शुक्रवार, दिसंबर 24, 2010

आखिरी ख्वाहिश...

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नदी किनारे ख्वाब पड़ा था
टूटा फूटा, बेसुध, बेकल;
लहरें मचलकर उसको तकती
सांझ सवेरे आकर पल-पल;
सीपी चुनते चुनते मैं भी जाने
क्यों छू बैठा उसको?
ये ऐहसास हुआ कि उसमें
रूह अभी तक जाग रही है
हाथ को मेरे उसकी हरारत
धीरे-धीरे ताक रही है

तब आगोश में उसको उठाया
इक औंधी कश्ती के नीचे
थोड़ा सा रखा था साया
नर्म सी गीली रेत का मैंने
बिस्तर एक बिछाया
सांस दिया होंठो से उसको
तब कुछ होश में आया
फिर उखड़े-उखड़े जुमलों में उसने
ये बतलाया-
‘फेंक गए उसको अपने संगी-साथी, भाई…’
सुनकर उसकी पूरी कहानी
देर तक मुझको सांस न आई
आखिरी ख्वाहिश मुझको देकर
नैनों में चाहत को समोकर
नींद हमेशा की जा सोया
अपने दुख को मुझमें बोया..

मैं वो आखिरी ख्वाहिश लेकर
उसकी जलती आग में भुनकर
पलक-पलक मोती बुनता हूं
सारे बदन को भूल चुका हूं
लेकिन मेरी रूह बची है..
दूर उसी नदिया के किनारे
आज भी बैठी सोच रही है
शायद सीपियां चुनते चुनते
कोई मुझे चुनकर ले जाए
ठंडी रेत पे ख्वाब बिछाए
मेरे बंद पपोटे छूकर
शायद वो ओझल हो जाए
गहरी गहरी झील के तल से
कभी न बाहर आने पाए...

1 टिप्पणी:

  1. बेनामी10 जून, 2011

    Nice 1.......kya kisi aur ke dukh ka khwab hum apne me bo skte hain? kisi ke khwab ko saanse de pana kya mumkin hai..yadi aisa hai to ye manavta ka shayad sabse bda udaharan hai deepak ji...

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