शुक्रवार, दिसंबर 03, 2010

इक पागल का ख्वाब..-1

कहानी
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मुद्दतों बाद एक पुराने साथी ने मुझे याद करने की मेहरबानी दिखाई..। सिर्फ ये कहने के लिए कि “आपका दिमाग खराब हो गया है..!”
“कोई नई बात करो..।” मेरा जवाब था..। उसकी बात ग़लत नहीं थी..। मैं वाकई बेहूदा किस्म का इंसान हूं..। बल्कि कुछ लोग अब मुझे संजीदगी से सनकी मानने लगे हैं..। लेकिन अब मुझे इसपर गुस्सा नहीं आता..। जब वो मुझपर हंसते हैं तब भी मुझे प्रिय हैं..हां तब भी..! यूं मुझे उनके साथ हंसने में कोई ऐतराज़ नहीं है..खुदपर तो कतई नहीं, क्योंकि मैं उनसे प्यार करता हूं..। लेकिन मेरे चेहरे पर उदासी घिरी रहती है क्योंकि मैं जानता हूं वो सच नहीं जानते..जबकि मैं जानता हूं..। ओह! कितना मुश्किल है दुनिया में सच जानने वाला इकलौता शख्स होना! लेकिन ये वो नहीं समझ सकते, नहीं, कभी नहीं समझ सकते..। हालांकि अतीत में मुझे बेहूदा दिखने से डर लगता था..। नहीं दिखने में नहीं, बल्कि बेहूदा होने में..। वैसे अटपटा तो हमेशा से रहा हूं..मुझे लगता है ये बात शायद जन्म से ही जानता हूं..लेकिन इतना तो तयशुदा बता सकता हूं कि तीसरी जमात के बाद से मैं ऐसा ही रहा हूं..। स्कूल के बाद कॉलेज गया, फिर यूनिवर्सिटी-जितना ज़्यादा मैं सीखता गया- ये ऐहसास भी उतना ही पुख्ता होता रहा कि मैं बेहूदा हूं..। यूनिवर्सिटी में बिताए दिन हसीन ज़रुर थे लेकिन मानो बस यही साबित करने के लिए ज़िंदगी में दर्ज हुए हों..। पढ़ाई के दौरान ही नहीं उसके बाद भी साल दर साल ये भाव गहराता गया कि मैं बेहूदा हूं..। वो हमेशा मुझपर हंसते थे..। लेकिन बिचारे ये नहीं समझ पाए कि अगर दुनिया में कोई शख्स सबसे बेहतर मेरी बेहूदगी से वाकिफ़ है तो वो मैं खुद हूं..। और सच कहूं तो दुनिया का ये न जानना मेरे लिए कड़वी गोली निगलने जैसा था..। हालांकि ग़लती इसमें भी मेरी ही थी..। मेरे अहम ने कभी मुझे किसी के सामने ये स्वीकार नहीं करने दिया..। जैसे जैसे साल बीतते गए ये गर्व बढ़ता गया.। आलम ये था अगर किसी दिन किसी को ग़लती से भी राज़ बताया होता तो उसी शाम अपना भेजा खुद उड़ाना पड़ता..। हां, आज तक न जाने क्यों ये पता नहीं चला कि ऐसा क्यों था.? शायद इसलिए कि मैं अपने बेकाबू हालातों से बेज़ार था..और जो सिर्फ मेरे एक ख्याल की उपज थे- ‘किसी भी चीज़ के कोई मायने नहीं हैं’..। एक लंबे वक्त से मुझमें ये धारणा बरकरार रही है लेकिन अभी पिछले बरस ही मुझे भरोसा हो गया..। अचानक मैंने पाया कि दुनिया रहे या न रहे इससे मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता..। ये ऐहसास साथ रहने लगा कि जो कुछ भी जीवन के क्षणभंगुर झरोखे से नज़र आता है वो सब मिथ्या है..। पहले लगता था कि अतीत ज़रुर सार्थक रहा होगा.. लेकिन बाद में इस नतीजे तक पहुंचा कि अतीत का बर्तन भी खाली है..ये और बात है कि यादों की खनक उसके होने का भ्रम पैदा करती है..। आहिस्ता-आहिस्ता मैं मान गया कि भविष्य में भी कुछ नहीं है..। ये वो लम्हा था जब बाहर की दुनिया को लेकर मेरी खीझ खत्म हो गई..। लेकिन इसका मतलब भी बवाल ही साबित हुआ..। मैं राह चलते लोगों से टकराने लगा..। ख्यालों में खोकर नहीं- सोचने के लिए भला मेरे पास क्या था- मुझे कोई फर्क ही नहीं पड़ता था..। ऐसा नहीं था कि मैं सब जवाब पा चुका था..। अरे! मेरे पास सुलझाने के लिए हज़ारों सवाल थे और मैं किसी से नहीं जूझ पाया था..। लेकिन मुझे कोई फर्क ही नहीं पड़ता था, सवाल मिट चुके थे..।
