बुधवार, दिसंबर 08, 2010

इक पागल का ख्वाब..-3

कहानी
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मैंने आपको बताया मुझे अचानक नींद आ गई लेकिन विचारोँ की श्रृंखला नहीं टूटी थी..। सपने में दिखा कि मैंने रिवॉल्वर उठा लिया और कुर्सी पर बैठे-बैठे उसे अपने सीने पर तान दिया, बिल्कुल अपने दिल के ऊपर..सिर पर नहीं..। वैसे प्लान के मुताबिक मुझे अपने सिर पर गोली चलानी थी..। सही-सही कहूं तो दाहिनी कनपटी पर..। मै रिवॉल्वर की नोंक को ऐन दिल पर रखकर पलभर के लिए रुका तभी मेरे कमरे की मोमबत्ती, टेबल और दीवारें मेरी आंखों के आगे झूलने लगीं..। मैंने फौरन गोली चला दी..। सपने में आप कभी कभी बहुत ज़्यादा ऊंचाई से गिरते हैं या फिर आपको मारा या पीटा जा रहा होता है लेकिन फिर भी आप दर्द महसूस नहीं करते..। जबतक कि आप बिस्तर पर खुद को ही चोट न पहुंचा बैठें..। तो मेरे सपने में भी ऐसा ही था: दर्द का आभास नहीं था लेकिन मैं महसूस कर रहा था जैसे ट्रिगर दबाने के साथ ही मेरे भीतर सभी कुछ पलभर के लिए दहक कर अचानक बुझ गया हो..। चारों तरफ़ घनघोर अंधकार छा गया..। ऐसा लगा जैसे अंधा और गूंगा हो चुका हूं..। मैं किसी सख्त चीज़ पर अपनी पीठ के बल लेटा हुआ था..। न तो मुझे कुछ नज़र आ रहा था और ना ही मैं खुद को हिला सकता था..। मेरे चारों तरफ़ लोग लौग दौड़े आ रहे थे..। सूबेदार अपनी भारी आवाज़ में चिल्ला रही थी..लेकिन मकान मालकिन की जुबान को मारे डर के लकवा मार गया था- फिर अचानक एक अंतराल और मुझे ताबूत में ले जाया जा रहा था..। मैं उसे डोलता हुआ महसूस कर सकता था..। पहली बार ऐहसास हुआ कि मैं मर चुका हूं, दीवार में गाड़ी गई किसी कील की तरह मृत..। न तो मैं हिल सकता था, ना ही देख सकता था..। लेकिन फिर भी महसूस करने की और सोच सकने की क्षमता बाकी थी..। खैर मौत के सच को मानने में तकलीफ़ नहीं हुई..। और जैसा कि सपनों में होता है हकीकत को स्वीकार करने के आड़े सवाल नहीं आए..। अब मैं ज़मीन में गड़ा हुआ था..। वो सब जा चुके थे..और मैं अकेला था..। जीते जी जब भी कब्र के बारे में सोचता था तो सिर्फ सीलन और मुर्दा शीत का ख्याल आता था..। अब भी ऐसा ही था..। मैं सिर्फ तलवों पर ठंड महसूस कर सकता था..और कुछ नहीं..। मैं कब्र में था और कहने में थोड़ा अजीब है लेकिन कुछ उम्मीद नहीं कर रहा था..। मुर्दा आदमी के पास उम्मीद करने के लिए कुछ नहीं होता, ये ऐसा सच है जिससे बचा नहीं जा सकता..।.कितना वक्त बीता होगा मुझे पता नहीं चल पाया..। लेकिन अचानक ताबूत के ढक्कन से रिसकर आई पानी की एक बूंद मेरी बंद आंख पर गिरी..। मिनट भर बाद एक बार और बूंद गिरी, फिर एक और बूंद...एक के बाद एक बूंदें..। दिल के भीतर गहरी हूक उठी..। उसमें दर्द उठने लगा..। “ये वही गोली है जो मैंने खुद पर चलाई थी..।” मैंने सोचा..। और एक-एक मिनट के अंतराल पर बूंदे मेरी बंद आंख पर गिरती रहीं..। अचानक मै अपनी चेतना का पूरा ज़ोर लगाकर पुकार उठा..। ये पुकार उस शह के लिए थी जो मेरे साथ हो रही हर चीज़ के लिए ज़िम्मेदार थी:
