शनिवार, जनवरी 15, 2011

gIrLs i'Ve LuVeD..(3)

-----------एंजेलिका---------------------
आज आठ दिसंबर है..मेरे ‘द्विज’ होने का दिवस..। कहानी ज़रुर कहता हूं लेकिन कहानीकार नहीं हूं..। सिर्फ यादों के मौसम में ज़ेहन की शाखों पर जब अशआर आते हैं तो बांट लेता हूं..। लिखने की हसरत है पर लेखक नहीं बन पाया..। जिस दिन वो याद, वो ख्याल, वो कहानी कहने जितनी ज़िंदगी अपने शब्दों को बख्श सकूंगा, उसी दिन शब्द साधना को पूरा मानूंगा..। लेकिन फिर जिसके होने से मैं हूं, जिसका ऐहसास मेरे अस्तित्त्व के कण-कण में गुंथा जा चुका है, उसकी अभिव्यक्ति असंभव सी प्रतीत होती है..। यही वजह है कि न्यूज़रूम की आपाधापी के बीच लिखी गई ये कहानी नायाब तो नहीं, कहानी की कसौटी पर भी शायद खरी न उतरे..। इसका आदि बिखरा है, अंत अधूरा है..। लेकिन कथानक के बीच कुछ है, जो अव्यक्त है..। जिसे प्रेम ने छुआ होगा, वो इस अनकहे को समझ पाएगा, ऐसी उम्मीद है..।



मैं इंसानों की उस जाति से हूं, जिसे कुंलाचे भरती कल्पना और ठाठें मारते जज़्बातों के लिए जाना जाता है..। लोगों ने अक्सर पागल भी ठहराया है, लेकिन इस मसले का निपटारा अभी बाकी है..। पागलपन को इंसानी सोच का सबसे ऊंचा मुकाम क्यों न माना जाए..? क्या ये सच नहीं कि महानतम और गहनतम को साहिल पर हमेशा मन की उफनती लहर ही छोड़कर गई है, न कि आम ख्यालों का भंवर..? दिन में देखे गए सपने कभी-कभी उन बहुतेरी चीज़ों से भी वाकिफ़ होते हैं..जिन्हें रातों के ख्वाब छू भी नहीं पाते..। धुंधले बोध में भी ‘बांवरे’ मन विराट की झलक देख लेते हैं..। दर्द की राह पर टुकड़े-टुकड़े ही सही इन्हीं पागलों के हाथ वो इल्म आता है..जो सिर्फ बुरे से नहीं बचाता, अच्छे की ओर भी ले जाता है..।

यानी कुल मिलाकर आप ये कह सकते हैं कि मैं पागल हूं..। कम अज़ कम इतना मानने में तो मुझे भी गुरेज़ नहीं है कि मेरे मन के दो कोने हैं; एक- जहां ठहरे पानी की तरह साफ़ तर्क हैं, उन्हें बहस से मथने की ज़रुरत नहीं, वो मेरी जिंदगी के पहले हिस्से में गढ़े गए हैं..। दूसरा कोना शुबहों की उलझी परछाइयों से भरा है..। इसका ताल्लुक मेरी ज़िंदगी के ‘दूसरे युग’ से है..। इसलिए जो मैं अपने पहले दौर के बारे में कहूं, उसपर आप भरोसा कर सकते हैं..। उसके बाद के सच को अपने हिसाब से तय कीजिएगा..। आप चाहें तो उसपर पूरी तरह शक कर सकते हैं..। अगर ये भी गवारा न हो..तो पहेलियां भी खाली वक्त का कारगर खेल साबित होती हैं..।

आज जिसके बारे में चुपचाप बैठा लिख रहा हूं, कभी वो मेरी शोखियों की धड़कन थी, मेरी खामोशियों की सांस..। चलिए उसका नाम ‘एंजेलिका’ मान लेते हैं..। मखमली सूरज तले सतरंगी घास की वादी में हम हमेशा साथ रहे थे..। उस घाटी ने कभी भटके कदमों को नहीं देखा था..। चारों तरफ़ कद्दावर पहाड़ मानो आसमान से टंगे हुए थे..। उसके आसपास किसी रास्ते को भी राहगीर का तुजुर्बा नहीं था..। हमारे खुशनुमा घर तक पहुंचने के लिए हज़ारों झाड़ियों को ज़ोर लगाकर धकेलना पड़ता, न जाने कितने फूलों की शान में गुस्ताखी करनी होती..। इसलिए हमारा इश्क कुदरत की तन्हाई में जवान हो रहा था..। हमारी दुनिया उन्हीं पहाड़ों की चारदीवारी तक थी..। मैं, मेरा परिवार, वो और उसका परिवार..।

