शनिवार, जनवरी 15, 2011

gIrLs i'Ve LuVeD..(1)



पहली बार ज़िंदगी में हालात ने नहीं, अपने फैसले ने एकाकीपन का दामन थमाया है..। अगले पड़ाव पर बंजारा मन फिर साथ खोजेगा..?
फिलहाल ऐसा नहीं लगता..। लेकिन उन आइनों पर एक नज़र..जिन्होंने कभी मोड़ पर, कभी पड़ाव पर मेरा अक्स दिखाया..। आइने जिनके अक्स को मिलाकर बनी है मेरी ज़िंदगी की तस्वीर


नीतिका
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दिल की वादियों में तन्हाई का मौसम है..। यादों की धुंध हर तरफ़ फैली है; दर्द के धुंधलके में ख्यालों की सिहरन..याद दिला रही है, मैं ज़िंदा हूं..। धुंध के बीच दस्ताने का कवच भी आपके हाथों को जमने से नहीं रोक पाता..। नहीं, दिल्ली में अभी ठंड का मौसम नहीं आया है लेकिन जो कलाइयां कि-बोर्ड पर दौड़ रही हैं..उनमें जलने का एक हल्का सा दाग अब भी है..। दाग..। लम्हों के जीवाश्म..। कुछ ऐहसासों के साथ हमारे जीवन भर का नाता..। शिमला के स्कूलों में क्लासरूम में घुसने के बाद बच्चे सीटों की तरफ़ नहीं भागते..। कम अज़ कम हर घंटी के बाद की आज़ादी के वो चंद मिनट कोयले की अंगीठी के इर्द-गिर्द ही सजते हैं..। शॉर्ट ब्रेक में उसी के धक्के से गिरा था अंगीठी पर..। वो ऐहसास कब पैदा हुआ, ब्रह्मांड की उत्पत्ति के पल की तरह उस लम्हे की खोज में भी चेतना बस गहनता के इर्द-गिर्द घूमती भर रह जाती है..। हां, इतना याद है कि ऐहसास तो था..। सिर्फ तीसरी क्लास और एक लड़की से इश्क..। सुनने में भले अजीब लगता है, लेकिन अजीबपन का ये ऐहसास उस वक्त भी था, मुझे..। गोरा रंग, चौड़ा चेहरा, दरम्याना आंखें..।होंठों पर बाईं ओर चोट का निशान कभी उसकी निरीहता को बढ़ाता था..। कभी उसकी गंभीरता को सजाता था..। अक्सर नज़रें उसी पर टिकी रह जातीं..। न जाने कौन सी अंजानी फिक्र उसके चेहरे पर टंगी रहती थी, हमेशा..। ब्लेज़र की जेबों में हाथ डाले एक अजीब सी गरिमा बरसती थी उससे..। मॉर्निंग असेंबली में कभी उसके आस-पास खड़ा होता तो खुद को खुशनसीब मानता..। हफ्ते में एक बार होने वाली हाउस मीटिंग में हम क्लासरूम छोड़कर..अपने -अपने हाउस की मीटिगों में जाते..। एक पीरियड की ये दूरी ख़ासी खलती मुझे..। हम कॉलोनीनुमा मोहल्ले में रहते थे, उसके साइंसदान पिता को पड़ोस के खुले खेतों के बीच बना एक अलग क्वार्टर मिला था..। पड़ोसियों के घर जाकर राप्ता जमाने के लिए तो खैर शुरू से ही बेहद शर्मीला था लेकिन यहां दिक्कत ये थी कि उसकी मां मेरी टीचर थी..। ऐसी कोई क्लास नहीं थी जहां संस्कृत की क्लास से पहले एक खौफ़ज़दा खामोशी न छा जाती हो..। सुषमा ‘मैम’ को जतोग का केंद्रीय विद्यालय इसी खामोशी से पहचानता था..। कभी मेरे और उसके परिवारों का मिलना होता भी था तो कन्नी काटने के लिए कोना ही खोजा करता था अक्सर..। नीतिका का भाई नितिन इस काम में ख़ासा काम आता..। हम दोनों अक्सर खेलने निकल जाया करते..। हमेशा मन में हसरत होती कि वो भी आए..। खेलते वक्त, घर की छत पर दूरबीन के चाव को पूरा करते वक्त..। लेकिन कुदरत की मेहरबानी दूधवाले की खटखटाहट के बाद हर सुबह के लिए बंधी थी..। अक्सर वो स्कूल जाने से पहले हमारे घर आकर मेरा इंतज़ार करती..। मां से बातें करती, फिर हम दोनों साथ जाते..। रास्ता तो जेहन से कभी मिटा नहीं लेकिन उसपर वो साथ इस कदर सिट्टी-पिट्टी गुम करता था कि उसकी यादें भी दिमाग ठीक से जमा नहीं कर पाया..। एक पहाड़ी पर ऐसे रास्ते से चढ़ते जो दरअसल भेड़ों के लिए बना था, उसके बाद एक बड़ा सा मोड़ और फिर आर्मी कॉलोनी से गुज़रता हुआ रास्ता..। कहते हैं पहला प्यार सबसे गहरा होता है..