“तुम जो कोई भी हो, अगर यहां जो कुछ हो रहा है उससे ज़्यादा तर्कसंगत दुनिया में कहीं होता है तो उसे यहां घटित करो..। मैं तुमसे प्रार्थना करता हूं..। लेकिन अगर ये खुदकुशी का बदला है तो ये जान लो तुम्हारी हर प्रताड़ना के बीच भी मेरा खामोश विद्रोह जीवित रहेगा..। तुम्हारे विद्रोहियों के बीच मुझे युगों-युगों तक पूजा जाएगा..। ”
मैं इस प्रार्थना के बाद खामोश हो गया..। कुछ पलों तक खामोशी पसरी रही..। फिर एक बूंद गिरी..। लेकिन न जाने क्यों मुझे भरोसा था कि हर मंज़र जल्दी जल्दी बदलेगा..। और तभी मेरी कब्र खुल गई..। ये कैसे हुआ ये मुझे नहीं पता लेकिन अंजान और स्याह प्राणी ने मुझे पकड़ लिया..। पलक झपकने से पहले ही हम अंतरिक्ष में थे..। अब मैं देख सकता था..हम अंतहीन तम के बीचों बीच थे..। इससे पहले चेतना लौटती हम धरती को छोड़ चुके थे..इससे आप हमारी गति का अंदाज़ा लगा सकते हैं..। अपने अंजान साथी से मैंने कोई सवाल नहीं किया..। आखिर मेरी भी कुछ गरिमा थी, इसलिए मैंने इंतज़ार किया..। मैं खुद को भरोसा दिला रहा था कि मुझे डर नहीं लग रहा है बल्कि मैं इस बात पर खुश था कि मैं डर नहीं रहा हूं..। ये बताना मुश्किल है कि हम कितनी देर उड़ते रहे..ये भी नहीं बता सकता कि हमने कितना फासला तय किया..। आप जानते ही हैं सपनों में अक्सर ऐसा होता है कि आप स्पेस और टाइम को सीमाओं से परे सिर्फ उसी मंज़र पर रुकते हैं जिसका आपसे गहरा नाता होता है..। मुझे सिर्फ इतना याद है कि दूर फासले पर मुझे एक सितारा नज़र आया..।
‘क्या ये ध्रुव तारा है?’ हालांकि मैंने ज़ुबान बंद रखने की ठानी थी..लेकिन खुद को रोक नहीं पाया..। मेरे अंजान साथी का चेहरा कुछ-कुछ इंसानों से मिलता था..। हैरानी की बात है इकलौता साथी बल्कि गाइड होने के बाद भी वो मुझे कतई रास नहीं आ रहा था..बल्कि उससे एक खीझ सी महसूस हो रही थी..। मुझे पूरी तरह मिट जाने की उम्मीद थी..इसीलिए मैंने खुदकुशी की थी..। लेकिन फिर भी विडंबना देखिए मैं एक ऐसे जीव के हाथों में था जो इंसान तो नहीं था लेकिन उसके वजूद पर कोई शक नहीं था..। ‘तो आखिर मौत के बाद भी ज़िंदगी है!’ मैंने सोचा..। “अगर यहां भी वही हुआ” मैं इरादा कर रहा था..। “किसी ऊपरवाले के रहमो करम पर रहना पड़ा तो मैं घुटने नहीं टेकूंगा..।”
“तुम जानते हो मैं तुमसे डरता हूं इसीलिए तुम मुझे तुच्छ समझते हो..।” मैं अपने साथी से अचानक बोला..।
