें..। उसके शब्दों में-‘दिस इज़ द लास्ट मर्सी..।’ ”
“बस, बस, इससे ज़्यादा जानकारी, मुझे यकीन है, फिज़ूल होगी..। अच्छी बात ये है कि हमारे पास अब भी दो-तीन महीने की ज़िंदगी बाकी बची है और उसके बाद डोको-डोको, डैंग-डैंग..! हमें ये वक्त कुछ इस तरह बिताना चाहिए जैसा दुनिया में नहीं बिता सके..। हमें यहां रहने के ढर्रे को बदलना होगा..। मैं चाहता हूं कि हम सब पर्दे, सब लिहाज़, सब शर्म..जिन्हें अबतक ढोते आए..उन्हें गिरा दें..। ”
“हां, हां..आओ बेपर्दा हो जाएं!” कई आवाज़ें एक साथ गूंजीं..। मुझे सुनकर हैरानी हुई..इनमें कई नई आवाज़ें भी शामिल थीं..।
“ओह! पूरी ज़िंदगी भर मैंने शर्म को किनारे रखना चाहा है..।” मिसेज़ टमटम लगभग चिल्ला रही थीं..।
“मैं समझता हूं फ्रांसिस..” अब तक पूरी तरह जाग चुका इंजीनियर बोला..।“हमें यहां की ज़िंदगी को नए सिद्धांत देने होंगे..।”
“उसकी फिक्र मत करो, उसके लिए हम अपने कुछ और साथियों का इंतज़ार करेंगे..। कल ही वो यहां एक वैज्ञानिक को लेकर आएंगे, जहां तक मुझे मालूम है, एक पुलिस अफसर को भी..और तीन चार-दिन बाद एक पत्रकार भी यहां आने वाला है..। इस बात के पूरे इमकान हैं कि अपने एडिटर के साथ ही यहां आएगा..। तब हमारा एक ग्रुप होगा और चीज़ों को ठीक कर लेंगे..। लेकिन खुद से झूठ अब एक पल नहीं..। एक यही चीज़ है जो मायने रखती है..। हम सतह पर बिना झूठ के नहीं रह सकते..। बल्कि वहां ज़िंदगी और झूठ एक ही सिक्के के दो पहलू हैं..। लेकिन हम यहां सिर्फ सच बोलेंगे..। भाड़ में जाए दुनिया! आखिर कब्रिस्तानों की भी अपनी खूबसूरती है! हम एक दूसरी की कहानियां साझा करेंगे..और खुद पर शर्मिंदा होना अभी से बंद! सबसे पहले खुद से शुरू करता हूं- “मैंने हमेशा दूसरों की कीमत पर खुद का सोचा..। ज़िंदगी भर सबकुछ झूठ के धागों से बांधकर रखा..लेकिन अब वो डोर टूट गई है..। आओ अपने बचे हुए दो महीने..नग्न सत्य में बिताएं! आओ नग्न हो जाएं!”
“आओ, नग्न हो जाएं, आओ नग्न हो जाएं!” सभी आवाज़ों का समवेत स्वर सुनाई पड़ा..।
“हां, मैं भी नग्न होना चाहती हूं, पूरी तरह नग्न..।” मिसेज़ टमटम के लिए खुद पर काबू रखना मुश्किल था..।
“अच्छी बात ये है कि यहां किसी का दखल झेलने की ज़रुरत नहीं है..। लेकिन जज साहब कुछ राज़ी नहीं दिखते, क्यों योर ऑनर आपकी क्या राय है, तो फिर शुरू करें, सबसे पहले कैथी अपनी ज़िंदगी की कहानी सुनाएगी..। ”
“आई ओबजेक्ट, आई ओबजेक्ट! ” जज साहब ने बुलंद आवाज़ में ऐलान किया..।
“योर ऑनर..। ” वकील ने मनाने की कोशिश की..। “मानने में ही भलाई है, आप देख सकते हैं, इतने सारे लोग, इतने स्कैंडल..”
“यहां कई लड़कियां भी हैं, मगर..”
“ये अपने ही भले में है, जनाब, मेरी मानिए..। मानकर देखने में हर्ज़ क्या है?”
