शुक्रवार, जनवरी 14, 2011

प्रतिभा

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कहानी-----------------
सूरज नाम का एक कलाकार उस साल गर्मियों की छुट्टियां पहाड़ों के एक गांव में बिता रहा था..। एक विधवा के मकान में बिस्तर पर लेटे हुए उस पर सुबह की उदासी हावी थी..। फ़ज़ाओं में अभी से पतझड़ की आमद की आहट थी..। आसमान घने, बैड़ोल बादलों से ढका था; हवा नश्तर की तरह चुभ रही थी; पेड़ कुछ इस अंदाज़ में एक तरफ़ झुके हुए थे मानो कोई फरियाद कर रहे हों..। उसकी नज़रें एकटक हवा में सरसराते पीले पत्तों पर टिकी थीं..। अलविदा वसंत! कुदरत की ये उदासी एक कलाकार की नज़रों में दिलकश होती है..लेकिन सूरज का मिजाज़ उस वक्त कुछ अलग था..। उसे एक गहरी ऊब खाए जा रही थी..। सांत्वना के लिए उसके पास सिर्फ ये ख्याल था कि कल वो यहां नहीं होगा..। उसके बिस्तर, कुर्सियों, मेज़ों और फर्श पर हर जगह सामान बिखरा पड़ा था..। अगले दिन उसे शहर के लिए रवाना होना था..।
सूरज की मकान मालकिन..वो विधवा उस वक्त घर पर नहीं थी..। वो कल के लिए लॉरी का इंतज़ाम करने कहीं गई थी..। कड़क मां की गैर-मौजूदगी का फायदा उठाकर बीस साल की कौमुदी सूरज के पास ही थी..। कल उसका पेंटर शहर जा रहा था..और उसके पास कहने के लिए कितना कुछ था..! वो कहती रही, कहती रही..लेकिन फिर भी ऐसा लग रहा था..उसके दिल की अनकही बाकी है..। कौमुदी की डबडबाई आंखें सूरज के बिखरे बालों को निहार रही थीं..उनमें उन्माद और उदासी एक साथ छलक रही थी..। सूरज की बेतरतीब हालत रात के वक्त अकेले में किसी को डराने के लिए काफी थी..। वो किसी जंगली जानवर की तरह दिखता था..। उसके बाल कंधों तक लंबे थे, उसकी दाढ़ी गर्दन, नथुनों, कानों तक से उगी हुई थी; उसकी आंखें उसकी मोटी भवों के पीछे बमुश्किल नज़र आती थीं..। आलम ये था कि अगर कोई कीट-पतंगा उन भवों में आकर फंसता तो शायद ही बाहर निकलने का रास्ता खोज पाता..। सूरज कौमुदी को उबासियों के साथ सुन रहा था..। वो थका हुआ था..। जब कौमुदी की आवाज़ रुआंसी हो गई..उसने गहरी, भर्राई आवाज़ में कहना शुरू किया:
“मैं शादी नहीं कर सकता..।”
“क्यों नहीं..?” कौमुदी की आवाज़ नरम थी..।
“…क्योंकि एक चित्रकार के लिए..बल्कि कला के हर साधक के लिए शादी का कोई सवाल ही नहीं है..। एक कलाकार के लिए उसके आज़ादी से ज़्यादा कीमती कुछ नहीं हो सकता..।“
“लेकिन मैं तुम्हारी आज़ादी में अड़चन कैसे हूं..? ”
“मैं सिर्फ अपनी बात नहीं कह रहा..। ज़्यादातर महान कलाकारों ने शादी से परहेज़ ही किया है..।”
“एक दिन तुम भी मशहूर बनोगे—मेरा दिल कहता है..। लेकिन मेरी जगह खुद को रखकर देखो..। मेरी मां के बारे में तुम जानते हो..जब उसे पता चलेगा कि तुम शादी के लिए राज़ी नहीं..और हमारे बीच में जो है वो कुछ नहीं...तो क्या होगा..? ओह! मैं कहां जाऊं..? तुमने कमरे का किराया भी तो नहीं दिया है..!”
“लानत भेजो किराए पर! वो मैं चुका दूंगा..।“
सूरज उठा और कमरे में बेचैनी से टहलने लगा..।
“मुझे कहीं और होना चाहिए..।” सूरज ने मानो खुद से कहा..। उसने कौमुदी को बताया कि शहर में कामयाब होना कितना आसान है..। बस एक पेंटिंग को बनाकर उसे बेचने भर की देर है..।
बिल्कुल, बिल्कुल..! कौमुदी ने हामी भरी..। “तुमने इस वसंत में कोई तस्वीर क्यों नहीं बनाई..?”
