सोमवार, नवंबर 15, 2010

तो पार उतर जाएं..



शहर सुनसान है किधर जाएं,
ख़ाक होकर कहीं बिखर जाएं..

यूं तेरे ध्यान से लरज़ता हूं,
जैसे पत्ते हवा से डर जाएं..

रात कितनी गुज़र गई लेकिन
इतनी हिम्मत नहीं कि घर जाएं..

रैन अंधेरी है और किनारा दूर
चांद निकले तो पार उतर जाएं..

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