शनिवार, दिसंबर 04, 2010

इक पागल का ख्वाब..-2

कहानी
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देखिए, ये सही है कि मुझे किसी भी बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था..। लेकिन इसका ये मतलब नहीं मुझे दर्द नहीं होता था..। अगर कोई मुझे चोट पहुंचाता तो मैं ज़रुर ज़रुर चीखता..। ऐहसास के स्तर पर भी ये बात लागू थी..। अगर कोई दयनीय होता तो उसपर वाकई मुझे दया आती..। उस रात भी मैं करुणा से ही सराबोर था..। मुझे निश्चय ही उस लड़की की मदद करनी चाहिए थी..। तो फिर मैंने ऐसा क्यों नहीं किया..? इसकी वजह वो ख्याल था जो उस वक्त मेरे ज़ेहन से जूझ रहा था..जिस वक्त लड़की मेरा हाथ खींच रही थी: सवाल वाहियात था लेकिन मुझे गुस्सा दिला रहा था..। गुस्सा इस बात को लेकर था कि अगर मैं खुदकुशी की दहलीज़ पर हूं तो फिर वाकई ये मेरी बेज़ारी की इंतहा की घड़ी होनी चाहिए थी..। तो फिर मुझे ऐसा क्यों लग रहा था..मैं उस लड़की से कहीं जुड़ा हूं..? शायद मैं इससे ज़्यादा उस लड़की को लेकर अपने जज्बातों के बारे में कह भी नहीं पाऊंगा..। लेकिन मुझे खुद पर गुस्सा आ रहा था..। विचारों की एक श्रृंखला के बाद दूसरी आकर घेर लेती..। मेरे सामने ये साफ हो गया था कि जब तक मैं शून्य में विलीन नहीं होता..ख़ाक में नहीं मिलता तब तक गुस्से और शर्मिंदगी को झेलने के लिए शापित रहूंगा..। अच्छी बात है लेकिन अगर मुझे दो या तीन घंटे में खुदकुशी ही करनी है तो मुझे उस लड़की से क्या वास्ता होना चाहिए? अब तो मैं मरने ही वाला था..। आखिर मैं उस लड़की पर क्यों चिल्लाया? इसीलिए तो कि अगले कुछ घंटों में मेरा वजूद खत्म होने वाला था..। हो सकता है कि आप सिर्फ इस वजह से मुतासिर न हों..लेकिन मैं अब तक इस नतीजे पर तकरीबन तकरीबन पहुंच चुका हूं..। मैं ऐसा महसूस कर रहा था मानो उस वक्त ज़िंदगी और ये दुनिया मुझपर निर्भर हों..। उन पलों में ऐसा लग रहा था मानो पूरी कायनात मेरे लिए ही बनी हो..। अगर मुझे खुद को गोली मारनी ही थी..तो दुनिया यकीनन मेरे लिए तो मिट ही जाएगी..।
मुझे याद है उस वक्त मैं बैठे बैठे सभी सवालों को हर नज़रिए से सोच रहा था..। तभी ज़ेहन में एक नया ख्याल कौंधा..। मान लीजिए अगर धरती से पहले मैं किसी और ग्रह पर रहा होता और वहां पर कोई सबसे बड़ा गुनाह मेरे हाथों हुआ होता; धरती पर आने के बाद भी मेरी यादाश्त बाकी रही होती.. ये भी पता होता कि अब मुझे कभी दोबारा उस ग्रह पर नहीं लौटना है तो उस वक्त आसमान की तरफ़ निहारते हुए मै क्या सोचता? क्या तब भी अपने किए पर मुझे पछतावे जैसा कुछ होता..? सवाल वाहियात थे क्योंकि रिवॉल्वर अब भी मेरे सामने पड़ी थी..और मेरे मन में कोई शुबहा नहीं था कि ये आज होकर ही रहेगा..। लेकिन ख्यालों का बहाव बेकाबू था..। ये साफ था कि अब एक मसले को निपटाए बिना जान देना मुमकिन नहीं होगा..। इस नन्हीं बच्ची ने मुझे उस रात बचा लिया था..।
खैर, इस दौरान सूबेदार के कमरे में माहौल शांत हो चुका था..। ताश का उनका खेल खत्म हो चुका था और अब बीच-बीच में उनकी गालियों की आवाज़ कानों में पड़ रही थी..। उसी लम्हे में मुझे बैठे-बैठे नींद आ गई..। ऐसा मेरे साथ पहली बार हुआ था..।
मैं बेसुध होकर सो गया..। आप जानते हैं सपने बड़ी अजीब चीज़ होते हैं..। उनमें से कुछ इतने सटीक और सजीव होते हैं मानो किसी जौहरी के हाथों गढ़े गए हों..। कुछ सपनों से आप बेसुध हालत में गुज़रते हैं, स्पेस और टाइम के नियम आपपर उस वक्त लागू नहीं होते..। सपने ख्याल नहीं ख्वाहिशों की कोख से पैदा होते हैं..। दिमाग से नहीं दिल से उपजते हैं..। लेकिन फिर भी कई बार मेरी विचार शक्ति ने सपनों में असंभव काम किए हैं..। मसलन मेरा एक भाई बचपन में ही गुज़र चुका है..। मैं कई बार उसका सपना देखता हूं: वो मेरे साथ हंसता है, रोता है, हम लड़ते भी हैं..। हालांकि मैं अच्छी तरह जानता हूं कि वो मर चुका है..। फिर मुझे सपने में उसे मेरी मदद करता देख मुझे हैरानी क्यों नहीं होती.. ? दिमाग उस वक्त उसकी मौजूदगी पर सवाल क्यों नहीं उठाता..? कभी-कभी मैं ये भी सोचता हूं कि जब हमें सपने में होते वक्त ये पता नहीं होता कि वो सपना है..तो फिर हम ये कैसे जानते हैं कि जिसे हम होश कहते हैं वो भी महज़ एक सपना नहीं है..? खैर छोड़िए, अब मैं आपको उस सपने के बारे में बताता हूं..। नवंबर तीन का वो ख्वाब..। अब वो मेरा मज़ाक उड़ाकर मुझे याद दिलाते नहीं थकते कि वो महज़ एक ख्वाब था..। क्या फ़र्क पड़ता है वो सपना था या हकीकत, अगर उसमें मैंने परम सत्य के दर्शन पा लिए हों..। एक बार सच देख लेने के बाद आप नींद में हों या होश में, आप जानते हैं कि कोई दूसरा सच नहीं हो सकता..। चलिए, आपकी सुहूलियत के मुताबिक इसे सपना ही मान लेते हैं..। लेकिन ये मत भूलिएगा कि उस रात मैं ज़िंदगी को ख़त्म करने की ठान चुका था.. वो ज़िंदगी जिसे हम सब सबसे ज़्यादा प्यार करते हैं..। और ये एक सपना...इस सपने ने मुझे एक और ही ज़िंदगी से मिलवा दिया.. असीम, अजेय और आनंद से सराबोर ज़िंदगी..।
ज़रा ध्यान से सुनिएगा..।

क्रमश:

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