शनिवार, दिसंबर 18, 2010

इक पागल का ख्वाब..-5

कहानी
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हां,हां, इसका अंत मेरे हाथों उस दुनिया के पतन से हुआ..। ये कैसे हुआ..ठीक से याद नहीं..। शायद मेरे सपने का आयाम हज़ारों साल तक फैला था.. मेरे भीतर सिर्फ उसकी धुंधली सी याद है..। बस इतना जानता हूं कि उस जन्नत के उजड़ने का ज़िम्मेदार मैं ही था..। पेट में पलने वाले कीड़े या पूरे साम्राज्य को निगल जाने वाले प्लेग की तरह..। न सिर्फ वो झूठ बोलना सीख गए बल्कि फरेब की खूबसूरती ने भी उन्हें कायल बना दिया..। शायद इसकी शुरुआत अंजाने में ही हुई..। मज़ाक में या मेरे बड़बोलेपन की वजह से..या फिर किसी कीटाणु का ही संक्रमण रहा होगा..। लेकिन इस कीटाणु ने उनके दिल में घर कर लिया था..और न जाने क्यों उन्हें ये अच्छा भी लग रहा था..। जल्द ही उनमें विलासिता की चाह पैदा हुई..। विलासिता ईर्ष्या लेकर आई, और ईर्ष्या- क्रूरता...ओह, मैं नहीं जानता, मुझे वाकई याद नहीं ये कैसे हुआ लेकिन जल्द ही उस ज़मीन पर इंसान के खून की पहली बूंदें गिरीं..। वो लोग हतप्रभ और खौफ़ज़दा थे..। अब वो एक दूसरे से जुदा होने लगे..। उन्होंने गठबंधन बना लिए..। लेकिन सभी गठजोड़ एक दूसरे के खिलाफ़ थे..। धीरे-धीरे एक दूसरे पर उंगलियां उठने लगीं..। न सिर्फ उन्हें शर्म ने छू लिया वो इसे गहना भी मानने लगे..। फिर उनमें अहम जाग गया..। हर फिरका खुद को सर्वोपरि मानने लगा..। वो जानवरों को सताने लगे इसलिए उन बिचारों को जंगलों की शरण लेनी पड़ी..और दोनों हमेशा के लिए एक दूसरे के दुश्मन हो गए..। इंसान ख़ानों में बंटने लगे..। ‘तेरा-मेरा’ शुरू हो गया..। अब उनकी भाषाएं भी अलग-अलग थीं..। ग़म से भी उनका वास्ता पड़ने लगा..। आहिस्ता-आहिस्ता उन्होंने ग़म को ही गले लगा लिया..। वो यहां तक मानने लगे कि सिर्फ कष्ट ही जीवन है और उसके ज़रिए ही सत्य तक पहुंचा जा सकता है..। यही वो वक्त था जब उनके बीच विज्ञान ने जन्म लिया..। जब वो दुष्ट हो गए तो भाईचारे और इंसानियत की बात करने लगे..। अब वो इनकी कीमत समझते थे..। गुनाह थे तो कानून का भी अविष्कार ज़रुरी था..। संविधान रचे गए..। उस किताब को कोई छू न पाए इसके लिए सलीब खड़े कर दिए गए..। जो उन्होंने खोया था अब सिर्फ उसकी फीकी सी याद बाकी थी..। वो कभी भरे-पूरे भी थे, उनके लिए यकीन करना मुश्किल था..। अतीत की खुशी का वजूद तक कुछ के लिए परिहास बन गया..।इसकी संभावना तक को ‘युटोपीअ’ कहा जाने लगा..। मगर हैरानी इस बात की थी कि उनके दिलों में बिछड़े आनंद से पुनर्मिलन की प्यास भी उतनी ही बढ़ने लगी..। जिसे उनका दिमाग ‘परीकथा’ कहकर खारिज करता..