सत्य के दर्शन मुझे इसके बाद ही हुए..। ठीक-ठीक बताऊं तो पिछले साल अक्तूबर-नवंबर में..। इसके बाद का एक-एक लम्हा अमिट स्याही से मेरे दिल की किताब पर छपा है..। ये साक्षात्कार सर्दियों की एक मनहूस शाम हुआ..। जितनी उदास आप सोच सकते हैं उतनी उदास..। रात के करीब 11 बजे का वक्त था..। मेरे कदम उस सड़क की खामोशी के साथ घुले जा रहे थे..। पूरा दिन बारिश होती रही थी..। उसपर ठंडी हवा हड्डियां कंपा रही थी..। लेकिन 11 बजे अचानक बारिश रुक गई..। हर चीज़ पर सीलन छा गई..। अब सर्दी और ज़्यादा बढ़ गई थी..। ज़मीन से भाप उड़कर हवा में घुल रही थी..। मैं यही सोच रहा था कि काश ये लैंपपोस्ट न होते..। वो इतने महसूस इसीलिए जान पड़ते हैं क्योंकि हर चीज़ को रोशन कर देते हैं..। उस दिन खाना नहीं खाया था..। पूरा दिन तीन दोस्तों के साथ बिताकर लौट रहा था..। पूरी शाम मैंने मुंह नहीं खोला..। मुझे यकीन है ये उन तीनों के सब्र का इम्तिहान रहा होगा..। वो शायद मार्किज़्म पर बात कर रहे थे..और बार-बार जोश में आ रहे थे..। लेकिन असल में उन्हें कोई फ़र्क नहीं पड़ता था..। मैं ये देख सकता था..। मैं जानता था कि उनका ये जोश दिखावटी है..। इसलिए मैं अचनाक बोल पड़ा-“मेरे प्यारे दोस्तो! तुम्हे कोई फर्क नहीं पड़ता..।” उन्हें बुरा नहीं लगा बल्कि वो हंसने लगे..। ऐसा इसलिए क्योंकि मेरे मायने उनके लिए अपमानजनक नहीं थे..। मैंने सिर्फ इसलिए कहा क्योंकि मुझे फ़र्क नहीं पड़ता था और उन्हें ये हास्यास्पद लगता था..।
जब मैं लैंपपोस्ट्स के बारे में सोच रहा था..उस वक्त क्षितिज की ओर देखा..। स्याह आसमान मन को डरा रहा था..। अचानक मुझे बादलों के बीच एक सितारा नज़र आया..। मैं उसे ग़ौर से देखने लगा..। उसे छोटे से सितारे ने मानो राह दिखाई हो : मैंने उस रात खुदकुशी का इरादा किया..। ये इरादा मैं दो महीने पहले ही कर चुका था..। गुरबत के दिनों में भी चमचमाता रिवॉल्वर खरीद कर लाया, उसी दिन उसमें गोलियां भरी..। लेकिन दो महीने बाद भी वो अलमारी में पड़ा था..। मैं इतना अन्यमनस्क था कि मैं मौत का लम्हा चुनने के लिए भी तैयार नहीं था..। क्यों-मैं नहीं जानता..। दो महीनों तक हर रात घर लौटते वक्त उस लम्हे को गले लगाने का प्रण करता था..। नन्हे सितारे ने आज फिर भीतर कुछ जगाया..। ऐसा लगा मानो यही वो रात है..। लेकिन उस सितारे को देखकर मुझे ऐसा क्यों लगा- ये मैं खुद नहीं जानता..।
