शनिवार, जनवरी 15, 2011

gIrLs I’Ve LoVeD (2)..

स्नेहा अरोड़ा

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एक चीफ़ गेस्ट की अगुवानी के लिए दीवार पर सजाया गया लाल सूरजमुखी आधा मुरझा गया था..सो मैंने उसे दीवार से निकालकर अपने सिस्टम पर सजा दिया है..। सब फूलों में मेरा सबसे पसंदीदा फूल सूरजमुखी ही रहा है..। सिर्फ अपने प्रियतम सूरज का दीदार ही..उसकी पंखुड़ियों को खिलने की ख्वाहिश देता है..। आप उसकी खुश्बू को मोहताज कह सकते हैं..। खिलना उसका होना है..खुश्बू उसके होने की घोषणा..। चाहें तो उसके अस्तित्त्व, उसके प्रेम पर खुदमुख्तारी की वाजिब टोक लगा सकते हैं..। हां, वो आश्रित है, लेकिन फिर भी फिक्रमंद नहीं..। क्षितिज पार के प्रेम पर भी इतना भरोसा कि अपना होना भी उससे बांध रखा है..। किसी और फूल में शायद आप उदासी नहीं देख पाएंगे..लेकिन कभी पहाड़ की चोटी पर बने लकड़ी के वीरान घर की क्यारी में उगे अकेले सूरजमुखी को पांच मिनट निहारिएगा..। खैर बचपन के उन दिनों में नज़रें उस सूरजमुखी पर नहीं, घर के अंदर की सबसे खुफिया जगह पर टिकती थीं..। लुकाछिपी के खेल में छिपने की वो मेरी फेवरेट जगह थी..। सालों पहले अंग्रेज़ों ने न जाने क्यों उस घर को उजड़े रहने का श्राप देकर छोड़ दिया था..। उसके थोड़ा नीचे..आर्मी का बनवाया गया मंदिर था..। जंगल का एक टुकड़ा मंदिर और उस घर को अलग करता था..। चीड़ के पेड़ों में अभी बुज़ुर्गियत की सख़्ती नहीं, यौवन का लोच था..। खेल का रोमांच एक सैकिंड में ठिठक कर रह जाए..ऐसा इससे पहले कभी हुआ ही नहीं था मेरे साथ..।

‘ये चेहरा..यहां इस जगह पर..कैसे ? ’

काले फर जैकेट के कॉलरों में नाक तक ढका सांवला चेहरा, गर्दन तक कटे बाल, और वो बड़ी-बड़ी कत्थई आंखें..। उसकी सफेद फ्रॉक पर लाल गुलाब बने हुए थे..। सच कहूं तो इतना हुलिया सिर्फ अंदाज़े से बयां कर रहा हूं..। मानस पटल पर उस लम्हे का कोई ऐहसास अगर आज भी दर्ज है तो सिर्फ वो बड़ी-बड़ी आंखें..। चेहरे पर सूरजमुखी की छुअन के ऐहसास को खामोश हंसी से बयां करतीं..। उसकी सहेलियों की आमद ने उस पल का तिलिस्म तो तोड़ दिया..लेकिन आत्मा का एक हिस्सा जो ठिठका रहा था..सो आज भी ठिठका है..। उस एक लम्हे की बर्फ में जमा..। शिमला के मार्च की उस गुनगुनी दोपहर में उसकी हथेलियां एक और अकेले सूरजमुखी को भी ज़िंदगी भर का साथ देने वाली थीं, यादों की एक कभी न छूटने वाली सोहबत..। छुट्टियों के बाद के पहले दिन को न तो उसके पहले और न ही उसके बाद कभी खुशनसीब माना..। मॉर्निंग असेंबली के बाद..बच्चों का हुजूम..सीटों पर विराजमान तकरीबन हो ही चुका था..। एक दूसरे से मिलने के उबलते जोश पर पहले ही पीरियड का घंटा हथौड़ा बनकर पड़ा था और चिपटी हुई खामोशी पसरने को थी..। क्लास के ख़बरियों ने जैसे ही बताया प्रिंसीपल आने वाले हैं..हलचल की लहर..घुप्प सन्नाटे में बदल गई..।

‘गुड मॉर्निंग स्टूडेंट्स, दिस इज़ योर न्यू फ्रेंड..स्नेहा अरोड़ा..।’

क्लास में पहला कदम..प्रिंसीपल की निगरानी में..ऐसा सौभाग्य तो आज तक किसी को मिलते नहीं देखा था..। दिमाग इस हैरत में उलझता..उससे पहले ही वो आंखें..। कौन कहता है इश्क अंधा होता है..कभी-कभी प्यार में आपकी नज़र..किसी जासूस से भी ज़्यादा पैनी हो जाती हैं..।

कद यकीनी तौर पर दरम्याना से कम था..नाक तोतिया होते हुए भी उसके चेहरे को बांध कर रख देने वाला संतुलन देती थी..।
‘ये वही है..।‘

जाने दिल के कौन से कोने की आवाज़ थी..भीतर से विरोध का हल्का सा सुर भी नहीं उपजा..।