“क्या तुम्हे लगता है मैं ऐसे बाड़े में काम कर सकता हूं..?” सूरज ने बेरुख़ी से कहा..।
उसी वक्त किसी ने निचली मंज़िल पर ज़ोर से दरवाज़ा खटखटाया..। कौमुदी को किसी भी वक्त मां के आने का डर था..वो ज़ोर से उछलकर खड़ी हुई और भागकर चली गई..। अब हमारा चित्रकार अकेला रह गया..। काफी वक्त तक वो कुर्सियों और घर के सामान के ढेर के बीच चहलकदमी करता रहा..। नीचे बर्तनों की खनखनाहट इस बात की निशानी थी कि विधवा रसोई में काम कर रही है..। वो बड़बड़ाते हुए इन लॉरी ड्राइवरों को कोस रही थी..जिन्होंने उससे शहर तक सामान ले जाने के लिए पूरे दो हज़ार मांगे थे..। खीझकर सूरज कमरे की अलमारी के सामने रुक गया..और देर तक वहां रखी शराब की आधी बची बोतल को देखता रहा..।
“तेरा सत्यानाश हो!” उसने विधवा को कौमुदी पर झल्लाते हुए सुना..।
शराब के दो घूंट अंदर जाते ही उसकी आत्मा पर छाए काले बादल छंटने लगे..। उसे लग रहा था मानो उसका पूरा अंतस उसके साथ मुस्कुराने लगा हो..। मदहोशी उसे सपनों की दुनिया में ले जा रही थी....हां एक दिन वो ज़रुर महान बनेगा..। उसके ब्रश से निकले वो कौन से मास्टरपीस होंगे..ये सूरज के ख्यालों में नहीं था..लेकिन वो देख सकता था..कैसे अख़बारों में उसके चर्चे होंगे, दुकानों में उसकी तस्वीरें बिकेंगीं, उसकी कामयाबी पर दोस्त रश्क करेंगे....कल्पनाओं के उस संसार में वो एक शहाना महल में परी सरीखी लड़कियों के बीच था; लेकिन सपनों की ये तस्वीर कुछ-कुछ धुंधली थी..क्योंकि असल ज़िंदगी में उसने ऐसा कोई महल देखा ही नहीं था..। प्रेमतंत्र के पन्नों पर भी उसकी तकदीर ज़ीरो ही थी..लिहाज़ा ‘अप्सराएं’ भी दूर की कौड़ी थीं..। अक्सर जो असल ज़िंदगी में अनाड़ी होते हैं..वो किताबों में ज़िंदगी का ख़ाका खोजते हैं..लेकिन सूरज की ज़िंदगी में किताबें भी नहीं थी..। कुछ साल पहले अज्ञेय को पढ़ने की कोशिश की थी..लेकिन दूसरे पन्ने तक पहुंचते-पहुंचते ही सो गया था..।
”ये निगोड़ी गीली लकड़ियां ऐसे नहीं जलेंगी..।” रसोई में विधवा ज़ोर से चिल्लाई..। “मुन्नी ज़रा कुछ सूखी लकड़ियां लेकर आना..।“
तभी हमारे स्वप्निल सूरज के दिल में किसी से इन हिलोरें लेती उम्मीदों को बांटने की तीव्र इच्छा जगी..। वो सीढ़ियां उतरकर रसोई में गया..जहां खड़ूस विधवा और कौमुदी चूल्हा जलाते-जलाते बेदम हो रही थीं..।
“दुनिया में आर्टिस्ट होने से बेहतर कुछ नहीं..!” मैं जहां चाहूं, वहां जा सकता हूं..। ना तो दफ्तर में सिर खपाने की ज़रुरत है..ना खेतों में पसीना बहाने की..। मुझपर हुक्म चलाने वाला सिर्फ मैं हूं..। और इस आज़ादी के साथ मैं इंसानियत की भी भलाई कर रहा हूं..।“
रात के खाने के बाद अब उसके आराम करने की बारी थी..। आमतौर वो दोपहर बाद तक सोने का आदी था..। लेकिन आज उसे अचानक महसूस हुआ मानो कोई उसकी टांग खींच रहा है..। कोई बिना रुके हंसे जा रहा था..और चिल्ला-चिल्लाकर उसे पुकार रहा था..। सूरज ने आंखें खोलीं तो सामने उसका दोस्त विवेक था..। इस वसंत में कुदरत के नज़ारों को कैनवॉस को उतारने के लिए वो भी इन्हीं पहाड़ों पर आया था..।
“अरे वाह! ये मैं क्या देख रहा हूं..!”
हाथ मिलाने और कुशलक्षेम पूछने की रस्म अदायगी हुई..।
“क्या कुछ साथ भी लेकर आए हो..? तुमने तो सैंकड़ों स्केच पूरे कर डाले होंगे..?” विवेक के कंधे पर टंगे झोले को देखकर सूरज ने पूछा..।
“ह...म! हां, कुछ कोशिश की है..। और अपनी सुनाओ..? क्या तुमने कुछ नया नहीं बनाया..?”
