सोमवार, नवंबर 08, 2010

..तो बात पक्की!


कॉमनवेल्थ खेलों से पहले हमारे खेलमंत्री को कहते सुना गया था कि घबराने की कोई ज़रुरत नहीं, ठेठ हिंदुस्तानी शादी की तरह ये एंडिंग भी हैप्पी ही होगी..। ओबामा का दौरा भी कुछ कुछ ऐसा ही था..। मानो एक सकुचाया दूल्हा (पढ़ें- अमेरिका) एक शर्मीली दुल्हन को ब्याहने गया हो..। बिल क्लिंटन ने साल 2000 में पहली बार इस जोड़ी को आपस में मिलवाया..। दोनों परिवारों में ऐसे होने वाले रिश्तेदारों से मिलने का जोश था..जिनके बारे में उन्होंने सुन तो रखा था..लेकिन राप्ता कम ही पड़ा था..। दोनों तरफ़ खोने के लिए कुछ नहीं था..और पाने के लिए भविष्य की उम्मीदें थीं..। जॉर्ज बुश ने एक ऐसी पारिवारिक ‘आंटी’ की भूमिका अदा की..जिन्होंने रिश्ते की बात को आगे बढ़ाया..। सगाई के तोहफे के तौर पर बेशकीमती परमाणु पैकेज को पेश किया गया..। इस दफा ओबामा मेहमानों की लंबी चौड़ी फौज के साथ आए- ये शायद अमेरिका की ज़मीं से रवाना होने वाली सबसे बड़ी ‘बारात’ थी..। अब जबकि बात लगभग पक्की है..दोनों पक्ष पड़ोसियों के साथ रिश्ते का गुणगान करते नहीं थक रहे हैं। दोनों तरफ़ इस बात का इल्म है कि रिश्ते में दम है। बल्कि पंडितों की राय में अगर दोनों कुनबों को आने वाले वक्त में खैर मनानी है तो ये रिश्ता उनकी ज़रुरत है। लेकिन बात अब सिर्फ ‘रोमांस’ की चकल्लस तक सीमित नहीं है। अब दोनों के मुस्तकबिल रिश्ते की गांठ से जुड़ चुके हैं। ज़ाहिर है, वर और वधू दोनों की सांसें तेज़ होना लाज़िमी है..। लिहाज़ा दूल्हे मियां (कम अज़ कम पिछले कुछ सालों में दोनों में से अमेरिका की डिप्लोमेसी में ही ‘मर्दों वाली बात’ ज़्यादा नज़र आई है। सो उसे ही दूल्हा कहना ज़्यादा सही होगा..।) नर्वस से नज़र आए..मानो उसे अपनी इज्ज़त की फिक्र हर पल सता रही हो..एक कदम रखने से पहले भी वो सौ बार सोच रहा हो..। बाकी दूल्हों की तरह उसकी दिलचस्पी अपने मेज़बानों का दिल जीतने में, क्या कहूं, क्या न कहूं..इसी ख्याल में थी..। वहीं लड़कीवाले चाहते थे कि दूल्हा सबसे पहले काम की बात करे..। क्या वो अपनी ‘ऐय्याशी’ का ज़िक्र उठाएगा..जिसका चर्चा पूरे मोहल्ले में है; क्या वो उस ‘सौतन’ के साथ रिश्ते को दुनिया के सामने झुठलाएगा..जिसके परिवार के साथ लड़कीवालों की जानी दुश्मनी है। क्या वो उसे छोड़कर अपनी होने वाली दुल्हन के लिए वफा साबित करेगा..? लेकिन दूल्हे मियां ने पहले पहल तो सिर्फ यही कहा कि वो अपनी नई शरीक ए हयात का किस कदर मुरीद है, किस तरह उसके लिए ये परिवार दुनिया में सबसे ज़्यादा अहम है। लेकिन लड़कीवाले सिर्फ इतने पर कहां मान सकते थे..? मीडिया बेंचों में दुल्हन की सहेलियां दूल्हे की टालमटोल पर फब्तियां कसती रहीं..। लेकिन फिर भी सबकुछ नहीं बिगड़ा था..। घर के बड़े-बूढ़े कब काम आते? दोनों तरफ़ से शानदार तोहफों का लेन-देन हुआ..।(आंकड़ों के मुताबिक ये दहेज 15 बिलियन डॉलर का था..।) इशारों ही इशारों में ये भी बताया गया कि तोहफों का लेना-देना तो अब उम्र भर चला रहेगा..। ज़्यादार हिंदुस्तानी शादियों की तरह ये भी तीन दिनों की रौनक थी..। शादी के दूसरे दिन दूल्हे की ज़ुबान पर उस ‘वो’ का ज़िक्र तो ज़रुर आया..लेकिन इस हमदर्दी के साथ कि उस बिचारी के सितारे गर्दिश में हैं..। हमें ही नहीं आपको भी उसकी मदद करनी चाहिए..। सालियां एक दूसरे को कुहनी मारकर पूछती हैं कि फिर वो अब भी उसे तोहफे क्यों भेजता है? ये हमें शादी के तीसरे दिन में ले जाता है..। मेहमानों से औपचारिक विदाई के वक्त और इसके बाद के भोज में भी वो ससुरालवालों का दिल जीतने का कोई मौका नहीं चूकता..। वो उन्हें भरोसा दिलाता है कि रिश्ता सात जन्मों का है..शुरुआत भले ही ठंडी रही हो..लेकिन भविष्य सुनहला है..। वो ये जतलाने की कोई कसर नहीं छोड़ता कि वो अपनी दुल्हन को चाहने का दिल रखता है..। लड़कीवालों को कहना पड़ता है कमिटमेंट सॉलिड है..। चलिए हम भारत के नागरिक तो सिर्फ ‘सौभाग्यवती भव’ का आशीर्वाद ही दे सकते हैं..। वैसे कानाफूसी में मैंने भी सुना है कि लड़के का रिकॉर्ड कुछ ख़ास अच्छा नहीं है..।

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