गुरुवार, जुलाई 28, 2011

एक ख्वाब जो मैंने देखा..


मैं उस मरु-विस्तार में अकेला भटक रहा था..।
तभी अचानक मैंने रोशनी को महसूस किया..। मेरे पीछे कदमों की आहट हुई..। कोई मेरा पीछा कर रहा था..।

मैं मुड़ा और एक छोटी सी बुढ़िया को देखा जो लाठी के सहारे झुकी हुई थी..। वो बदरंग चीथड़ों से लिपटी थी..। उन पैबंदों के बीच से सिर्फ उसका चेहरा झांक रहा था; झुर्रियों से भरे पीले गाल, तीखी नाक, दांतों के बगैर अंदर पिचके हुए होंठ..।

मैं उसके पास गया..वो थम गई..।

'तुम कौन हो? क्या चाहती हो? क्या तुम्हे कुछ चाहिए?'

बुढ़िया ने कोई जवाब नहीं दिया..। मैं उसपर झुका..। मैंने देखा उसकी पुतलियां पारदर्शी झिल्ली से ढकी थीं..जैसे कुछ पंछियों में होती है..।
लेकिन उसकी आंखों में ये झिल्ली बिल्कुल स्थिर थी..। इससे मैंने अंदाज़ा लगाया वो अंधी है..।

'तुम्हें कुछ चाहिए?' मैंने अपना सवाल दोहराया..।'मेरा पीछा क्यों कर रही हो? बुढ़िया जवाब में सिर्फ सिकुड़कर रह गई..।'

मैं एक बार फिर मुड़ा और अपनी राह हो लिया..।

और फिर मेरे पीछे वही रोशनी..वही पीछा करते नपे-तुले कदम..।

'ये बुढ़िया..!'मैंने सोचा,'आखिर मुझसे क्यों चिपकी है..?' लेकिन फिर ख्याल आया,'देख नहीं सकती है,अंधी है..मेरे कदमों की आवाज़ सुनकर महफूज़ जगह ठिकाने तक पहुंचना चाह रही होगी..। हां, हां, यही होगा..।'

लेकिन अजीब बैचेनी से मन भरने लगा..। मुझे वहम होने लगा कि वो बुढ़िया सिर्फ मेरा पीछा नहीं कर रही थी बल्कि मुझे भी अपनी मर्ज़ी के मुताबिक चला रही थी.. मैं जानता था फिर भी उसके वश में था..।
मैं फिर भी चलता रहा..लेकिन...तभी..मेरे सामने उसी सड़क पर..कुछ गहरा और अंधेरे से भरा हुआ..सड़क पर गड्ढा था या फिर कोई कब्र..! हां, ये मुझे कब्र की ओर ही धकेल रही है..!'

मैं फौरन पलटा लेकिन वो औरत फिर सामने थी...ओह! तो ये देख भी सकती है..। वो मुझे बड़ी-बड़ी,क्रूर, विद्वेषपूर्ण आंखों से घूर रही थी..एक शिकार पर शिकारी की निगाह...मैं उसके चेहरे पर झुका..एक बार फिर वही झिल्ली..फिर वही पथराया अंधकार..

'अच्छा!'मैंने सोचा,'ये बुढ़िया नियति है..। वो नियति जिससे कोई नहीं बच सकता..।'

'कोई नहीं बच सकता..! कोई नहीं..!! क्या पागलपन है....आखिर कोशिश तो करनी चाहिए..। ' और मैं दूसरी तरफ़ मुड़ गया..।

अब मैं आहिस्ता-आहिस्ता कदम रख रहा था..लेकिन मेरे पीछे की पदचाप भी उतनी ही हल्की थी, करीब, और करीब....और मेरे आगे फिर वही गहरा, गड्ढा..।

मैं फिर दूसरी दिशा की ओर मुड़ा....और फिर वही आहट, फिर वही अंधेरे से लबरेज़ गड्ढा..।

मैं बौराए घोड़े की तरह जिस भी ओर दौड़ा..नतीजा यही था..यही..!
'ज़रा रुको!'मैंने सोचा, 'मैं उसे छकाऊंगा!अब मैं हिलूंगा ही नहीं!' मैं तपती ज़मीन पर बैठ गया..।

बुढ़िया अब भी मुझसे दो कदम पीछे थी..। कोई आवाज़ नहीं थी..लेकिन उसकी मौजूदगी को महसूस किया जा सकता था..।
तभी मैंने देखा दूर क्षितिज से लिपटा स्लेटी अंधकार हवा में तैरकर मुझे घेरे जा रहा है..
हे ईश्वर! मेरी नज़रें पीछे घूमीं...बुढ़िया सीधे मेरी ओर देख रही थी, उसके पोपले होंठों पर बेरहम मुस्कान फैली थी..।

कोई मुक्ति नहीं..! कहीं कोई मुक्ति नहीं..!

3 टिप्‍पणियां:

  1. जन्माष्टमी की शुभ कामनाएँ।

    कल 23/08/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  2. ओह ... मन अस्थिर सा हो गया पढ़ कर ... गहन चिंतन ..

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