“वो कब्र में भी चैन नहीं लेने देंगे..।”
“पहली बात ये जज साहब कि यहां कब्र में भी आपकी ऐंठन गई नहीं, और दूसरी ये कि भाड़ में जाओ!” फ्रांसिस ने रूखे सुर में कहा..।
“तुम खुद को भूल रहे हो..”
“क्यों, यहां भी तुम्हारा कानून मुझे जेल में डालेगा? सुनो, यहां से मैं तुम्हे इस तरह चिढ़ा सकता हूं जैसे तुम कैथी का पालतू कुत्ता हों..। और एक और चीज़..तुम वहां योर ऑनर रहे होंगे..यहां कुछ नहीं हो..! यहां तुम सड़ने वाले हो और आखिर में सिर्फ तुम्हारे कोट पर लगे छह बटन बचे रह पाएंगे..। ”
“वाह! फ्रांसिस..हा, हा, हा!” सभी आवाज़ें एक साथ गरजीं..।
“ऑर्डर, ऑर्डर!” शोरोगुल के बीच जज साहब चिल्लाए लेकिन सिर्फ मैं उन्हें सुन सका..।
अब उस कब्रिस्तान में सुर ऐसे गरज रहे थे जैसे किसी नेता की सभा हो रही हो..।
“आओ जल्दी करें, हम सब नग्न हो जाएं, हम सब शर्म उतार फेंकें..।”
“ओ-हो-हो!” फरेब का बोझ अब नहीं ढोना पड़ेगा, किसी की धौंस अब नहीं चलेगी..और...”
और यहां अचानक मुझे छींक आ गई..। ये अचानक और अनचाहे में हुआ लेकिन असर में देरी नहीं हुई..। अचानक सबकुछ ऐसे खामोश हो गया, जैसा एक कब्रिस्तान को होना चाहिए..। सबकुछ सपने की तरह गायब हो गया..। मुझे नहीं लगता कि वो मेरी मौजूदगी से शरमा गए: उन्होंने शर्म उतार फेंकने का फैसला किया था! मैं पांच मिनट तक इंतज़ार करता रहा- एक शब्द नहीं..। अब ये मानना तो बेवकूफी होगी कि उन्हें मेरे पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवाने का डर रहा होगा..। मुझे इसी नतीजे से संतोष करना पड़ा कि उनके पास ज़िंदगी का कोई ऐसा राज़ था..जिससे हम ‘जिंदा’ लोग अंजान हैं..। उन्होंने इस बात का ख्याल रखा कि वो राज़ ज़मीन से दो गज नीचे ही दफन रहे..।
“अच्छा मेरे प्यारो!” मैंने सोचा, “मैं तुम्हारे पास दोबारा आऊंगा..।”
और इतना कहकर मैं कब्रिस्तान से बाहर निकल आया..।
नहीं, मैं ये नहीं मान सकता; नहीं, सच में ये नहीं मान सकता! डोको-डोको, डैंग-डैंग की असलियत मुझे परेशान नहीं कर रही..। (अच्छा! तो डोको-डोको, डैंग-डैंग का ये मतलब था!)
लेकिन ऐसी जगह पर भी महरूमियत, आखिरी बची ख्वाहिशों का खोखलापन, सड़ते-गलते मुर्दों में भी ये मोह! वो भी उन आखिरी लम्हों में जो उन्हें..तोहफे में मिले हैं...जो उन्हें आत्मा की सड़ांध...नहीं..ये मैं नहीं मान सकता..।
मैं दूसरे कब्रिस्तानों में जाऊंगा, मैं हर जगह कान लगाकर सुनूंगा..। यकीनन कोई भी राय बनाने से पहले हमें अच्छी तरह जांच लेना चाहिए..। शायद कोई कब्रिस्तान ऐसा भी हो जहां चीज़ें बेहतर हों..।
लेकिन मैं इन मुर्दा दोस्तों के पास भी ज़रुर लौटूंगा..। कैसी कैसी ख़बरें, कैसे-कैसे स्कैंडल वहां मौजूद हैं..। हां, मैं ज़रुर जाऊंगा, फिर ये अंतर्मन का भी तो सवाल है..।
मैं फिर किसी मैगज़ीन के एडिटर के पास जाऊंगा, हो सकता है वो इसे छाप दे...

(समाप्त)

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