उसने उत्तर नहीं दिया..। मगर अचानक महसूस हुआ यहां कोई मुझे तुच्छ नहीं समझता, कोई मुझपर हंस नहीं रहा था..। मुझे ये भी लग रहा था कि इस सफ़र का मकसद है, एक अंजान, रहस्यमयी अर्थ की तलाश..ऐसा अर्थ जिसका ताल्लुक सिर्फ मुझसे है..। मेरे भीतर का डर हर वक्त बढ़ रहा था..। हम अंतरिक्ष के अज्ञात अंधकार में बढ़े चले जा रहे थे..। मैं जितने तारा-मंडलों को पहचान सकता था वो सब पीछे छूट चुके थे..। मैं जानता था ऐसे सितारे भी हैं जिनकी रोशनी धरती तक पहुंचने में करोड़ों साल का वक्त लगता है..। कौन जाने हम उसी स्पेस में उड़ रहे हों..। मैं कुछ ऐसी आशंका से घिरा जा रहा था..जो मेरे दिल को निचोड़े दे रही थी..। तभी कुछ जाना-पहचाना नज़र आया..। ये हमारा सूरज था! ये भी हो सकता था कि ये हमारी धरती का जनक न हो..और हम अपने सूरज से अरबों मील दूर हों..लेकिन ये हमारे अपने सूरज की हुबहू प्रतिछाया थी, न जाने कैसे मेरे अस्तित्त्व का रेशा-रेशा इस बात की गवाही दे रहा था..। मेरे दिल में बीती यादें फूट पड़ीं..। वही रोशनी जिसने मुझे धरती पर जिंदगी बख्शी यहां मेरे दिल में गूंजकर उसे पुर्नजीवित कर रही थी..। कब्र से निकलने के बाद पहली बार अपने भीतर जीवन के बचे अंश का अनुभव हुआ..।
“लेकिन अगर ये हमारे ही सूरज का हुबहू है तो फिर धरती कहां है?” मैं चिल्लाया..।
मेरे साथी ने दूर तैरते हरे मोती की तरफ़ इशारा किया..। हम सीधा उसी ओर बढ़े जा रहे थे..।
“लेकिन क्या समानांतर सत्य संभव है? क्या ‘पैरालल रिएलिटी’ कुदरत का नियम है? क्या ये धरती भी हमारी धरती की जुड़वां होगी..? वैसी ही निर्धन, नाखुश लेकिन फिर भी प्यारी धरती? क्या इसपर चलने वाले बाशिंदे भी इसे मां कहते होंगे? ” न जाने कहां से मेरी आंखें नम हो गई थीं, पीछे छूट चुकी अपनी धरती का ग़म मुझे सराबोर कर रहा था..।
उस रात मिली लड़की का चेहरा मेरे दिमाग मैं कौंधा..।
“सब पता चल जाएगा..।” मेरे साथी ने जवाब दिया, उसकी आवाज़ में अजीब सी उदासी थी..। हम तेज़ी से उस ग्रह तक पहुंच रहे थे.। वो मेरी आंखों के सामने विशाल होता जा रहा था..। मैं पहले समंदर फिर एशिया को पहचान सकता था..। तभी एक तीखी लेकिन पवित्र किस्म की ईर्ष्या से मेरा दिल सुलग उठा..।
“ऐसा दोहराव कैसे मुमकिन है और आखिर क्यों..? मैं सिर्फ उस धरती से प्यार कर सकता हूं जिसे पीछे छोड़ आया हूं बल्कि करता हूं..। लेकिन मैंने उसे अपने खून से रंगा..कितना नाशुक्रा था मैं..! लेकिन फिर भी कभी..कभी धरती से मेरा प्यार कम नहीं हुआ..। बल्कि जिस रात उसे छोड़ा उस रात शायद सबसे ज़्यादा प्यार किया..। क्या इस नई धरती पर भी पीड़ा होगी..? हमारी धरती पर तो हम सिर्फ दर्द के साथ और दर्द के रास्ते ही प्यार तक पहुंच सकते हैं, हमें प्यार का कोई दूसरा रास्ता मालूम नहीं..। हां, मैं इस तड़प को महसूस करना चाहता हूं..। ओह! काश आंसुओं के साथ भीगे इन गालों के साथ अपनी प्यारी धरती को इस वक्त चूम सकता..। नहीं, किसी दूसरी धरती पर जीवन मुझे स्वीकार नहीं है... ”