पर्वतों के पार के धुंधलके को चीरकर रास्ता बनाती नदी हमारे घरों के पास..झूमती हुई बहती..। पत्थरों से टकराती नदी की बूंदों पर जब वसंत के सूरज की किरणें पड़तीं तो उस वादी की सबसे चमकीली शय होतीं, सिवाए एंजेलिका की आंखों के..। हम इसे ‘सुरीली सरिता’ कहते थे, उसके शोर में वाकई गुनगुनाहट जैसा असर था..। उसके किनारे बैठकर मोती सरीखे गोल-गोल पत्थरों को निहारना हम दोनों को बेहद पसंद था..। लहरों की रवानगी के बीच भी नदी की छाती से लगे वो पत्थर ठहरे हुए नज़र आते..। रेत की एक पट्टी के बाद पहाड़ों के कदमों तक बारहों महीने नरम घास की कालीन उस देस में बिछी रहती..। घास के बीच..सपनों की तरह बांवरे पेड़ छितरे हुए थे..। उनकी कमर दिन के वक्त रोशनी की तरफ़ झुकी रहतीं..। उनके तने उस वादी की सबसे मुलायम शय थे, सिवाए एंजेलिका के गालों के..।

इसी वादी में और एंजेलिका सालों हाथों में हाथ थामे घूमते रहे..। प्यार ने कब हमारे दिलों में घरौंदा बनाया, पता ही नहीं चला..। फिर वो शाम भी आई..। मैं और वो पहाड़ की चोटी पर बने मंदिर के ठीक नीचे बैठे थे..। हमारी बाहें एक दूसरे से लिपटी थीं..। पेड़ों के झुरमुट से सांझ की धूप छन-छनकर आ रही थी..। हमारी खामोश निगाहें नीचे वादी में हमारे गांव पर छाई धुंध को निहार रही थी ..। पूरी शाम हमने कुछ नहीं कहा..। उससे अगले दिन भी अल्फाज़ों का मायनों जैसे नाता टूट गया हो..। धुंध के पार से आकर हमें एक अनदेखी लहर छूकर गुज़री थी..। उस लहर की रवानगी चंद लम्हों की थी, लेकिन भीतर-बाहर का सबकुछ घुल जाने का नशा..! वही आवेग, जिसके चलते मनुष्यों की प्रजाति ने खुद को सबसे ऊंचा दर्जा दिया है, हमें बहाए ले जा रहा था..। सबकुछ न जाने कैसे बदल गया था..? सितारों सरीखे फूलों की शोखी उन टहनियों में भी आग लगाने लगी, जिनपर पहले कभी फूल नहीं आए थे..। घास की कालीन अब और हरी थी..। वो पहाड़ी रास्ते भी जी उठे थे..। जब हम गोधूलि बेला में घर लौटते, कभी-कभी नज़र आने वाली ‘शेरटी’ अपनी नटखट सहेलियों के साथ शाम में सुर घोलती..। सुनहरे रंग की मछलियां नदी में अठखेलियां करतीं..। नदी की छाती से उठने वाला संगीत अब उस वादी की सबसे सुरीली शय था, सिवाए एंजेलिका की आवाज़ के..।

बादल का वो टुकड़ा जिसे हम रोज़ निहारा करते, दिनभर तैरते हुए हमें हंसाने के लिए चेहरे बदलता..। शाम के वक्त जब उसके सिरे चोटियों पर सिर रखकर आराम करते तो शाम का रंग और भी गाढ़ा हो जाता..।

एंजेलिका के नयन-नक्ष में सबकुछ आम था..। लेकिन उसकी खूबसूरती में अजीब सा भोलापन था..। अश्वमेघ घोड़े जैसा सजीला गर्व नहीं, हिरण जैसी अनछुई निरीहता..। उसके दिल से उठने वाले इज़हार में कहीं कोई छल नहीं था..। जब हम सतरंगी घास की उस वादी में घूमते..वो उस दिल के अनदेखे कोनों में मुझे ले जाती..। उनमें आने वाले हर बदलाव की ख़बर मुझे होती..। जून की एक ठहरी-ठहरी सी दोपहर में उसकी भीगी आंखों ने वो सुनाया जो मेरे लिए कायनात की कहानी का आखिरी ट्रैजिक मोड़ था..। इसके बाद भीतर का एक हिस्सा हमेशा के लिए..ठहर जाने वाला था..। इसके बाद हमारी बातें इसी उदासी के इर्द-गिर्द बुनी हुई रहीं..।

अपने सीने पर टिकी मौत की ऊंगली को एंजेलिका देख चुकी थी..। मुकम्मिल खूबसूरती दुनिया को बर्दाश्त नहीं कर सकती, इसलिए उसकी अमरता दर्द में ही छिपाई गई है..। लेकिन दर्द तो दर्द होता है..। उसके दर्द की गहराई का ऐहसास एक रोज़ ‘सुरीली सरिता’ के किनारे बैठे उसने मुझे सुनाया..। उसके बाद सतरंगी घास की इस वादी को मैं छोड़ दूंगा, मेरा प्यार बाहर की दुनिया में किसी और की नज़्र होगा, ये ख्याल उसे खाये जा रहा था..। वहीं, उसी वक्त मैं अपने घुटनों पर झुका और उसका हाथ थामकर न जानें कितने कसमें खाई- ‘दुनिया की किसी लड़की से शादी नहीं करूंगा, उसकी यादें हमेशा दिल में सहेज कर रखूंगा, उसके प्यार की छांव ‘देवी मां’ के आशीर्वाद की तरह हमेशा मेरे साथ रहेगी..। ’ मैंने दिक दिशाओं के मालिक को उस लम्हे में बतौर गवाह तलब किया..। एंजेलिका की आंखों की उदासी मेरी बातों पर चमक उठी थी..। उसकी छाती से ऐसी आह निकली मानो उसके प्राणों की एक-एक बूंद निचोड़ी जा रही हो..। कांपते होंठो से रूलाई को थामते हुए, उसने मेरी कसमों को तस्लीम किया..। (कभी-कभी सोचता हूं ये उसका बचपना था..।) खैर इससे हमारी विदाई कुछ आरामदेह तो बन ही गई..।