वो स्नेहा अरोड़ा थी..एक आर्मी मेजर की बेटी..। ‘सा$ब’ तबके में आने वाले परिवारों का गर्व नहीं लेकिन एक रोबीला शहानापन उसके चलने में ही मौजूद था..।
मैं खिड़की की ओर से दूसरी कतार में पहले बेंच पर बैठा था..। वो खिड़की से सटी लड़कियों की ‘रो’ में बैठी..।
नीतिका से सिर्फ एक डेस्क पीछे..मेरी बगल में..। दिल की धड़कनों के रुकने के उस छोटे से पल के निर्निमेष निर्वाण का वो पहला स्वाद था मेरे लिए..। लेकिन निर्वाण मौन होता है शायद इसीलिए ये रिश्ता भी मौन ही रहा हमेशा..।
ज़िंदगी यूं ही चलती रही..। हर रोज़ दिन का हिस्सा एक खुमार के नाम बद गया..।
उसके बैठने की दूरी उस खुमार का पैमाना बन गई..।
एक स्कूल बस में आते, मॉर्निंग असेंबली में भी मेरी नज़रों के दायरे के भीतर ही उसके खड़े होने की जगह मुकर्रर थी..।
क्लासरूम में सवाल पूछे जाने उसका हाथ कम ही खड़ा मिलता था..लेकिन पहले यूनिट टेस्ट ने ही साबित कर दिया कि वो होशियार बच्चों की जमात में शामिल है..।
क्लास में मेरा दर्जा अब एक पायदान और नीचे हो गया था, ठीक उसके नीचे..।
न तो उसे कभी सहेलियों के साथ उछलते-कूदते देखा, न ही ज़ोर से खिलखिलाते..। खेल या स्टेज में भी उसकी कोई ख़ास दिलचस्पी दिखी नहीं कभी..।
लाइब्रेरी के पीरियड़ में उसे अंग्रेज़ी की परिकथाएं पढ़ता पाया ज़्यादातर..। ‘black beauty, Thumbelina’..ये कुछ किताबें याद हैं, जो उसके हाथों में देखीं..।
क्या ये इत्तफाक था कि हमारा सामना कभी इस तरीके से हुआ ही नहीं कि बात करना लाज़िमी हो..? या फिर मेरा शर्मिलापन चालबाज़ था..?
एक दफ़ा क्लास टेस्ट में बच्चों पर निगरानी का काम सौपा गया था, मुझे..। किसी से ढिलाई फितरत नहीं थी मेरी लेकिन उसे पीछे वाली सीट पर बैठी लड़की से पूछते या शायद कुछ बताते देखकर भी मेरा नज़रें फेर लेना, आज तक याद है मुझे..।

‘शुक्र है, बेखोट नज़र आने वाले इस रहस्यमयी बुत में कुछ तो इंसानों जैसा है..। ’ कुछ ऐसा ही ख्याल मेरे मन में आया था..।

एक बार और जब बर्थ-डे वाले रोज़ ‘सिविल ड्रेस’ में आने पर प्रिंसीपल ने झिड़का तो उसके चेहरे पर शर्म और ज़लालत का कुछ मिला-जुला सा रंग तैरते देखा..।
यूं समझ लीजिएवो ‘चंद्रकांता’ थी..तो मैं वीरेंद्र विक्रम था..। अलबत्ता सीरियल नहीं, किताब वाला..। बस बेहोश नहीं होता था, उसे देखकर..और ये फर्क भी दर्ज करवाना होगा कि कुंवर तो कतई नहीं था, उसके सामने..।
एक बार गिना तो एक पीरियड से जहां तक याद है पचास से भी ज़्यादा बार अपनी नज़रों को उसकी ओर घूमते हुए पकड़ा..।
बदले में सिर्फ एक, जी हां सिर्फ एक नज़र..। ‘एक नज़र’ में आप इंसान को पढ़ सकते हैं, ‘एक नज़र’ में प्यार की जादुई दुनिया में दाखिल हो सकते हैं, एक नज़र आपके दिल को लहुलूहान कर सकती है..लेकिन क्या ‘एक नज़र ’ किसी पूरे रिश्ते का इकलौता हासिल हो सकती है..? एक नज़र जो इस कदर पैवस्त हुई कि यादों के अंबार को परे हटाकर आज भी गाहे-बगाहे सपनों में दस्तक दे देती है..?
न जाने मेरी कौन सी नज़र के जवाब में, किस भले दिन, किस मंशा से..उसने पलटकर देखा था, हमारी नज़रें टकराईं थी..एक सैकिंड के सौंवे हिस्से में उन्होंने मेरे ऐहसास को छुआ था..गर्दन ज़रा सी हटकर फिर टिक गई थी..। ‘लो पी लो ये जाम’..ऐसा कहने के अंदाज़ में उसने गालों पर बायां हाथ टिकाया था, अपनी आंखों के प्यालों में कुछ था जो भरा था..और बिन मांगे, बिन आस मुझे दिया था..। मैं भीतर तक भर गया था..। जब-जब नैनों से ठगा गया, नज़रों का वो एक जाम हमेशा याद आया..।
PS:
कई सालों बाद यूनिवर्सिटी की एंट्रेस परीक्षा के दौरान..गेट के ठीक पास एक चेहरा नज़र आया..। जैसे ही दिखा, अभिषेक को बताया इस लड़की का नाम स्नेहा अरोड़ा है..। इसके पिता अमुक-अमुक हैं..। उसने फौरन उस चेहरे का नाम-पता करने के लिए भाग-दौड़ की..। वापस लौटे तो लड़की गायब थी, हमारे हाथों में पड़ा फॉर्म बता रहा था, वो कोई और थी..। और हां, मेरी इकलौती सगी भांजी का नाम भी स्नेहा है, मैंने ही रखा था..

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