उनका दिल उसी शह पर कुर्बान होता..। इसी प्यास को मंदिरों-मस्ज़िदों में सजाकर महान बना दिया गया..। वो अपने ही विचार, अपनी सबसे अज़ीम ख्वाहिश को पूजने लगे..। हालांकि भीतर ही भीतर वो मुक्तता को कपोल-कल्पना भी मानते रहे..। उन्होंने मसीहा गढ़े..। लेकिन खुद मौका दिए जाने पर भी ईश्वर-पुत्र बनने को कतई तैयार नहीं थे..। इसकी सफाई मुझे कुछ यूं दी गई,-“ तो क्या हुआ अगर हम बेईमान, क्रूर और अन्यायी हैं..? हम जानते हैं और हमें इसपर अफ़सोस भी है..। इसी वजह से हमने खुद को सताने के हज़ारों तरीके खोजे हैं..। हमने खुद को जितनी सज़ा दी है उतनी शायद हमारे गुनाहों का वो निर्णायक भी नहीं दे पाएगा..जिसका नाम तक हम नहीं जानते..। मगर हमारे पास विज्ञान है और इसके बूते पर हम एक बार फिर सत्य खोजेंगे..। हां, हम सच को स्वीकारेंगे तभी जब विवेक राज़ी होगा..। ज्ञान भावनाओं से ऊंचा है और जीवन का बोध जीवन से श्रेष्ठ..। विज्ञान हमें समझ देगा..। इस समझ से हम आनंद की राह खोज लेंगे..। आनंद की तलाश आनंद से ज़्यादा कीमती है..। “ हां, उन्होंने मुझसे यही कहा और ऐसा कहने के बाद उनमें से हर कोई खुद को दूसरे से बेहतर प्यार करने लगा..। खुद को सबसे श्रेष्ठ और भिन्न साबित करना उनमें से हर एक का मकसद बन गया..। इसके बाद गुलामी का दौर आया..यहां तक अपनी मर्ज़ी से गुलामी भी शुरू हो गई..। कमज़ोर अपनी स्वतंत्रता को ताकतवर के सामने बेचने के लिए सहर्ष तैयार थे..शर्त सिर्फ इतनी थी कि वो इसके एवज में खुद से भी कमज़ोर को दबा पाएंगे..। फिर प्रवर्तक आए; करुणा में डूबे सुरों में उन्होंने लोगों को उनकी खोई गरिमा की याद दिलाने की कोशिश की..। उनका मज़ाक उड़ाया गया..उन्हें ज़हर के प्याले दिए गए..। उनके पवित्र खून से मंदिरों के दरवाज़े दागदार हो गए..। फिर ऐसे लोगों की जमात पैदा हुई जिन्होंने ये सोचा कि उनका समाज दोबारा कैसे एक हो..। ताकि हर किसी को खुद से प्यार करने का हक भी मिले और एक दूसरे की ज़िंदगी में दखलअंदाज़ी भी न हो..। समाज के ऐसे ढांचों की परिकल्पना की गई जो कम अज़ कम एक साझा समझ की नींव पर खड़े हों..। इस सिद्धातों पर हज़ारों जंगें हुईं..। वो लड़ रहे थे लेकिन फिर भी एक बात पर एकराय थे कि ज्ञान, विज्ञान और खुद को बचाने की कुदरती ज़रुरत इंसानियत को एक बेहतर समाज में ज़रुर बदलेगी..। ऐसा जल्द हो इसके लिए पहुंचे हुए बुद्धिमानों ने उनके सिद्धांतों को न समझने वालों का सफाया शुरू कर दिया..। आखिरकार खुद को बचाने की सहज वृति भी साथ छोड़ने लगी..। ऐसे रईसों की जमात खड़ी हो गई जो अपने लिए ‘सबकुछ’ मांगने लगे और इसके लिए उन्हें जान देने या लेने से भी परहेज़ नहीं था..। ऐसे धर्म पैदा हो गए जो अस्तित्त्व को ही नकारते थे..। चिर शांति और अनास्तित्त्व की प्राप्ति के लिए आत्म-विध्वंस उनकी राह थी..। आहिस्ता-आहिस्ता वो लोग इस व्यर्थ की मेहनत से ऊब गए..। उनके चेहरों पर दर्द की शिकन साफ़ थी..। अब उन्होंने ऐलान किया कि पीड़ा ही सौंदर्य है..