सूरज ने बिस्तर के पीछे गोता लगाया...और शरमाते हुए धूल और मकड़ी के जालों से भरा एक कैनवॉस पेश किया..।
“ये देखो...प्रेमी से जुदा होने के बाद एक प्रेमिका..! मैंने इसे तीन बैठकों में बनाया है..अभी अधूरी है..”
तस्वीर में कौमुदी का एक धुंधला सा नक्श था..जिसे एक खुली खिड़की की दहलीज़ पर दिखाया गया था..। खिड़की से बगीचे को देखा जा सकता था..। पृष्ठभूमि को सूरज ने नीला रखा था..। विवेक को पेंटिंग ख़ास नहीं भाई..।
“ह’म!...एक्सप्रेशन तो है,” वो बोला..। “दूरी का ऐहसास भी नज़र आता है, लेकिन...लेकिन वो झाड़ी देख रहे हो..वो चिल्लाती हुई नज़र आती है..!”
कला विमर्श में मदिरा का पदार्पण हुआ..।
शाम घिरते-घिरते सूरज के यहां हसन भी आ पहुंचा..। हसन का नाम भी प्रतिभाशाली चित्रकारों में आता था..। वो सूरज का पड़ोसी था..। उम्र कोई पैंतीस की रही होगी..उसके बाल लंबे थे..खद्दर के कुर्ते पर झोला उसकी पहचान थी..। शराब की बोतल देखकर वो पहले सकुचाया, सीने में दर्द का रोना रोया..लेकिन दोस्तों के मनाने पर एक जाम उसने भी उठा लिया..।
“मैंने एक सबजेक्ट सोचा है..” पीते-पीते उसने कहना शुरू किया..। “मैं कुछ नया पेंट करना चाहता हूं...कोई देवी या देवता या फिर कोई असुर..। मैं इसे हिंदुत्त्व के परिप्रेक्ष्य में पेश करना चाहता हूं..। एक तरफ़ आर्यन सभ्यता और दूसरी तरफ़ पहाड़ी रीतियां..” मैं अंतर्मन की बात करना चाहता हूं, समझे..?”
नीचे विधवा लगातार चिल्ला रही थी:
“मुन्नी, मुझे लाकर प्याज़ दे! कमबख्त अभी तक चूल्हा नहीं जलाया....”
तीनों दोस्त कमरे में घंटों इस तरह चहलकदमी करते रहे..जैसे पिंजरे में कैद भेड़िए हों..। तीनों उमंग से भरे हुए थे..और घंटों बिना रुके बतियाते रहे..। कोई भी उनकी बातें सुनता..उसे यही लगता कि भविष्य, प्रतिष्ठा, पैसा..सबकुछ इनके कदमों पर आने ही वाला है..। लेकिन तीनों में से किसी के जेहन में ये ख्याल नहीं था..कि वक्त बीत रहा है, कि हर बीतते दिन के साथ जीवन का पटाक्षेप भी नज़दीक आता जा रहा है, कि वो अब तक दूसरे लोगों की कीमत पर जीते आए थे..लेकिन कुछ पा नहीं सके थे, कि वो सभी एक क्रूर कानून से बंधे हैं..। कानून जिसके मुताबिक सैकड़ों प्रतिभाओँ में से सिर्फ दो या तीन ही होती हैं..जो निशान छोड़ पाती हैं..। बाकी सबके हाथ इस लॉटरी में खाली ही रह जाते हैं..शायद वो सभी उन चुनिंदा खुशनसीबों की कामयाबी की सीढ़ी बनते हैं....तीनों दोस्त खुश थे और भविष्य की तरफ़ देखते हुए उनकी आंखों में चमक थी..।
...सुबह एक बजे हसन ने विदा ली..और अपने झोले को लहराता हुआ वो घर लौट गया..। विवेक सूरज के कमरे में ही सोने के लिए रुक गया..। सोने से पहले सूरज मोमबत्ती लेकर रसोई में पानी पीने गया..। अंधेरे गलियारे में कौमुदी एक बक्से पर बैठी थी, उसके हाथों ने उसके घुटनों को थाम रखा था..वो आकाश के शून्य को अनवरत निहारे जा रही थी..। उसके चेहरे पर स्निग्ध मुस्कान थी, आंखों में एक अजीब सी दीप्ति थी..।
“क्या ये तुम हो..? क्या सोच रही हो..?” सूरज ने पूछा..।
“मैं सोच रही हूं..एक दिन तुम मशहूर बनोगे...” उसने लगभग कानाफूसी के लहज़े में कहा..। “मैं यही सोच रही थी..पूरी दुनिया में तुम्हारा नाम होगा..लोग तुम्हारी पेंटिंग्स की मिसाल देंगे...मैं तुम्हारी बातें सुन रही थी...ओहऍ इन सपनों का कोई ठिकाना नहीं है...”
सूरज ज़ोर से हंस दिया..और अपना हाथ प्यार से कौमुदी के कंधों पर रख दिया..।

(समाप्त)

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