शनिवार, जून 11, 2011

धरती का हाउसफुल

कभी-कभी हैरानी होती है कुछ सालों बाद इस सदी के पहले दशक को हम कैसे याद करेंगे- जब गरीब के निवाले की कीमत..उसकी जान से भी ज़्यादा थी..मिडल क्लास आसमान छूते ऊर्जा दामों के तले पिस रहा था, पृथ्वी आबादी के बोझ से डगमगाने लगी थी..। टीवी की तस्वीरों में तूफानों से उजड़े शहर दिखना आम बात थी, भूकंप,बाढ़ पिछले रिकॉर्ड तोड़ रहे थे..। पूरी की पूरी सभ्यताएं पलायन कर रहीं थीं और इस सबके असर से दुनिया भर की सरकारों के सिंहासन डोल रहे थे- उस वक्त ये सवाल भी मन में उठेगा: हम क्या सोच रहे थे..? हम क्यों नहीं जागे जबकि सुबूत साफ़ थे कि हम विकास, पर्यावरण, प्राकृतिक संसाधन और जनसंख्या..इन सभी में कुदरत की लक्ष्मण रेखा लांघ रहे थे..।

हम मसले से भाग रहे थे..। शायद इकलौता यही उत्तर हमें उस वक्त सूझ सकता है..। जब हालात इतने गंभीर हों कि दुनिया के बारे में हर सोच, हर नज़रिए को बदलने की ज़रुरत हो तो नकार इंसान की फितरत है..। लेकिन शायद जितना लंबा इंतज़ार होगा..उतना ही बड़ा कदम उठाना हमारी मजबूरी होगी..।

इंसानी लालच को पूरा करते-करते.. अब इस धरती का आंचल छोटा पड़ने लगा है..। ग्लोबल फुटप्रिंट नेटवर्क नाम का एक वैज्ञानिक समूह इसी बात की गणना करता है कि मौजूदा विकास दर बनाए रखने के लिए हमें पृथ्वी जैसे कितने ग्रहों की ज़रुरत पड़ेगी..। जीएफएन की फाइलों में 2011 तक ये आंकड़ा 1.5 तक पहुंच चुका है..। जो हकीकत इस स्थिति को संगीन बनाती है वो यही है कि हमारे पास दूसरी कोई पृथ्वी नहीं है..। ये साइंस फिक्शन नहीं है..। ये हमारे विकास के तरीके और कुदरत के तरीके के बीच का टकराव है..। हिंदुस्तान के शहरों में अभी टैंकर लोगों की प्यास बुझा रहे हैं..। बहुत बार दोहराया जा चुका है कि अगला विश्व युद्ध वॉटर वॉर ही होगा..। जिस देश की एक पीढ़ी अपने संसाधनों से डेढ़ गुना ज़्यादा सोख रही हो वहां ऐसे हालात लाज़िमी हैं..।

अगर आप बेतहाशा पेड़ काटेंगे तो एक दिन वो ख़त्म हो जाएंगे..। अब आप धरती पर पड़े कार्बन डाइऑक्साइड के कंबल को और मोटा बनाते हैं तो धरती और गर्म होगी..। ऐसे कई काम एक साथ धरती के बर्ताव को बदल रहे हैं और इसका सामाजिक, आर्थिक असर नज़र आने लगा है..।

ये स्कूल स्तर के विज्ञान की समझ है..। लेकिन ये सामयिक भी है..। “हज़ारों साल की सभ्यता में इंसान और कुदरत के बीच के रिश्ते कभी इतने तलख़ नहीं थे..।” पिछले दिनों चीन के पर्यावरण मंत्री ये बात मान चुके हैं..। क्या वो हमें ये नहीं बता रहे कि दरअसल दुनिया के इस थिएटर का हाउस फुल हो चुका है..? हम फिलहाल संसाधनों का इतना ज़्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं और धरती में इतना कचरा भर रहे हैं कि मौजूदा तकनीक के हिसाब से अब सीमा रेखा नज़दीक है..। दुनिया की अर्थव्यवस्था को आकार घटाना ही होगा..।
ये भी सच है कि जब तक संकट सिर पर नहीं होगा..हम नहीं बदलेंगे..। लेकिन चिंता मत कीजिए..ख़तरे के बादल दूर नहीं हैं..। फिलहाल इंसानियत दो चक्रव्यूहों में एक साथ घिरी है: पहला ये कि जनसंख्या में बेतहाशा बढ़ोतरी और ग्लोबल वार्मिंग थाली की कीमत बढ़ा रहे हैं; अनाज की बढ़ती कीमतें तेल के भंडार देशों में अस्थिरता की वजह बन रहे हैं, इससे तेल की कीमतें और बढ़ रही हैं और नतीजतन खाने की कीमतें और बढ़ रही हैं..और इसका सीधा असर है और ज़्यादा अस्थिरता..। इसीके साथ उत्पादकता बढ़ने का मतलब है हर फैक्ट्री में कामगारों की ज़रुरत घट रही है..। यानी अगर और ज़्यादा रोज़गार चाहिएं तो हमें और ज़्यादा कारखाने खड़े करने होंगे..। इसका मतलब है ग्लोबल वार्मिंग और बढ़ती है..। हम इन दो दुष्चक्रों के बीच फंसे हैं..।

लेकिन सभी निराश नहीं हैं..। कुछ लोग मानते हैं कि जैसे-जैसे ‘ग्रीन लाइन’ नज़दीक आती जाएगी..इंसानों की प्रतिक्रिया भी उसी अनुपात में भी नाटकीय होती जाएगी..। हो सकता है दुनिया की सरकारों को युद्धस्तर पर कोशिशें करनी पड़ें..। भविष्य में हमें इतनी तेज़ी से बदलना होगा..जिसकी कल्पना भी मुश्किल है..। कुछ ही दशकों में ऊर्जा और परिवहन उद्योग में जड़ से बदलाव सबसे बड़ी ज़रुरत बन जाएगी..। एक दिन हमें समझना होगा कि बाज़ारवादी अर्थव्यवस्था का बोझ धरती नहीं झेल सकती है और हमें ऐसी अर्थव्यवस्था चाहिए जिसमें इंसान का संतोष, उसकी खुशी पैमाना होगा..। हमें ऐसे सिस्टम की ओर बढ़ना होगा..जहां लोग कम कमाएं और कम उपभोग करें..। आखिर कितने लोग मृत्युशैय्या पर ये कहते हैं कि काश ऑफिस में और ज़्यादा काम किया होता या फिर काश ज़्यादा शेयर कमाए होते..? और ऐसे कहने वाले कितने होंगे..जो ये सोचते हुए दुनिया छोड़ते हैं कि काश मैं ज़्यादा दुनिया को देखा होता, अपने बच्चों को और ज़्यादा लोरियां सुनाईं होतीं..? इसे हकीकत में बदलने के लिए हमें ऐसा विकास चाहिए जिसमें लोगों के पास उपभोग की चीज़ों से ज़्यादा ज़िंदगी जीने का वक्त हो..। या तो हम खुद को प्रलय के लिए मना लें या फिर इस बाज़ारवाद को ख़त्म करें..। मुझे लगता है हम दूसरा विकल्प चुनेंगे..। इंसानी प्रजाति समझने में धीमी भले हो लेकिन मूढ़ नहीं है..।

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