बल्कि यही उनके अस्तित्त्व का सूत्र है..। उनकी कविताओं, गीतों में दर्द का गुणगान था..। मैं उनके बीच मुठ्ठियां भींचकर, अफसोस से भरा हुआ चलता..। लेकिन मैं अब भी उनसे प्यार करता था शायद पहले से भी ज़्यादा..। ओह, कितना अजीब है! अब ये धरती मुझे उस वक्त से भी ज़्यादा प्यारी थी जब वो जन्नत थी..। सिर्फ इसलिए कि अब यहां भी दर्द की हवाएं बहने लगी थीं..। अफसोस, मुझे पीड़ा से प्रेम हुआ लेकिन सिर्फ अपने लिए, सिर्फ अपने लिए; उनके लिए अब मेरा दिल रोता था..। मैं कभी खुद को दोषी ठहराता कभी उन्हें कोसता..। मैंने उन्हें बताया कि इसके लिए सिर्फ मैं ज़िम्मेदार हूं..। मैंने उनसे सलीब पर टांगने की मिन्नतें कीं..। बल्कि मैंने उन्हें सलीब बनाना सिखाया..। मैं खुद को नहीं मार सकता था..इतना साहस नहीं था मुझमें; लेकिन उनके हाथों शहीद होने की उत्कंठा थी..। वो सिर्फ मुझपर हंसकर रह जाते..। आखिरकार वो मुझे पागल और सनकी समझने लगे..। उन्होंने मुझे जायज़ ठहराया..। उनका कहना था कि उन्हें वही मिला जो वो चाहते थे और नियति को बदला नहीं जा सकता था..। मुझे कहना पड़ा कि मैं उनके लिए ख़तरा बन चुका हूं और वो मुझे किसी पागलखाने में बंद कर दें..। फिर गहरी उदासी ने मेरे दिल को कुछ ऐसे बेधा कि मुझे लगा मैं मरने वाला हूं..। और फिर- फिर, फिर मैं जग गया..।
सुबह हो चुकी थी..सूरज अभी नहीं उगा था..। करीब छह बजे होंगे..। मैंने खुद को उसी आराम कुर्सी पर पाया..। कमरे की मोमबत्ती बुझ चुकी थी..। सूबेदार और उसके मेहमान बगल के कमरे में सो रहे थे..। चारों तरफ़ मौन फैला था जो मेरे उस ठिकाने के लिए दुर्लभ था..। मैंने पहला काम ये किया कि हैरानी के साथ उछल पड़ा..। मेरे साथ इस तरह का कुछ भी पहले कभी नहीं हुआ था..। मसलन इससे पहले मैं कभी आरामकुर्सी पर नहीं सोया था..। अचानक मैं खड़ा हो गया..और होश की पहली नज़र रिवॉल्वर पर पड़ी..। वो अब भी वहां पड़ा था..मैंने उसे फौरन सरकाकर किनारे कर दिया..। ओह! कितनी तीव्र जीजिविषा मेरे भीतर हिलोरें ले रही थी..। मैंने हाथ उठाए और उस परम सत्य को याद किया..। नहीं, याद नहीं किया बल्कि मैं रोने लगा..। आनंद..!! असीम और अनंत परमानंद से मैं मदहोश था..। जीवन और जोग..! उस एक लम्हे ने मुझे जोगी बना दिया..। अब मैं शहर दर शहर भटकूंगा, लोगों को राह दिखाने के लिए..। कौन सी राह..? सच की राह..क्योंकि अब मैं सच को पहचानता हूं..। मैंने उसे उसकी नग्नता में अपनी आंखों से देखा है..। तो फिर उसके बाद से मैं जोगी बनकर घूम रहा हूं..। अब पहले से भी ज़्यादा खुद पर हंसना पसंद करता हूं..। ऐसा क्यों है? नहीं जानता..बताना मुमकिन भी नहीं है, लेकिन चलिए इसे ऐसे ही रहने दीजिए..। वो कहते हैं कि मैं अब भी भ्रमित और डगमगाता हुआ जान पड़ता हूं..और अगर अभी ये हाल है तो आगे क्या होगा..? मुमकिन है कि कल मैं और ज़्यादा बेहूदा हो जाऊं..। लेकिन सत्य मुझसे स्वत: स्फूर्त होकर बहे..इसके लिए मुझे कई बार डगमगाना होगा..। इसलिए क्योंकि सत्य शब्दातीत है..। ये हकीकत मेरे सामने सूरज की रोशनी की तरह साफ़ है..। अपने भगवान के लिए मुझे ये बताइये कौन है जो ज़िंदगी में कभी डगमगाया न हो..? फिर भी हम सभी एक ही मंज़िल के मुसाफिर हैं..। हम सबकी मंज़िल एक है..। चाहे दार्शनिक हो या खूनी..