शनिवार, दिसंबर 11, 2010

इक पागल का ख्वाब..-4

कहानी
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देखिए, मैं फिर दोहरा रहा हूं: हम ये मानकर चल रहे हैं कि ये एक सपना था..। लेकिन उन मासूम और खूबसूरत लोगों के प्यार का ऐहसास हमेशा मेरे साथ रहा है..। उसे अब भी महसूस कर सकता हूं..। ऐसा लगता है अंतरिक्ष के उस अंजान कोने से बहकर आ रहा प्यार का झोंका अब भी मुझे सहला रहा है..। हां, मैंने खुद उन बाशिंदों को देखा और जाना है..। मैंने भी उनसे प्यार किया..और इसी प्यार के लिए बाद में तड़पा भी..। आह! ये तो मैं हमेशा जानता था कि उनके बारे में ऐसी कई चीज़ें हैं जो मैं कभी नहीं समझ पाऊंगा..। मुझ जैसा आधुनिक, प्रगतिशील (भले ही दयनीय देश का दयनीय नागरिक ही सही) बहुत चीज़ों को जानने का दावा कर सकता है..। लेकिन वो हमारी साइंस से पूरी तरह अंजान थे..। जल्द ही मैं समझ गया कि उनका पूरा ज्ञान ऐसे ज़ज़्बातों से उपजा और पोषित था..जिससे हम धरती के लोग पूरी तरह नावाकिफ़ हैं..। उन लोगों के भीतर कोई ख्वाहिश नहीं थी..। उनमें से हर एक शख्स अपने साथ सच्ची दोस्ती निभा रहा था..। उनके भीतर हमारी तरह ज्ञान की चाह भी नहीं थी..क्योंकि उनका जीवन खाली नहीं था..। फिर भी उनकी समझ हमारे विज्ञान की सीमाओं से कहीं आगे थी..। हमारा विज्ञान ज़िंदगी के मायनों की तलाश के लिए पागल रहा है, सिर्फ इसलिए कि हम जीने का सही तरीका सीख सकें..। वो लोग विज्ञान के बगैर जीना भी जानते हैं, ये तो मैं समझ सकता था लेकिन उनका ज्ञान मेरे विवैक से परे था..। उन्होंने मुझे अपने बगीचों की सैर करवाई लेकिन मैं उस छलकते प्रेम के स्त्रोत को नहीं समझ सका..जो पेड़ों को निहारती उनकी नज़रों में था..। ऐसा लगता था कि वो पेड़ों से नहीं बल्कि अपने जैसे ही इँसानों से बात कर रहे हों..। और मैं जब ये कह रहा हूं कि वो पेड़ों से बात करते लगते थे तो यकीन जानिए कोई अतिश्योक्ति नहीं गढ़ रहा हूं..। हां, वो पेड़ों की ज़ुबान जानते थे और मुझे पूरा यकीन है कि पेड़ भी उनकी भाषा समझते थे..। पूरी कुदरत के साथ उनका सौहार्द था..। जानवर उनपर हमला नहीं करते थे..ये भी उनके प्रेम का ही जादू था शायद..। सजीली रातों में उन्होंने सितारों के बारे में मुझे ऐसी बातें बताईं जो मेरी बुद्धि नहीं समझ सकती थी..। लेकिन ये मानना ग़लत नहीं होगा कि वो सितारों से भी बात कर सकते थे; ख्यालों में नहीं बल्कि किसी असल तरीके से..। उन्हें इस बात से कोई सरोकार नहीं था कि मैं उन्हें समझ सकता हूं या नहीं..। इसके बिना भी वो मुझसे प्यार करते थे..। ये अंदाज़ा मुझे भी था कि शायद मेरी बातें उन्हें अजनबी लगें..इसलिए मैंने कभी उनसे अपनी धरती का ज़िक्र नहीं किया..। जिस ज़मीन पर उनके कदम पड़ते थे, मैंने उसका सजदा किया..। उन लोगों को लेकर मेरे मन में खामोश श्रद्धा थी..। उन्होंने मुझे अपनी पूजा करने का हक दिया..