‘उस पार सितारों के बीच से भी तुम्हे निहारुंगी, सर्द रात की तन्हाइयों में मेरा ऐहसास तुम्हारे ऐहसासों की बर्फ को पिघलाएगा..। अगर जन्नत में इसकी इजाज़त नहीं हुई तो भी वो अपनी मौजूदगी के चिन्ह ज़रुर दर्ज करवाएगी..।’ उसकी आखिरी सदा यही थी..।

अब तक जो सुनाया तो तकरीबन सही ही है..। इसके बाद के सफ़र को याद करता हूं तो दिमाग पर एक परछाई सी छा जाती है..। उस दौर के बारे में सब कुछ सही-सही कह पाऊंगा, खुद को भी शक होता है..। पर फिर भी किसी तरह कोशिश करता हूं-

अब हर दिन, हर लम्हा पानी में भीगी हुई रुई की तरह भारी हो गया था..। मैं अब भी सतरंगी घास की वादी में ही था..। लेकिन कुछ भी वैसा नहीं बचा था..। सितारों की शक्ल के फूल मुरझा चुके थे, घास की कालीन अब हरी नहीं थी, रास्ते फिर बेजान हो चुके थे..। शेरटियां अब रास्तों से दूर ही रहती थीं, सुनहरी मछलियों ने नदी का रुख़ करना छोड़ दिया था..। रुठी हुई नदी ने गुनगुनाना छोड़ दिया था..। लेकिन एंजेलिका अपना वादा नहीं भूली थी..। कभी लगता किसी फरिश्ते के पंखों ने अचानक गालों को छू लिया है, कभी अपनी ही सांसें महकती हुई जान पड़तीं..। तन्हा पलों में जब दिल भारी होता, हवा की ठंडी आह कानों को महसूस होती तो लगता कि वो कहीं आसपास है..।

लेकिन रोता हुआ दिल मनाए नहीं मान रहा था..। वक्त के हाथों क़त्ल ज़ज्बात कांटों की तरह चुभते..। उस वादी का हर एक नज़ारा एंजेलिका की याद से छलकता महसूस होता..। आखिर दुनिया की चमक बटोरने के लिए मैंने मुसाफिर का झोला उठाया और उस वादी को छोड़कर निकल पड़ा..। मैंने खुद को एक अजीब शहर में पाया..। यहां के दिन, यहां की रातें मेरे भीने दर्द पर बदनुमा पैबंद जैसी थीं..। ‘अहमियत’ की दुनिया और दुनिया की अहमियत के गोरखधंधे में कब उलझा, पता ही नहीं चला..। यहां की जश्न मनाती रातों और खूबसूरत चेहरों का नशा चढ़ने लगा था..। लेकिन अभी तक मेरी आत्मा एंजेलिका से किए वायदों पर खरी उतरी थी..। उसका ऐहसास अब भी मेरी खामोश रातों को अक्सर छूकर गुज़रता..। अचानक ये जादू घटना बंद हो गया और दुनिया मेरी आंखों के सामने अंधेरी हो गई..। अपने भीतर सुलगती ख्वाहिशों पर मैं खुद हैरान था..। जाने किस जन्म का बंधन वापस लौटा था..? उसके सजदे में सिर झुकाने से पहले दिल ने एक बार भी रुसवाई का ख्याल नहीं किया..। इश्क की इस दहलीज़ पर जिस दीवानगी में डूबा उसके सामने एंजेलिका के जज़्बातों का जुनून भी क्या था..? अस्तित्व से बरसते आनंद को समेटने में अंतस अचानक छोटा लगने लगा था..। वाकई रूहानी था ये ऐहसास ! अब भी उसकी आंखों के बारे में सोचता हूं तो बस सोचता रह जाता हूं..।

मैंने कसम तोड़ दी..। न तो मुझे डर महसूस हुआ और न ही कड़ुवाहट..। सच पूछिए तो अपराध बोध भी नहीं..।
बस एक रात वही भूली-बिसरी नरम आह बेचैनी को दिलासा देती महसूस हुईं-

“सो जाओ दीपक ! ” सिर्फ नाम बदला है, आत्मा वही है..। तुम अपराध मुक्त हो..!

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