इस सवाल की विवेचना को बाद के लिए छोड़ते हैं..अभी के लिए इतना कहना काफी है कि एक अजीब सी पवित्रता ज़रुर थी उसमें..। मेरी क्लास में हमेशा मुझसे दो रैंक ऊपर ही आते उसके..। हैंडराइटिंग कॉम्पिटिशन में तकरीबन हर साल वो फर्स्ट होती और मैं उसके बाद..। लेकिन स्कूल की उस छोटी सी दुनिया में दायरे की अपनी सल्तनत का शहज़ादा मैं भी था..। अगर ज़िंदगी में किसी के दायरे को भेदने की सजग कोशिश की..तो वो उसी बचपने में थी..। कई दिनों तक सोचा, फिर कुछ दिन दिमाग में रोज़ दोहराता रहा वो वाक्य, बीसियों बार ऐसा भी हुआ कि कहते-कहते रुक गया..। एक दिन ब्लैक बोर्ड पर रची एक पहेली..। ‘SLNATID..।’ उससे इसका मतलब पूछने की जुर्रत तो की..लेकिन कभी बता नहीं पाया..’SOMEONE LOVES NITIKA AND THAT IS DEEPAK..’। खैर, दायरे तो फिर भी टकराते रहे..। कई सालों बाद अक्ल की काई के साथ ये सवाल भी मन के किसी कोने में उग आया..’क्या वो भी प्यार के धागे से जुड़ी थी मुझसे ?’ ये रहस्य तो उन्हीं लम्हों के साथ हमेशा के लिए वक्त के अंतहीन सागर में घुल गया..। लेकिन कुछ लम्हे याद आते हैं..। मेरे बॉयज़ मॉनिटर होने और उसके गर्ल्स मॉनिटर बनने के बाद होने वाले झगड़े..। एक बार क्लास में शोर करने वाले बच्चों की लिस्ट में उसका भी नाम लिख दिया..। होनहार जमात का होने की वजह से टीचर की सुनने की आदत नहीं थी उसे..। स्कूल की टंकी के पीछे से जब वो निकली तो उसकी आंखों को भरा हुआ पाया..। दिल ऐसा पिघला कि रात को जगे हुए हर लम्हे ने आंखें भींचकर सुबह को सूरज को खींचकर लगाने की जुगत लगाई..। ओह! याद आया, सॉरी भी मैंने ही कहा था..। याद नहीं, उस ऐहसास की छुअन बताती है कि उसका जवाब अब तक मिले सबसे गहरे उत्तरों में शुमार होना चाहिए..। उसकी खामोशी में न तो दोबारा दोस्ती जैसी राहत थी न गुस्सा, न क्षोभ , न जीत की मुस्कान..। कुछ नहीं बस एक गर्भ धारण किए उदास सी खामोशी..। फिर रूमाल-गेम में कभी आमने-सामने होते तो अजीब हालत होती..। मन को हार भी गवारा नहीं होती..और जीत को जी नहीं चाहता..। इसी चक्कर में हमेशा रूमाल उसी ने उठाया..! उस नादान उम्र में कई बार सवाल आया..। ‘क्या इसकी परिणति एक रिश्ता है..? सवाल ही नहीं..। हमेशा जवाब यही मिला..।’ क्या बचपन की पवित्रता उस रिश्ते में भी उतर आई थी..? क्या किसी भी मांग से परे था वो संबंध ? ऐहसास और सिर्फ ऐहसासों की स्निग्ध बारिश..? ये जवाब कभी नहीं होगा, मेरे पास..। चाहता भी नहीं, इतनी कीमती याद को समझ की सज़ा दूं..। शायद अबोधता ही उस रिश्ते की आत्मा थी..उसकी वो महक जो आज भी ज़िंदा है..।

P:S दो-तीन साल पहले सुनने को मिला है कि उसने एनिमल हस्बेंडरी में बी.एस.सी पूरी की है..। जिसने देखा, उससे पूछा, कैसी दिखती है, वो ? दाग वैसा ही है, जवाब मिला..!

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