रास्ते अलग हैं मंज़िल एक है..। ये सच अनगिनत बार दोहराया जा चुका है..लेकिन मैं आपको ये बताना चाहता हूं कि मेरा भ्रम स्थायी नहीं हो सकता..। क्योंकि मैं सच को समेटे हुए हूं..। मैं जानता हूं कि जीने की काबिलियत को गंवाए बगैर भी इंसान खूबसूरत और खुशमिजाज़ हो सकते हैं..। मेरे लिए ये मानना असंभव है कि शैतानियत ही इंसान की वास्तविकता है..। मगर वो मेरे इस भरोसे पर भी हंसते हैं..। मेरे पास सच है, मैंने इसका अविष्कार नहीं किया..। मैंने इसे सिर्फ सहेज कर रखा है और मैं ये नहीं मान सकता कि ये बाकियों में नहीं हो सकता..। फिर मैं भ्रमित कैसे हो सकता हूं..? हां, मैं राह भूल सकता हूं..। मैं डरता हूं कि गाहे बगाहे ऐसे शब्दों का भी इस्तेमाल कर सकता हूं जो मेरे अपने नहीं हैं..। लेकिन सच के इस दीए को मुझसे कौन छीन सकता है..? यही लौ मुझे बार-बार सही रास्ते पर लेकर आएगी..। मैं अपनी फकीरी में अलमस्त हूं..। जब तक ज़िंदा रहूंगा ऐसे ही रहूंगा..। पहले मैं आपको ये राज़ नहीं बताना चाहता था कि उस दुनिया को उजाड़ने वाला मैं ही था..। लेकिन वही सत्य मेरे कानों में आकर कह गया कि कई बार न कहना भी झूठ कहने जैसा होता है..। दीए ने फिर राह दिखाई..। मैं नहीं जानता धरती को जन्नत बनाने का तरीका क्या है..? क्योंकि मैं उस तरीके को शब्दों में ढाल सकने में असमर्थ हूं..। उस सपने के बाद मैं चीज़ों को शब्दों का रूप देना ही भूल गया..। लेकिन मैं चलता जाऊंगा, चलता जाऊंगा...क्योंकि सच को मैंने अपनी आंखों से देखा है..। हां, मैं उसे शब्दों में बयान नहीं कर सकता..। ये हंसी उड़ाने वाले कभी नहीं समझेंगे..। “आह! उसने महज़ सपना देखा..।” वो कहते हैं एक भ्रम, एक मिथक..। ये कहते हुए उन्हें गर्व होता है..। एक सपना! आखिर क्या होता है सपना..? और इस ज़िंदगी का क्या..? क्या ये भी महज़ सपना नहीं है..? मैं इससे ज़्यादा नहीं कहूंगा: अगर- हां, अगर ऐसा कभी नहीं भी हुआ तो भी...अगर धरती पर जन्नत मुमकिन न हो तो भी..मैं जोगी बनकर फिरता रहूंगा..। और उस जन्नत को उतारने के लिए किसी तपस्या या क्रांति की ज़रुरत नहीं है..। उसका अवतरण इस लम्हा भी हो सकता है..। बस अगर हम अपने पड़ोसी से भी उतना ही प्यार करना सीख जाएं जितना खुद से करते हैं..। यही सबकुछ है- और कुछ मायने नहीं रखता..। जानता हूं ये बार-बार कहा जा चुका है..। लेकिन फिर भी इंसानों के बीच ऐसा होता हुआ नज़र नहीं आता..। “जीवन का बोध..जीवन से श्रेष्ठ है..। आनंद का ज्ञान आनंद से श्रेष्ठ है”- यही वो ख्याल है जिसके खिलाफ़ हमें लड़ना है! और मैं इसके खिलाफ़ लड़ता रहूंगा..। अगर हम सब मिलकर चाहें तो जन्नत इस वक्त भी मुमकिन है..!
और हां- मैंने उस लड़की को भी बाद में खोज लिया...मैं लड़ता रहूंगा..मैं लड़ता रहूंगा..।

समाप्त

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