उन्हें इस बात की शर्मिंदगी नहीं थी कि मैं ऐसा कर रहा हूं..क्योंकि उनके दिल के प्याले प्रेम की मदिरा से भरे हुए थे..। कभी बहती आंखों के साथ मैं उनके कदम चूम लेता लेकिन मैंने उन्हें अफसोस जताते नहीं सुना..। कई बार मैं हैरान होकर सोचता कि आखिर मुझ जैसे शख्स को भी वो बिना चोट पहुंचाए वो कैसे रह सकते हैं..? उनकी मौजूदगी मुझमें किसी ईर्ष्या का सबब भी नहीं बनी..। मुझे आश्चर्य इस बात का भी था कि मुझमें उन्हें अपने विज्ञान या दर्शन का पाठ पढ़ाने की भी कोई उत्कंठा नहीं थी..। वो हमारी धरती के बच्चों की तरह खिलंदड़ और उमंग से भरे थे..। अपने खूबसूरत वनों और उपवनों में बेलौस घूमते, खूबसूरत तराने छेड़ते..। फल, शहद, दूध..उनका भोजन भी बेहद साधारण था..। रोटी, कपड़े और मकान के लिए उनमें से किसी को भी ज़िंदगी भर नहीं पिसना पड़ता था..। हां, उनके दिलों में इश्क की लौ भी फड़कती थी, वो बच्चे पैदा करते थे..। लेकिन उनकी कामेच्छा को कभी क्रूरता में तब्दील होते मैंने नहीं देखा..। जी हां, वही बेकाबू ज़ज़्बात जिसे हमारी धरती पर तकरीबन हर बवाल की जड़ माना जाता रहा है..। अपने बच्चों की किलकारियों में वो भी बच्चे बनकर शरीक होते..। दुश्मनी या रंजिश जैसे लफ्ज़ भी उनके कानों में कभी नहीं पड़े थे..। वहां एक की संतान सबकी संतान थी..क्योंकि वो एक परिवार ही थे..। वहां मृत्यु थी मगर बीमारी नहीं..। उस ग्रह के बुज़ुर्ग इतनी शांति से शरीर छोड़ते थे मानो नींद के आगोश में समा रहे हों..। मैंने ऐसे एक भी लम्हे में अवसाद या आंसू नहीं देखे..। हालांकि ये माना जा सकता है कि वो मरने वालों के साथ भी संवाद कायम कर सकते थे..। लेकिन जब मैंने उनसे अजर, अमर आत्मा के बारे में पूछा तो वो बस बच्चों जैसी अबोधता से मुझे ताकते रहे..। शायद उनके लिए ये कोई सवाल था ही नहीं..। उस ग्रह पर मंदिर, मस्ज़िद या गिरिजाघरों जैसा कुछ नहीं था..। उनकी चेतना को अस्तित्त्व के साथ एकात्मकता का सतत बोध था..। फिर भला मज़हब की क्या ज़रुरत होती..? उन्हें मालूम था कि जितना उनके दैहिक सुख कुदरत की सहज सीमा के नज़दीक पहुंचेंगे..उतना ही इस अस्तित्त्व के साथ वो एक होते जाएंगे..। शाम के वक्त, सोने से पहले वो एक साथ जुटते और अंतस को पिघलाकर रख देने वाले संगीत पर झूमते..। उनके गीतों में बीत चुके दिन के सभी ऐहसास बयां होते..। कुदरत, अपनी धरती, समंदर, जंगलों और पहाड़ों के लिए उनकी ज़ुबान पर सिर्फ प्रार्थना थी..। वो एक दूसरे की स्तुति में गीत रचते और बच्चों की तरह एक दूसरे की तारीफ़ करते..। उनका संगीत सादा था..। वो सीधा दिल से पैदा होता और दिल को छू लेता..। मैं तरन्नुम को तो महसूस कर सकता था..