गुरुवार, सितंबर 01, 2011

चक्रव्यूह और मैं..

कौन था मैं और कैसा था, ये मुझे याद ही ना रहेगा;
चक्रव्यूह में घुसने के बाद
मेरे और चक्रव्यूह के बीच,
सिर्फ एक जानलेवा निकटता थी,
इसका मुझे पता ही नहीं चलेगा..
चक्रव्यूह से निकलने के बाद,
मैं मुक्त हो जाऊं भले ही,
फिर भी चक्रव्यूह की रचना में फर्क ही ना पड़ेगा.
मरूं या मारूं, मारा जाऊं या जान से मार दूं,
इसका फैसला कभी ना हो पाएगा.
सोया हुआ आदमी जब नींद से उठकर चलना शुरु करेगा,
तब सपनों का संसार उसे,
दोबारा दिख ही ना पाएगा.
उस रोशनी में जो निर्णय की रोशनी है, सब कुछ समान होगा क्या?
एक पलड़े में नपुंसकता, एक पलड़े में पौरुष,
और ठीक तराज़ू के कांटे पर अर्धसत्य...

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