लेकिन मेरा साथी मुझे छोड़कर जा चुका था..। कब मैं इस नई धरती के एक उजले दिन में खड़ा था..पता ही नहीं चला..। मैं भारत की ज़मीन के नज़दीक किसी द्वीप पर था..। यहां सबकुछ हमारी धरती जैसा ही था; बस नज़र आने वाली हर चीज़ एक अनोखे तेज से नहा रही थी..। एक ऐसी कांति जो अंतिम विजय पाने वालों के चेहरे पर नज़र आती है..। शांत, नीला समंदर नर्म थपकियों से साहिल को सहला रहा था..। खूबसूरत, लंबे पेड़ कतारों में सजे हुए सैनिकों की तरह लग रहे थे..। उनके पत्तों की सुरीली सरसराहट प्यार में डूबे लफ्ज़ों के साथ मेरा इस्तकबाल कर रही थीं..।
हरी घास पर ओस से चमकते फूलों की खुश्बू बिखरी थी..। हवा में पंछियों के उड़ते झुंड कोलाहल मचा रहे थे..। उनमें से कुछ मुझसे बिना डरे मेरे कंधे और हाथों पर बैठ रहे थे..। आखिरकार मेरा वास्ता इस जन्नत सरीखे ग्रह के लोगों से भी पड़ा..। वो खुद मेरे पास आए..। उन्होंने मुझे घेर लिया..। उन्होंने बारी-बारी से मेरे हाथ चूमे..। सूरज की वो संताने, अपने सूरज की वो संतानें- ओह! कितने खूबसूरत थे वो लोग..! पृथ्वी के इंसानों में इतनी खूबसूरती मैंने कभी नहीं देखी..। शायद बचपन के शुरूआती दिनों में ही इस खूबसूरती की एक हल्की सी झलक हम अपने भीतर देख सकते हैं..। वहां के हर एक बाशिंदे की आंखों में एक रूहानी चमक थी..। उनके चेहरों पर ऐसा नूर था जो शांत चित्त की निशानी है..। उनकी आवाज़, उनके शब्दों में बच्चों जैसा उल्लास था..। ओह! उन चेहरों को एक नज़र देखकर ही मैं सब समझ गया, सब कुछ..! इस धरती पर पतन के दाग नहीं थे..। यहां के लोग ऐसे थे..जिनके पूर्वज ने शायद ज्ञान का फल चखने का ‘गुनाह’ नहीं किया था..। शायद इसलिए वो उसी जन्नत में रहते थे..जहां से हमारी धरती के पूर्वजों को निकाला गया था..। इन हंसते, नाचते लोगों ने अपनी सादगी और प्यार से मुझे अभिभूत कर दिया..। वो मुझे अपने घर ले गए..। उनमें से हर एक मेरे मन को शांति दिलाने के लिए बेताब था..। उन्होंने मुझसे कोई सवाल नहीं पूछा..। शायद वो पहले से सबकुछ जानते थे..और वो मेरे चेहरे से दर्द की हर शिकन मिटाने की ठान चुके थे..।

क्रमश:

2 टिप्‍पणियां:

  1. बेनामी13 दिसंबर, 2010

    Haan PAGAL ka kwab hi hai ye..mann na jane kitne sapne bunta hai, kitne sach dkhta h aur dkh ke b andekha kar deta hai.darta hai samaj se.man ka aaina saaf nahin.vhi deta hai jo mila hai..

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