लेकिन शब्दों की गहराई मेरी पहुंच से बाहर थी..। मैं उन्हें अक्सर बताता कि धरती पर उदासी के चरम पलों में मुझे इस आनंद का पूर्वाभास सालों पहले ही हो चुका था; कि उनकी इस गरिमा को मैं दिल की गहराई से निकले ख्वाबों में कई बार जी चुका हूं; कि अपनी धरती पर मैं कैसे ढलते सूरज को कभी नम आंखों के बगैर नहीं देख पाता था..। मैंने उन्हें अपनी धरती के इंसानों को लेकर अपने भीतर पल रही असीम घृणा के बारे में भी बताया..। मैंने उनसे पूछा कि आखिर उनसे प्यार किए बिना मैं उनसे नफ़रत क्यों नहीं कर पाता..? मैं उन्हें माफ़ क्यों नहीं कर पाता..? वो मुझे ग़ौर से सुनते लेकिन मैं ये बता सकता हूं कि वो मेरे सवालों को समझने में असमर्थ थे..। मुझे इन सवालों पर रंज नहीं था..। क्योंकि वो जानते थे कि जिन्हें उस धरती पर छोड़कर आया हूं उनके लिए मेरा दिल कैसे पिघलता है..। जी हां, जब वो मेरी तरफ़ देखते, उनकी नज़रें डबडबाई होतीं..। जब मुझे आभास हुआ कि उनकी मौजूदगी में मेरा दिल भी उनकी तरह निश्छल हो गया है तो फिर उन्हें न समझ पाने का मेरा अफ़सोस भी जाता रहा..। जीवन की परिपूर्णता से मैं स्तब्ध था और खामोशी से उन बाशिंदों को पूज रहा था..।
ओह! अब सब मुझपर हंसते हैं..। हर किसी का यही कहना है कि ये अनुभव सिर्फ मेरे परेशान दिल की कल्पना थी..। जब मैंने उनसे ये कहा कि शायद वो सही हैं तो आपको क्या बताऊं उनकी चुहलबाज़ी की कोई सीमा नहीं थी..। लेकिन मेरे घायल दिल में अगर कुछ धड़क रहा था तो सिर्फ इस सपने का ऐहसास था..। मेरे ख्वाब की आकृतियां इस कदर नाज़ुक, दिलकश और खूबसूरत थीं कि जागने के बाद उन्हें शब्दों का बाना पहनाना मुश्किल था..। बल्कि नामुमकिन..। इसलिए इस सपने की याद में कुछ कड़ियों का खो जाना लाज़िमी था..। हो सकता है बाद में मेरे अवचेतन ने अपनी कल्पना से उन्हें जोड़ा हो..। लेकिन क्या इसका मतलब ये है कि जो कुछ हुआ मुझे उसपर यकीन करने का हक नहीं..? असलियत तो ये है कि वो सपना इस हकीकत से हज़ार गुना ज़्यादा अच्छा था..। तो क्या हुआ अगर ये महज़ एक सपना था..? इतना सौंदर्य शायद सपने के दामन में ही समेटा जा सकता है..। ख़ैर चलिए, मैं आपको राज़ की बात बताता हूं: शायद ये वाकई सपना नहीं था..! क्योंकि इसके बाद जो कुछ हुआ वो इतना वास्तविक था कि महज़ मेरे मन की छिपी हुई कल्पना नहीं कहा जा सकता..। मान लिया, मेरे सपने के लिए मेरा दिल ज़िम्मेदार था, मगर इसके बाद जो सच सामने आया क्या उसके लिए भी मेरे दिल को ही ज़िम्मेदार ठहराएंगे..? निश्चय ही मेरे उलझे दिमाग और टूटे दिल से ऐसा विराट सत्य नहीं उपज सकता! आप खुद ही फैसला कीजिएगा..। अब तक मैं छिपाता रहा लेकिन अब पूरा सच बताऊंगा..। हकीकत ये है कि उस जन्नत को उजाड़ने वाला भी मैं ही था..!


क्रमश:

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