अभी मैं आसमान की तरफ़ देख ही रहा था कि एक छोटी लड़की ने मेरे हाथों को पकड़ लिया..। सड़क सुनसान थी..। कुछ दूरी पर एक रिक्शेवाला सो रहा था..। लड़की की उम्र तकरीबन 8 साल रही होगी..। उसने पुराने, मैले कपड़े पहन रखे थे और सिर ढका हुआ था..। वो सिर से लेकर पांव तक भीग चुकी थी..। लेकिन आज भी उसे लेकर जेहन में पहला ख्याल उसके छोटे से जूतों का आता है..। मेरी आंखें न जाने क्यों सबसे पहले उन्हीं पर टिकीं..। तभी वो मेरी कलाइयों को खींचने लगी..। वो रो नहीं रही थी बल्कि कांपती आवाज़ में कुछ कहना चाह रही थी..। कुछ ऐसा जिसका अर्थ निकालना मुश्किल था..। वो बुरी तरह कांप रही थी, उसके दांत किटकिटा रहे थे..। वो बेतहाशा “मम्मी! मम्मी! चिल्ला रही थी..।” ऐसा लग रहा था वो किसी चीज़ से डरी हुई है..। मैंने उसे पीछे मुड़कर देखा लेकिन खामोशी से चलता रहा..। वो मेरे पीछे भागती..मेरे कपड़े पकड़ने लगी..। उसकी आवाज़ ऐसी थी..जैसी डरे हुए बच्चों में निराशा के वक्त होती है..। मैं इस आवाज़ को पहचानता हूं..। शब्द उसके गले में रुंध रहे थे..। मुझे लगा शायद कहीं आसपास ही बच्ची की मां दम तोड़ रही है..। या फिर ऐसा ही कुछ उस बच्ची पर गुज़र रहा है..। लेकिन मैं उसकी मदद के लिए नहीं गया..। उल्टे ना जाने कौन सी चीज़ ने मुझे उसे फटकार कर दूर भगाने पर मजबूर कर दिया..।पहले मैंने उसे पुलिस के पास जाने की सलाह दी..। लेकिन अचानक उसने मेरे हाथ पकड़ लिए..। वो मेरे साथ-साथ दौड़ रही थी..और छोड़ने के लिए कतई राज़ी नहीं थी..। उस वक्त मैंने अपने पैर पटके और उसपर ज़ोर से चिल्लाया..। वो सिर्फ सुबक कर रह गई..। उसने मेरा हाथ झटका और सड़क के दूसरी तरफ़ दौड़ गई..। मैं पांचवें फ्लोर पर बने अपने घर पर पहुंचा..। किसी होटल की तरह इस बिल्डिंग में हम सब अलग कमरों में रहते हैं..। मेरा कमरा छोटा और बेहद आम है..। मैं कुर्सी पर बैठा मोमबत्ती जलाई और सोचने लगा..। बगल के कमरे से रोज़ की तरह शोर आ रहा था..। शायद आर्मी का भगौड़ा सूबेदार वहां रहता था..। उसके करीब छह मेहमान शराब और ताश में मशगूल थे..। मुझे मालूम है पिछली रात उनमें हाथापाई भी हुई थी..। मकान मालकिन शिकायत तो करना चाहती थी..लेकिन बेचारी डर के मारे मन मसोस कर रह गई..। उनके अलावा मेरे एक और पड़ोसी थे..। एक विधवा जो अपने तीन बच्चों के साथ वहां रहती थी..। सब के सब बिचारे रात भर सूबेदार के डर से सहमे रहते थे..। उस सूबेदार के बारे में बहुत कुछ सुन रखा है..। अजीब बात ये है कि पिछले एक महीने में मुझे उससे कोई परेशानी महसूस नहीं हुई थी..। मुझे यूं भी उससे क्या लेना-देना होता..और वो भी पहली मुलाकात के बाद से मुझसे बोर था..। उनके शोर पर भी मुझे कोई ख़ास ऐतराज़ नहीं था..। मैं रात भर जागता हूं और यकीन मानिए..मुझे उनका शोर ज़रा भी नहीं सुनाई देता..।
खैर मैं कमरे में पहुंचकर कुर्सी पर बैठा..और अलमारी से रिवॉल्वर निकालकर सामने रख लिया..। मुझे याद है उस वक्त मैंने खुद से सवाल किया था., “तो क्या वक्त आ गया है?” और मैंने पूरे भरोसे के साथ जवाब दिया, “हां, यही है!” ..। यानी मैं खुद को गोली मारने वाला था..। मैं इतना जानता था वो मेरी आखिरी रात होने जा रही है..लेकिन मुझे ये नहीं पता था..खुद को गोली मारने से पहले और कितना वक्त मेज़ पर बैठे हुए बिताना होगा..। यकीन मानिए, उस रात मैं अपना खेल ख़त्म कर ही चुका होता..।
अगर वो लड़की न रही होती..।
क्रमश:

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